
भारत के इतिहास में कुछ रचनाएँ ऐसी हैं जो केवल शब्दों का समूह नहीं रहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा बन गईं। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित ‘वंदे मातरम्’ ऐसी ही कालजयी रचना है, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आज तक भारतीयों के मन में मातृभूमि के प्रति अटूट प्रेम और गर्व का संचार किया है।
वर्ष 2025 में इस अमर गीत की 150वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है — यह केवल एक गीत की स्मृति नहीं, बल्कि भारतीय एकता, संस्कृति और राष्ट्रभावना का महोत्सव है।
✍️ वंदे मातरम् की उत्पत्ति
- बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने ‘वंदे मातरम्’ की रचना लगभग 1875-76 के बीच की थी।
- इसे पहली बार उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ (1882) में प्रकाशित किया गया।
- यह गीत भारतभूमि को एक देवी स्वरूप माँ के रूप में प्रस्तुत करता है — जहाँ नदियाँ, वन, पर्वत, खेत और संस्कृति माँ के सजीव अंग बन जाते हैं।
- “वंदे मातरम्” का शाब्दिक अर्थ है — “हे माँ, मैं तेरा वंदन करता हूँ।”
🇮🇳 स्वतंत्रता संग्राम में प्रेरणास्रोत
- ‘वंदे मातरम्’ भारत के स्वतंत्रता सेनानियों के लिए उर्जा और साहस का प्रतीक बन गया।
- आंदोलन, सभाओं और जुलूसों में जब यह गीत गूंजता था, तो हर भारतीय हृदय में स्वतंत्रता की ज्वाला प्रज्वलित हो उठती थी।
- लाला लाजपत राय, बिपिन चंद्र पाल, श्री अरविंदो और महात्मा गांधी जैसे नेताओं ने इसे राष्ट्रीय चेतना का केंद्र माना।
- ब्रिटिश शासन इसे राष्ट्रवादी प्रतीक मानकर प्रतिबंधित करने से भी नहीं हिचकिचाया, परंतु इसकी गूँज को दबा नहीं पाया।
🌸 सांस्कृतिक और भावनात्मक महत्त्व
- ‘वंदे मातरम्’ केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, प्रकृति और एकता का गीत है।
- इसमें भारत की मिट्टी की सुगंध, नदियों की पवित्रता और विविधता की सुंदरता समाई है।
- यह हमें याद दिलाता है कि राष्ट्र केवल सीमाओं से नहीं, बल्कि संवेदना, परंपरा और साझा गर्व से बनता है।
- आज भी यह गीत राष्ट्रीय पर्वों, शैक्षणिक समारोहों और सांस्कृतिक आयोजनों का अभिन्न अंग है।
🎉 150 वर्ष का उत्सव
- इस वर्ष भारत सरकार, सांस्कृतिक संस्थान और शैक्षणिक संगठन वंदे मातरम् के 150 वर्ष को विशेष रूप से मना रहे हैं।
- देशभर में डिजिटल अभियान, संगीत समारोह, कला प्रदर्शनियाँ और विचार गोष्ठियाँ आयोजित की जा रही हैं।
- इसका उद्देश्य युवाओं को यह संदेश देना है कि राष्ट्रप्रेम केवल इतिहास की विरासत नहीं, बल्कि भविष्य की जिम्मेदारी भी है।
✨ निष्कर्ष
पिछले 150 वर्षों से ‘वंदे मातरम्’ भारतीयता की डोर को मजबूती से बाँधने वाला गीत रहा है। यह हमें सिखाता है कि मातृभूमि के प्रति सम्मान और समर्पण ही सच्चे राष्ट्रनिर्माण की नींव है।
जब भी यह गीत गूंजता है, हर भारतीय के हृदय में गर्व, कृतज्ञता और देशभक्ति की भावना नव ऊर्जा के साथ जाग उठती है।