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ममता बनर्जी का ‘संहति दिवस’ संदेश: एकजुट समाज और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का आह्वान


पश्चिम बंगाल में प्रत्येक वर्ष 6 दिसंबर को मनाया जाने वाला ‘संहति दिवस’ इस बार भी सामाजिक एकता और भाईचारे के विशेष संदेश के साथ चर्चा में रहा। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस अवसर पर जनता को संबोधित करते हुए बंगाल की सांस्कृतिक धरोहर और उसकी साझा विरासत पर ज़ोर दिया। उनका संदेश ऐसे समय में आया है जब देश में सामाजिक समरसता और पारस्परिक विश्वास को बनाए रखने की आवश्यकता और भी बढ़ गई है।


बंगाल: विविधता में एकता की धरती

अपने संदेश में ममता बनर्जी ने कहा कि पश्चिम बंगाल की धरती ने हमेशा विभाजन की राजनीति को ठुकराया है। उन्होंने रवींद्रनाथ ठाकुर, काजी नजरुल इस्लाम, रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद जैसी महान हस्तियों का उल्लेख करते हुए याद दिलाया कि बंगाल की संस्कृति सदियों से सर्वधर्म समभाव और समावेशिता पर आधारित रही है।
यह राज्य न केवल विभिन्न पंथों और समुदायों को स्वीकार करता है, बल्कि सभी को एक ही सामाजिक सूत्र में पिरोकर आगे बढ़ने का रास्ता दिखाता है।


धर्म व्यक्तिगत, उत्सव सबका — बंगाल की पहचान

मुख्यमंत्री का यह कथन कि “धर्म हर किसी का अपना है, लेकिन उत्सव सभी के हैं” बंगाल के सामाजिक ढाँचे का मूल भाव दर्शाता है। यहाँ पूजा, ईद, क्रिसमस या गुरु पर्व—सभी को मिल-जुलकर मनाया जाता है।
यह विचार केवल एक नारा नहीं, बल्कि बंगाल की दैनिक जीवन शैली का अनिवार्य हिस्सा है, जो सांस्कृतिक साझेदारी और परस्पर सम्मान को मजबूत बनाता है।


सांप्रदायिकता के खिलाफ दृढ़ रुख

अपने संदेश में ममता बनर्जी ने उन शक्तियों की आलोचना की जो समाज में नफ़रत और भेदभाव फैलाने का प्रयास करती हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि बंगाल किसी भी प्रकार की विभाजनकारी राजनीति को स्वीकार नहीं करेगा।
उन्होंने नागरिकों से शांति, प्रेम और पारस्परिक सम्मान बनाए रखने की अपील की—जो वर्तमान परिदृश्य में अत्यंत प्रासंगिक है।


संहति दिवस का राजनीतिक और सामाजिक संदर्भ

6 दिसंबर ऐतिहासिक रूप से संवेदनशील तारीख रही है, क्योंकि यह बाबरी मस्जिद ढहाए जाने की बरसी है। इसी दिन तृणमूल कांग्रेस ‘संहति दिवस’ मनाकर समाज को सौहार्द और एकजुटता का संदेश देती है।
इस वर्ष का मुख्य कार्यक्रम कोलकाता के मेयो रोड स्थित गांधी प्रतिमा के पास आयोजित हुआ, जहाँ ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी ने एक संयुक्त मंच से भाषण दिया।
यह केवल एक प्रतीकात्मक आयोजन नहीं, बल्कि इस बात की घोषणा भी थी कि बंगाल नकारात्मक राजनीति की बजाय शांति और भाईचारे की राह चुनता है।


निष्कर्ष

ममता बनर्जी का ‘संहति दिवस’ संदेश बंगाल की बहुलतावादी संस्कृति और साझा सामाजिक मूल्यों का पुनर्पुष्टिकरण है। यह संदेश बताता है कि बंगाल में एकता केवल एक भाव नहीं, बल्कि जनजीवन का हिस्सा है।
आज जब सामाजिक सौहार्द कई चुनौतियों से गुजर रहा है, ऐसे में यह संदेश एक मजबूत और प्रेरणादायी दिशा प्रदान करता है।


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