
यूरोपीय संघ (EU) और दक्षिण अमेरिका के प्रमुख व्यापारिक गठबंधन मर्कोसुर के बीच प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौता एक बार फिर अनिश्चितता के दौर में पहुंच गया है। दिसंबर 2025 में ब्रसेल्स में हुई यूरोपीय परिषद की अहम बैठक के दौरान इस बहुप्रतीक्षित समझौते पर हस्ताक्षर करने की प्रक्रिया को जनवरी 2026 तक के लिए टाल दिया गया। यह फैसला ऐसे समय में सामने आया है जब वैश्विक व्यापार व्यवस्था संरक्षणवादी रुझानों से जूझ रही है और यूरोप अपनी आर्थिक रणनीति को नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिश कर रहा है।
समझौते की दीर्घकालिक पृष्ठभूमि
EU और मर्कोसुर के बीच व्यापार समझौते पर बातचीत कोई नई बात नहीं है। पिछले करीब ढाई दशकों से दोनों पक्ष इस पर चर्चा करते आ रहे हैं। मर्कोसुर में ब्राज़ील, अर्जेंटीना, उरुग्वे, पराग्वे और बोलिविया जैसे देश शामिल हैं। यदि यह समझौता लागू होता है, तो यह लगभग 78 करोड़ लोगों को जोड़ने वाला दुनिया का सबसे बड़ा व्यापारिक ढांचा बन सकता है, जिसमें वैश्विक GDP का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा शामिल होगा।
समझौता टलने की असली वजहें
अंतिम चरण में पहुंचने के बावजूद यह समझौता राजनीतिक विरोध की भेंट चढ़ गया। खास तौर पर फ्रांस और इटली ने अपनी आपत्तियां खुलकर सामने रखीं।
- कृषि क्षेत्र का विरोध: फ्रांस में किसानों ने बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किए। उनका तर्क है कि लैटिन अमेरिका से सस्ते कृषि उत्पादों के आने से यूरोपीय किसानों को गंभीर आर्थिक नुकसान हो सकता है।
- पर्यावरणीय चिंता: अमेज़न वर्षावनों की कटाई और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी आशंकाओं को लेकर भी कई यूरोपीय देशों में असहजता देखी गई।
- घरेलू राजनीति का दबाव: कुछ देशों में आगामी चुनावों और आंतरिक राजनीतिक समीकरणों ने भी सरकारों को सतर्क रुख अपनाने के लिए मजबूर किया।
यूरोपीय नेताओं की अलग-अलग राय
जहां कुछ देशों ने आपत्ति जताई, वहीं कई बड़े यूरोपीय राष्ट्र इस समझौते के पक्ष में मजबूती से खड़े नजर आए।
- जर्मनी और स्पेन का समर्थन: इन देशों का मानना है कि यह समझौता यूरोप की आर्थिक पहुंच को मजबूत करेगा और उसे वैश्विक प्रतिस्पर्धा में आगे रखेगा।
- यूरोपीय आयोग का दृष्टिकोण: आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने इसे केवल व्यापार नहीं, बल्कि यूरोप की रणनीतिक स्वायत्तता से जुड़ा कदम बताया।
संभावित आर्थिक और रणनीतिक फायदे
यदि यह समझौता लागू होता है, तो इसके कई दूरगामी लाभ हो सकते हैं:
- शुल्क बाधाओं में कमी: अधिकांश वस्तुओं पर आयात-निर्यात शुल्क चरणबद्ध तरीके से समाप्त किए जाएंगे।
- नए बाजारों तक पहुंच: यूरोपीय उद्योगों और सेवाक्षेत्र को दक्षिण अमेरिका में विस्तार का अवसर मिलेगा।
- रणनीतिक संसाधन: महत्वपूर्ण खनिजों और कच्चे माल की आपूर्ति के लिए यूरोप चीन पर अपनी निर्भरता घटा सकेगा।
वैश्विक व्यापार पर प्रभाव
आज की दुनिया में, जहां अमेरिका और चीन के बीच व्यापार तनाव लगातार बना हुआ है, EU इस समझौते के जरिए अपने लिए वैकल्पिक और भरोसेमंद साझेदार तलाशना चाहता है। हालांकि, बार-बार फैसले टलने से यह संदेश भी जा रहा है कि यूरोपीय संघ आंतरिक मतभेदों के कारण बड़े वैश्विक समझौतों को अंतिम रूप देने में संघर्ष कर रहा है।
निष्कर्ष
EU–मर्कोसुर व्यापार समझौता केवल आयात-निर्यात तक सीमित नहीं है, बल्कि यह यूरोप की आर्थिक कूटनीति और वैश्विक भूमिका को नए सिरे से गढ़ने का प्रयास है। फिर भी, किसानों की चिंताओं और पर्यावरणीय जिम्मेदारियों को नजरअंदाज कर आगे बढ़ना आसान नहीं होगा। यदि जनवरी 2026 में यह समझौता अंतिम रूप लेता है, तो यह न केवल यूरोप और दक्षिण अमेरिका के संबंधों में, बल्कि पूरी वैश्विक व्यापार व्यवस्था में एक निर्णायक बदलाव साबित हो सकता है।