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इंदौर का दूषित जल संकट: “स्वच्छ शहर” के तमगे के पीछे छुपी कड़वी सच्चाई


देश में स्वच्छता का प्रतीक माने जाने वाले इंदौर शहर पर इन दिनों गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। जिस शहर को लगातार स्वच्छता रैंकिंग में शीर्ष स्थान मिलता रहा, वहीं हालिया दूषित पेयजल संकट ने प्रशासनिक दावों की पोल खोल दी है। भगिरथपुरा क्षेत्र में गंदा पानी पीने से कई परिवारों पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा—चार लोगों की मौत और सैकड़ों का बीमार पड़ना इस संकट की भयावहता को उजागर करता है।

संकट ने खोली व्यवस्था की कमजोर कड़ी

इस दुर्घटना ने साफ कर दिया है कि सड़कें चमकने और कचरा प्रबंधन के आंकड़े अच्छे होने मात्र से नागरिकों की बुनियादी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होती। पेयजल जैसी आवश्यक सेवा में लापरवाही किसी भी शहर के लिए सबसे बड़ा प्रशासनिक अपराध मानी जानी चाहिए। सवाल यह भी है कि जब इंदौर जैसे मॉडल शहर में यह स्थिति है, तो छोटे शहरों और कस्बों की हकीकत क्या होगी?

अखिलेश यादव का राजनीतिक प्रहार

इस मुद्दे पर समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि जिन शहरों को स्वच्छता के लिए सम्मानित किया जाता है, वहां अगर लोग दूषित पानी से जान गंवा रहे हैं, तो ऐसे पुरस्कारों का क्या अर्थ रह जाता है। उनका आरोप था कि भाजपा सरकारें प्रचार पर ज्यादा और बुनियादी सुविधाओं पर कम ध्यान देती हैं।

उन्होंने नदियों की सफाई को लेकर भी सवाल उठाते हुए कहा कि गंगा और यमुना की स्वच्छता के सरकारी दावे जमीनी हकीकत से मेल नहीं खाते। उनके मुताबिक, आम जनता आज भी इन नदियों के पानी को लेकर असुरक्षित महसूस करती है।

सरकार और प्रशासन का पक्ष

मध्य प्रदेश सरकार ने स्थिति को संभालने के लिए त्वरित कदम उठाने की बात कही है। मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने बताया कि बड़ी संख्या में मरीजों को अस्पताल में भर्ती कराया गया, जिनमें से अधिकांश की हालत अब सामान्य है। इलाज को पूरी तरह नि:शुल्क रखने का निर्णय लिया गया है और पहले किए गए खर्च की भरपाई का भरोसा भी दिया गया है।

हालांकि, मृतकों की संख्या को लेकर असहमति बनी हुई है। प्रशासन जहां चार मौतों की पुष्टि कर रहा है, वहीं स्थानीय लोगों का कहना है कि यह आंकड़ा इससे अधिक है। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने मृतकों के परिजनों के लिए मुआवजे की घोषणा करते हुए दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई के निर्देश दिए हैं, जिसके तहत कुछ अफसरों को निलंबित भी किया गया है।

स्वच्छता मॉडल पर उठते बड़े प्रश्न

यह घटना सिर्फ एक क्षेत्र या एक शहर की समस्या नहीं है, बल्कि पूरे स्वच्छता मॉडल की समीक्षा की मांग करती है। क्या रैंकिंग और पुरस्कार वास्तविक व्यवस्थागत सुधार का विकल्प बन सकते हैं? या फिर ये केवल दिखावटी उपलब्धियां हैं, जिनके पीछे गंभीर खामियां छिपी रहती हैं?

स्वच्छता का अर्थ केवल दृश्य साफ-सफाई नहीं, बल्कि सुरक्षित पानी, स्वस्थ वातावरण और भरोसेमंद प्रशासन भी है। यदि इनमें से कोई एक कड़ी कमजोर होती है, तो पूरा तंत्र विफल हो जाता है।

निष्कर्ष: चेतावनी और अवसर, दोनों

इंदौर का जल संकट एक कड़ी चेतावनी है—प्रशासन के लिए भी और राजनीति के लिए भी। यह समय आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर वास्तविक सुधारों पर ध्यान देने का है। नागरिकों को भी सजग रहना होगा और बुनियादी सुविधाओं में पारदर्शिता की मांग मजबूती से उठानी होगी।

यदि इस त्रासदी से सही सबक लिया गया, तो यही संकट भविष्य में एक बेहतर और सुरक्षित शहरी व्यवस्था की नींव भी बन सकता है।


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