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यूरो-हनुक्का: जब एक दीपक उम्मीद की परिभाषा बदल देता है

इतिहास गवाह है कि सबसे गहरे अंधकार में भी यदि कोई चीज़ मानवता को आगे बढ़ाती है, तो वह है—अटूट आशा। आशा का आकार कभी बड़ा नहीं होता, पर उसका अस्तित्व स्वयं में एक क्रांति होता है। 17 दिसंबर 2025 की रात यूरोप के सांस्कृतिक और राजनीतिक क्षितिज पर ऐसा ही एक प्रतीकात्मक क्षण उभरा, जब यूरो-हनुक्का के अवसर पर यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने एक भावनात्मक संदेश साझा किया।

उन्होंने कहा कि रोशनी की शक्ति उसके विस्तार में नहीं, बल्कि उसके निरंतर जलते रहने में निहित होती है। यह कथन केवल एक धार्मिक या सांस्कृतिक संदर्भ तक सीमित नहीं था, बल्कि समकालीन यूरोप की सामाजिक और नैतिक चुनौतियों की ओर भी संकेत करता था।

हनुक्का का पर्व स्वयं संघर्ष, धैर्य और विश्वास की कहानी कहता है। यह उस ऐतिहासिक स्मृति का उत्सव है जब सीमित संसाधनों के बावजूद एक दीपक कई दिनों तक जलता रहा। आज के संदर्भ में, यही दीपक विभाजन, युद्ध, असहिष्णुता और अविश्वास से जूझ रही दुनिया के लिए एक शांत लेकिन सशक्त संदेश बन जाता है।

‘यूरो-हनुक्का’ केवल यहूदी परंपरा का उत्सव नहीं, बल्कि यूरोपीय मूल्यों—बहुलता, सह-अस्तित्व और मानवीय गरिमा—का प्रतीक बनकर उभरता है। यह समारोह बताता है कि विविध संस्कृतियों और आस्थाओं के बीच संवाद ही लोकतंत्र की असली ताकत है।

उर्सुला वॉन डेर लेयेन का संदेश ऐसे समय आया है जब यूरोप कई स्तरों पर चुनौतियों से गुजर रहा है—राजनीतिक ध्रुवीकरण, आर्थिक अनिश्चितता और वैश्विक संघर्षों की छाया। ऐसे दौर में एक दीपक का जलना केवल प्रकाश नहीं फैलाता, बल्कि यह याद दिलाता है कि उम्मीद को जीवित रखना स्वयं एक साहसिक कार्य है।

यूरो-हनुक्का हमें यह सिखाता है कि परिवर्तन हमेशा शोर के साथ नहीं आता। कभी-कभी वह चुपचाप, एक छोटे से दीपक के रूप में, पूरे महाद्वीप को यह समझा देता है कि अंधकार कितना भी गहरा क्यों न हो—रोशनी का विकल्प हमेशा मौजूद रहता है।

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