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योगी आदित्यनाथ का नेहरू पर प्रहार: कश्मीर समस्या की ऐतिहासिक जड़ें


उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक बार फिर देश के राजनीतिक और ऐतिहासिक विमर्श को केंद्र में लाते हुए भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की नीतियों पर तीखा सवाल उठाया है। 15 दिसंबर 2025 को लखनऊ में सरदार वल्लभभाई पटेल की पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में योगी ने कहा कि जम्मू-कश्मीर का लंबे समय से चला आ रहा विवाद स्वतंत्रता के बाद लिए गए कुछ गलत निर्णयों का परिणाम है।

“ऐतिहासिक चूक” का आरोप

अपने संबोधन में मुख्यमंत्री योगी ने कहा कि आज़ादी के बाद जम्मू-कश्मीर के विलय की प्रक्रिया सरदार पटेल के बजाय नेहरू के हाथों में चली गई, जो देश के लिए महंगी साबित हुई। उनके अनुसार, यदि कश्मीर का मामला भी पटेल को सौंपा गया होता, तो यह रियासत भी अन्य रियासतों की तरह बिना किसी अंतरराष्ट्रीय विवाद के भारत में पूर्ण रूप से शामिल हो जाती।

योगी ने इसे स्वतंत्र भारत की सबसे बड़ी रणनीतिक भूलों में से एक बताते हुए कहा कि उसी निर्णय ने आने वाले दशकों तक देश को अस्थिरता, आतंकवाद और अलगाववाद की चुनौती दी।

सरदार पटेल को बताया एकता का आधार

मुख्यमंत्री ने अपने भाषण में सरदार वल्लभभाई पटेल की भूमिका को रेखांकित करते हुए उन्हें “आधुनिक भारत की एकता का सूत्रधार” बताया। उन्होंने कहा कि सैकड़ों रियासतों का भारत में शांतिपूर्ण विलय पटेल की राजनीतिक समझ, दृढ़ इच्छाशक्ति और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने की सोच का परिणाम था।

योगी ने यह भी जोड़ा कि पटेल की नीति स्पष्ट थी—राष्ट्र की अखंडता से कोई समझौता नहीं—जबकि नेहरू की कश्मीर नीति ने इस सिद्धांत को कमजोर किया।

बयान के बाद तेज हुई राजनीतिक बहस

योगी आदित्यनाथ के इस बयान के सामने आते ही राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया। विपक्षी दलों ने इसे इतिहास के चयनात्मक उपयोग और राजनीतिक लाभ के लिए तथ्यों की व्याख्या करने का प्रयास बताया। वहीं, भाजपा और उसके समर्थकों ने योगी के वक्तव्य को वर्षों से दबाई गई सच्चाइयों को सामने लाने वाला कदम करार दिया।

यह बयान ऐसे समय आया है जब जम्मू-कश्मीर में केंद्र सरकार विकास, निवेश और स्थिरता को लेकर सक्रिय प्रयास कर रही है, और अनुच्छेद 370 हटने के बाद राज्य की स्थिति पर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा जारी है।

कश्मीर विवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

स्वतंत्रता के समय जम्मू-कश्मीर एक रियासत थी, जिसके शासक महाराजा हरि सिंह थे। भारत में विलय की प्रक्रिया जटिल परिस्थितियों में पूरी हुई। इसी दौरान पाकिस्तान समर्थित कबायली आक्रमण हुआ, जिससे हालात बिगड़ गए और भारत को सैन्य कार्रवाई करनी पड़ी। यहीं से कश्मीर का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचा और विवाद की नींव पड़ी।

योगी आदित्यनाथ के अनुसार, यदि उस समय निर्णय प्रक्रिया अधिक सख्त और स्पष्ट होती, तो आज हालात अलग होते।

निष्कर्ष

योगी आदित्यनाथ का यह बयान केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि इतिहास की व्याख्या को लेकर चल रही व्यापक बहस का हिस्सा है। कश्मीर मुद्दा आज भी राष्ट्रीय चेतना से जुड़ा हुआ विषय है, और उस पर दिए गए ऐसे बयान यह दर्शाते हैं कि अतीत के फैसले वर्तमान राजनीति और भविष्य की दिशा को कैसे प्रभावित करते हैं। नेहरू और पटेल की भूमिकाओं को लेकर जारी यह बहस आने वाले समय में और गहरी होने की संभावना रखती है।


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