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अखिलेश यादव के ट्वीट से गरमाई राजनीति: दवा जांच पर सवाल और गायों की मौत का मुद्दा


उत्तर प्रदेश में पशु स्वास्थ्य को लेकर एक बार फिर सियासी घमासान तेज हो गया है। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव के हालिया ट्वीट ने न सिर्फ सरकार की कार्यशैली पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि गायों की मौत जैसे संवेदनशील मुद्दे को दोबारा राजनीतिक और सामाजिक बहस के केंद्र में ला दिया है।

वीडियो ट्वीट और सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल

अखिलेश यादव द्वारा साझा किए गए एक वीडियो में दूध से भरे बड़े कंटेनरों की गहन जांच होती दिखाई देती है। इसी दृश्य को आधार बनाते हुए उन्होंने तंज कसा कि यदि पशुओं के लिए इस्तेमाल होने वाली दवाओं और सिरप की जांच भी इसी स्तर की गंभीरता से की जाती, तो हालात इतने भयावह न होते।

यह टिप्पणी हाल के महीनों में प्रदेश और पड़ोसी राज्यों में हुई बड़ी संख्या में गायों की मौतों से जोड़कर देखी जा रही है, जिनका मुख्य कारण लंपी वायरस बताया जा रहा है।

लंपी वायरस: बीमारी से बड़ा प्रशासनिक सवाल

लंपी वायरस पशुओं में त्वचा पर गांठ, तेज बुखार और अंततः मौत का कारण बन रहा है। उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य भारत के कई इलाकों में इस बीमारी ने पशुपालकों की कमर तोड़ दी है।

हालांकि सरकारी स्तर पर टीकाकरण और जागरूकता अभियानों की बात कही जा रही है, विपक्ष का आरोप है कि ये प्रयास न तो समय पर हुए और न ही ज़मीनी स्तर पर प्रभावी साबित हुए।

अखिलेश यादव के ट्वीट को इसी प्रशासनिक ढिलाई की आलोचना के रूप में देखा जा रहा है, जहां दवाओं की गुणवत्ता, सप्लाई और निगरानी प्रणाली पर सवाल उठाए गए हैं।

मीडिया और राजनीतिक हलकों की प्रतिक्रिया

इस मुद्दे पर पत्रकार और सामाजिक टिप्पणीकारों ने भी चिंता जताई है। कुछ सवाल यह भी उठा रहे हैं कि जब गायों की मौत राजनीतिक मुद्दा बनती है, तो क्या उसका वास्तविक उद्देश्य पशु कल्याण है या केवल सियासी लाभ?

विपक्षी दलों का कहना है कि सरकार प्रतीकात्मक कार्रवाइयों और दिखावटी जांचों में व्यस्त है, जबकि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पशुपालन और किसानों की वास्तविक समस्याएं हाशिये पर चली गई हैं। इससे पहले बसपा प्रमुख मायावती भी लंपी वायरस को लेकर सरकार की तैयारियों पर सवाल उठा चुकी हैं।

ज़मीनी समाधान क्या हो सकते हैं?

विशेषज्ञ मानते हैं कि इस तरह की आपदाओं से निपटने के लिए राजनीतिक बयानबाज़ी से आगे बढ़कर ठोस कदम उठाने होंगे, जैसे—

निष्कर्ष

अखिलेश यादव का ट्वीट केवल सरकार पर हमला नहीं, बल्कि एक बड़े सवाल की ओर इशारा करता है—क्या पशु स्वास्थ्य को उतनी ही प्राथमिकता मिल रही है, जितनी नीतिगत घोषणाओं में दिखाई देती है?

गायों की मौत, दवाओं की गुणवत्ता और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे मुद्दे किसी एक दल तक सीमित नहीं हैं। ये ग्रामीण भारत, किसानों और पशुपालकों के जीवन से सीधे जुड़े विषय हैं। यदि सरकार इन पर गंभीर और व्यावहारिक कदम उठाती है, तो भरोसे की बहाली के साथ-साथ भविष्य की ऐसी त्रासदियों को भी रोका जा सकता है।


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