
वित्त वर्ष 2025–26 की पहली आठ महीनों की अवधि (अप्रैल–नवंबर 2025) में भारत की राजकोषीय तस्वीर एक बार फिर केंद्र में आ गई है। इस दौरान केंद्र सरकार का वित्तीय घाटा बढ़कर ₹9.77 लाख करोड़ तक पहुँच गया, जो पूरे वर्ष के बजट अनुमान का लगभग 62 प्रतिशत है। यह आंकड़ा बीते वर्ष की समान अवधि की तुलना में उल्लेखनीय रूप से अधिक है, जब घाटा ₹8.47 लाख करोड़ के आसपास था।
यह वृद्धि केवल संख्यात्मक नहीं, बल्कि नीति-स्तर पर एक बड़े संकेत के रूप में भी देखी जा रही है।
📊 बढ़ता घाटा क्यों? — पूंजीगत खर्च की तेज़ रफ्तार
वित्तीय घाटे में इस उछाल का प्रमुख कारण सरकार द्वारा किए गए अग्रिम और आक्रामक पूंजीगत निवेश हैं। FY26 की इस अवधि में पूंजीगत व्यय में लगभग 28% की वार्षिक बढ़ोतरी दर्ज की गई।
सरकार का फोकस साफ़ है—
- बुनियादी ढांचा
- सड़क, रेलवे और लॉजिस्टिक्स
- ऊर्जा और हरित परियोजनाएँ
- डिजिटल सार्वजनिक ढांचे का विस्तार
यह रणनीति अल्पकाल में खर्च बढ़ाती है, लेकिन इसका लक्ष्य दीर्घकालिक आर्थिक क्षमता को मजबूत करना है।
💰 आय पक्ष की सच्चाई: अपेक्षाओं से पीछे
जहाँ व्यय तेज़ी से आगे बढ़ा, वहीं राजस्व संग्रह की गति अपेक्षाकृत सुस्त रही। कर प्राप्तियों में वह तेजी देखने को नहीं मिली, जिसकी उम्मीद बजट अनुमानों में की गई थी।
हालाँकि,
- भारतीय रिज़र्व बैंक से प्राप्त उच्च लाभांश
- कुछ गैर-ऋण आधारित प्राप्तियाँ
इन कारकों ने अस्थायी राहत ज़रूर दी, लेकिन कुल मिलाकर राजस्व पक्ष सरकार के लिए एक चुनौती बना हुआ है।
🧮 वित्तीय घाटा — सरल शब्दों में
वित्तीय घाटा तब होता है जब सरकार का कुल खर्च, उसकी कुल आय से अधिक हो जाता है। इस अंतर को पूरा करने के लिए सरकार को बाज़ार से उधार लेना पड़ता है, जिससे सार्वजनिक ऋण में वृद्धि होती है।
इसलिए, घाटे का स्तर केवल एक आर्थिक आंकड़ा नहीं, बल्कि भविष्य की उधारी और ब्याज बोझ का संकेत भी होता है।
🏗️ निवेश को प्राथमिकता: उपभोग से आगे की सोच
FY26 के आंकड़े यह स्पष्ट करते हैं कि सरकार ने तात्कालिक उपभोग बढ़ाने के बजाय निवेश-प्रेरित विकास मॉडल को चुना है।
यह दृष्टिकोण:
- अल्पकाल में राजकोषीय दबाव पैदा कर सकता है
- लेकिन मध्यम और दीर्घ अवधि में
- उत्पादकता
- निजी निवेश
- और रोजगार सृजन
को गति देने की क्षमता रखता है।
🏛️ राज्यों की भूमिका: नए संतुलन की तलाश
GST मुआवजा व्यवस्था के समाप्त होने के बाद राज्यों के सामने अपनी राजस्व क्षमता बढ़ाने और उधारी अनुशासन बनाए रखने की दोहरी जिम्मेदारी है।
केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय समन्वय अब और अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। यदि राज्य अपने कर आधार को मजबूत करते हैं और विवेकपूर्ण खर्च नीति अपनाते हैं, तो समग्र सरकारी वित्त को स्थिर रखा जा सकता है।
✍️ निष्कर्ष
FY26 में भारत का बढ़ता वित्तीय घाटा न तो केवल खतरे की घंटी है और न ही पूरी तरह नकारात्मक संकेत। यह एक संक्रमणकालीन अवस्था को दर्शाता है—जहाँ सरकार भविष्य के विकास की नींव रखने के लिए आज अधिक खर्च करने को तैयार है।
आने वाले महीनों में यह तय होगा कि
- कर संग्रह की दिशा
- पूंजीगत व्यय की गुणवत्ता
- और राज्यों की वित्तीय भागीदारी
इस संतुलन को किस ओर ले जाती है—स्थिरता की ओर या दबाव की ओर।