
उत्तर प्रदेश, जो भारत का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक राज्य है, इन दिनों दूध उद्योग को लेकर गहराते राजनीतिक विवाद का केंद्र बन गया है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने हाल ही में राज्य सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि भाजपा शासन में दुग्ध क्षेत्र की योजनाओं में भारी गड़बड़ी हुई है। उन्होंने मांग की है कि सरकार इस पूरे मामले पर एक “श्वेत पत्र” जारी करे, ताकि बजट उपयोग और नीतिगत फैसलों की सच्चाई जनता के सामने आए।
🧈 पाराग डेयरी: गौरव की कहानी से गिरावट की दास्तान तक
कभी उत्तर प्रदेश की दुग्ध क्रांति का प्रतीक रही पाराग डेयरी आज विवादों में घिरी दिखाई दे रही है। अखिलेश यादव का दावा है कि उनकी सरकार ने पाराग के विस्तार और आधुनिकीकरण के लिए लगभग ₹2000 करोड़ का प्रावधान किया था, जिससे नए संयंत्रों की स्थापना और किसानों को बेहतर भुगतान सुनिश्चित हो सके।
उनके अनुसार, भाजपा सरकार के आने के बाद इस बजट का दुरुपयोग हुआ और डेयरी की वित्तीय स्थिति लगातार कमजोर होती चली गई।
🏭 अमूल की एंट्री: विकास की पहल या राजनीतिक चाल?
अखिलेश यादव ने यह भी कहा कि समाजवादी सरकार के कार्यकाल में अमूल को राज्य में संचालन की अनुमति दी गई थी, ताकि पाराग के साथ स्वस्थ प्रतिस्पर्धा उत्पन्न हो सके।
उनका तर्क है कि प्रतिस्पर्धा से किसानों को दूध का उचित मूल्य मिलता और उपभोक्ताओं को गुणवत्तापूर्ण उत्पाद। मगर मौजूदा सरकार की “कुप्रबंधन नीतियों” ने इस संतुलन को बिगाड़ दिया, जिससे पाराग और अमूल दोनों की गतिविधियों पर असर पड़ा।
🚜 भाजपा पर निशाना: “किसान विरोधी नीति” का आरोप
अखिलेश यादव ने भाजपा सरकार को “किसान विरोधी” और “दूध उत्पादक विरोधी” बताते हुए कहा कि मौजूदा शासन में दूध खरीद दरें घटाई गईं और भुगतान प्रक्रिया जटिल बना दी गई। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गहरा झटका लगा।
उनके मुताबिक, सरकार ने दुग्ध उद्योग में पारदर्शिता की जगह राजनीतिक लाभ को तरजीह दी, जिससे किसानों और सहकारी समितियों दोनों का भरोसा डगमगा गया।
📄 श्वेत पत्र क्यों महत्वपूर्ण है?
“श्वेत पत्र” किसी नीति, परियोजना या बजट पर सरकार की विस्तृत रिपोर्ट होती है, जिसमें निर्णयों और खर्च का ब्यौरा शामिल होता है।
अखिलेश यादव की यह मांग इसलिए अहम है क्योंकि इससे न केवल पाराग डेयरी और अमूल से जुड़ी योजनाओं की वास्तविक स्थिति उजागर हो सकती है, बल्कि यह राज्य की दुग्ध नीति की पारदर्शिता का भी परीक्षण बनेगी।
🔍 निष्कर्ष
उत्तर प्रदेश का दुग्ध उद्योग केवल आर्थिक संसाधन नहीं, बल्कि लाखों किसानों की आजीविका का आधार है। पाराग और अमूल के बीच उभरा यह विवाद अब केवल व्यापारिक प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि राजनीतिक जवाबदेही का प्रश्न बन चुका है।
यदि सरकार वास्तव में श्वेत पत्र जारी करती है, तो इससे न सिर्फ दूध उत्पादकों की स्थिति स्पष्ट होगी, बल्कि जनता को यह भी पता चलेगा कि “दूध की राजनीति” के पीछे असल सच्चाई क्या है।