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अफगान युद्ध: चार दशक चले संघर्ष का इतिहास, प्रभाव और अहम सबक


अफगानिस्तान उन देशों में से एक है जो कई वर्षों से लगातार अस्थिरता और संघर्ष का सामना करता रहा है। लगभग 40 से अधिक वर्षों तक चले युद्ध ने इस देश के राजनीतिक ढांचे, सामाजिक ताने-बाने और आर्थिक स्थिति को गहराई से बदल दिया। अफगान युद्ध को समझना सिर्फ एक भू-राजनीतिक घटना को समझना नहीं है, बल्कि यह दुनिया की शक्ति संतुलन, विदेश नीति और मानवाधिकारों की जटिलताओं को भी उजागर करता है।


● संघर्ष की शुरुआत: 1979 का मोड़

अफगान युद्ध की औपचारिक शुरुआत 1979 में हुई, जब सोवियत संघ ने अफगानिस्तान में अपने समर्थक शासन को बनाए रखने के लिए सेना भेजी। सोवियत हस्तक्षेप के विरोध में अफगान मुजाहिदीन समूहों ने सशक्त विद्रोह शुरू किया।
इस अवधि में अमेरिका, पाकिस्तान और कुछ अन्य देशों ने मुजाहिदीन को सहायता दी, जिसके कारण संघर्ष और अधिक लंबा, जटिल और बहुस्तरीय हो गया।


● तालिबान का उभार और सत्ता पर कब्ज़ा

सोवियत सेना की वापसी के बाद 1990 के दशक में अफगानिस्तान गृहयुद्ध से घिर गया। इसी अशांत माहौल में तालिबान का गठन हुआ और वे तेजी से बड़ी ताकत बनकर उभरे।
1996 में तालिबान ने काबुल पर नियंत्रण कर लिया और कठोर नियमों के साथ शासन स्थापित किया।

उनके दौर में—

जैसी परिस्थितियाँ पैदा हुईं।


● 2001 के बाद का नया अध्याय: अमेरिका की भूमिका

11 सितंबर 2001 के हमलों के बाद अमेरिका ने तालिबान और अल-कायदा के खिलाफ बड़ा सैन्य अभियान शुरू किया।
इस अभियान के मुख्य उद्देश्य थे—

2001 से 2021 तक अमेरिकी और गठबंधन सेनाएँ अफगानिस्तान में सक्रिय रहीं। इस दौरान चुनाव हुए, नई संस्थाएँ बनीं और कई विकास कार्य हुए, लेकिन सुरक्षा चुनौतियाँ लगातार बनी रहीं।


● 2021: तालिबान की पुनर्वापसी

2021 में अमेरिका ने अपनी सेनाएँ पूरी तरह वापस बुला लीं। सेनाओं की वापसी के बाद कुछ ही समय में तालिबान ने अफगानिस्तान के बड़े हिस्से पर फिर से नियंत्रण स्थापित कर लिया और काबुल पर भी काबिज़ हो गए।
इस बदलाव ने एक बार फिर अफगानिस्तान के भविष्य, मानवाधिकारों और क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर सवाल खड़े कर दिए।


● अफगान युद्ध से मिली सीख

अफगान युद्ध दुनिया को कई महत्वपूर्ण सबक देता है—


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