
हार्वर्ड विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यक्ष लॉरेंस एच. समर्स और कुख्यात यौन अपराधी जेफ्री ई. एपस्टीन के बीच लंबे समय तक चले संबंधों का नया खुलासा शिक्षा जगत, राजनीति और नैतिक नेतृत्व पर गंभीर बहस को जन्म दे रहा है। अमेरिकी कांग्रेस की हाउस ओवरसाइट कमेटी द्वारा सार्वजनिक किए गए ईमेल्स ने यह स्पष्ट किया है कि किस तरह प्रभावशाली व्यक्तियों के निजी गठजोड़ संस्थागत विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकते हैं।
📧 ईमेल्स से सामने आए चौंकाने वाले तथ्य
2013 से 2019 के बीच हुए सैकड़ों ईमेल आदान-प्रदान से यह पता चलता है कि समर्स ने एपस्टीन से न केवल हार्वर्ड से जुड़े मुद्दों पर, बल्कि घरेलू राजनीति और अपने निजी जीवन पर भी सलाह ली।
इन संवादों में:
- महिलाओं को लेकर हुए निजी चर्चाएँ,
- राजनीतिक रणनीति पर विमर्श,
- आर्थिक और अकादमिक मामलों पर राय-मशविरा
जैसी बातें सामने आईं।
एक ईमेल में समर्स ने एपस्टीन को लिखा—
“DO NOT REPEAT THIS INSIGHT”,
जो दोनों के बीच गोपनीयता की असामान्य गहराई को दर्शाता है।
💔 विवादित व्यक्तिगत नजदीकी
सूत्रों के अनुसार समर्स एक महिला के साथ संबंध बनाने की कोशिश में थे, जिसे वे ईमेल्स में “मेंटी” कहकर संबोधित करते थे। इस दौरान उन्होंने एपस्टीन को हँसी-हँसी में अपना “विंग मैन” भी कहा—एक ऐसा साथी जो रोमांटिक प्रयासों में सहयोग देता है।
यह खुलासा शक्ति-संबंधी असंतुलन और नैतिक आचरण को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
🎓 हार्वर्ड प्रशासन की प्रतिक्रिया
नए खुलासों के बाद हार्वर्ड विश्वविद्यालय ने समर्स और एपस्टीन के बीच के संबंधों की नई जांच की पहल की है। कई प्रोफेसरों और पूर्व छात्रों ने इसे “नैतिक पतन” और “संस्थान की गरिमा के खिलाफ” बताया है।
भले ही समर्स 2006 में अध्यक्ष पद छोड़ चुके थे, लेकिन ईमेल्स यह दर्शाते हैं कि एपस्टीन से उनके संपर्क 2019 तक जारी रहे।
🧩 समर्स का पीछे हटना
इन खुलासों के भारी दबाव के बाद लॉरेंस समर्स ने सार्वजनिक भूमिकाओं से खुद को अलग करने का निर्णय लिया। उन्होंने स्वीकार किया—
“मेरी गलतियों ने कई लोगों को आहत किया है, और मुझे इसका गहरा पछतावा है।”
इसके साथ ही उन्होंने OpenAI के बोर्ड से भी इस्तीफा दे दिया।
🔍 समग्र निष्कर्ष
यह पूरा मामला सिर्फ व्यक्तिगत संबंधों का मुद्दा नहीं—यह सत्ता, प्रभाव और गोपनीय गठजोड़ की उस संरचना पर रोशनी डालता है, जो कई बार संस्थागत नैतिकता को पीछे छोड़ देती है।
यह घटना यह याद दिलाती है कि:
- उच्च पदों पर बैठे लोग भी जवाबदेही से ऊपर नहीं,
- संस्थानों को पारदर्शिता को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए,
- और विवादित व्यक्तियों से निजी लाभ के लिए संबंध रखने से पूरे संस्थान की साख पर प्रश्नचिन्ह लग सकता है।
यह प्रकरण आधुनिक शिक्षा और राजनीति के बीच मौजूद नैतिक अधूरेपन की एक कड़वी झलक है, जो सुधार की मांग करता है।