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अल्पसंख्यक सशक्तिकरण की बंगाल मॉडल कहानी: ममता बनर्जी की नीतियों का विश्लेषण

भारत में हर वर्ष 18 दिसंबर को मनाया जाने वाला अल्पसंख्यक अधिकार दिवस केवल एक प्रतीकात्मक तिथि नहीं, बल्कि समान अवसर और सामाजिक न्याय की अवधारणा को दोहराने का अवसर है। इसी अवसर पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अल्पसंख्यक समुदायों के लिए राज्य सरकार द्वारा किए गए कार्यों और पहलों को रेखांकित करते हुए एक व्यापक विकास दृष्टिकोण सामने रखा।

📈 कल्याण बजट में अभूतपूर्व विस्तार

पिछले डेढ़ दशक में पश्चिम बंगाल ने अल्पसंख्यक कल्याण के लिए अपने वित्तीय संसाधनों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की है। वर्ष 2010–11 में जहाँ इस विभाग का बजट कुछ सौ करोड़ रुपये तक सीमित था, वहीं 2025–26 तक यह राशि छह हजार करोड़ रुपये से अधिक पहुँच चुकी है। यह बढ़ोतरी केवल आंकड़ों की नहीं, बल्कि नीति-स्तर की प्राथमिकता में आए बदलाव को दर्शाती है।

🎒 शिक्षा को केंद्र में रखता विकास मॉडल

राज्य सरकार की नीतियों में शिक्षा को सामाजिक उत्थान का मुख्य आधार माना गया है।

💼 आत्मनिर्भरता की ओर: रोजगार और स्वरोजगार

केवल शिक्षा ही नहीं, बल्कि आर्थिक आत्मनिर्भरता को भी सरकार की नीतियों में महत्वपूर्ण स्थान मिला है। अल्पसंख्यक युवाओं, महिला स्वयं सहायता समूहों और छोटे उद्यमियों को हजारों करोड़ रुपये के ऋण उपलब्ध कराए गए हैं। इसका परिणाम यह रहा कि लाखों परिवारों को स्वरोजगार के नए अवसर मिले और स्थानीय अर्थव्यवस्था को बल मिला।

🏘️ बुनियादी ढांचे में संतुलित निवेश

अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में विकास की खाई को पाटने के उद्देश्य से मल्टी सेक्टोरल डेवलपमेंट प्रोग्राम (MSDP) के तहत बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य किए गए। स्कूल, स्वास्थ्य सुविधाएँ, सड़कें और सामुदायिक ढांचे—इन सबका विस्तार उन इलाकों में हुआ, जिन्हें लंबे समय तक विकास से वंचित माना जाता था।

🧭 समापन विचार

पश्चिम बंगाल का अनुभव यह संकेत देता है कि यदि नीतियाँ समावेशी दृष्टि से बनाई जाएँ, तो सामाजिक विविधता विकास में बाधा नहीं, बल्कि शक्ति बन सकती है। ममता बनर्जी के नेतृत्व में लागू की गई ये पहलें अल्पसंख्यक अधिकार दिवस के अवसर पर यह संदेश देती हैं कि सम्मान, अवसर और सहभागिता—तीनों एक साथ संभव हैं।


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