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वेजिटेटिव अवस्था में पति की जिम्मेदारी पत्नी को सौंपने की न्यायिक पहल


दिल्ली उच्च न्यायालय का मानवीय और दूरदर्शी निर्णय

दिल्ली उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक ऐसा फैसला सुनाया है, जो कानून की संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण दोनों को मजबूती से सामने लाता है। न्यायमूर्ति सचिन दत्ता की पीठ ने प्रोफेसर अल्का आचार्य को उनके पति सलाम खान का विधिक संरक्षक नियुक्त करते हुए यह स्पष्ट किया कि जब कोई व्यक्ति जीवन के ऐसे दौर में पहुंच जाए जहाँ वह स्वयं निर्णय लेने में असमर्थ हो, तब कानून को परिवार के हित में आगे आना चाहिए।


मामला कैसे अदालत तक पहुँचा?

सलाम खान को फरवरी 2025 में अचानक ब्रेन हेमरेज हुआ, जिसके बाद उन्हें तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया गया। चिकित्सकीय प्रयासों के बावजूद उनकी चेतना लौट नहीं सकी। कई अस्पतालों में उपचार के बाद अब वे घर पर चिकित्सकीय निगरानी में हैं। उनकी स्थिति ऐसी है कि वे न तो संवाद कर सकते हैं और न ही अपने शारीरिक या आर्थिक मामलों पर कोई निर्णय लेने की स्थिति में हैं। श्वसन और पोषण के लिए उन्हें चिकित्सकीय उपकरणों पर निर्भर रहना पड़ रहा है।


पत्नी की याचिका और न्यायालय की भूमिका

इस जटिल परिस्थिति में उनकी पत्नी, प्रोफेसर अल्का आचार्य ने न्यायालय का रुख किया। उन्होंने अपने पति के इलाज, दैनिक देखभाल, आर्थिक दायित्वों और संपत्ति से जुड़े मामलों को संभालने के लिए विधिक अधिकार की मांग की। अदालत ने सभी तथ्यों, मेडिकल रिपोर्ट्स और परिस्थितियों का गहन अध्ययन करने के बाद उनकी अपील को स्वीकार किया।


संरक्षक नियुक्ति के तहत मिले अधिकार

अदालत के निर्णय के अनुसार, प्रोफेसर अल्का आचार्य को निम्न अधिकार प्रदान किए गए:

यह सभी अधिकार उनके पति की भलाई और सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित करने के उद्देश्य से दिए गए हैं।


निर्णय का व्यापक सामाजिक महत्व

यह फैसला उन परिवारों के लिए एक मार्गदर्शक बन सकता है, जो ऐसे ही असहाय हालात का सामना कर रहे हैं। न्यायालय ने यह संदेश दिया है कि कानून केवल नियमों का संग्रह नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा की रक्षा का माध्यम भी है। जब व्यक्ति स्वयं अपनी आवाज़ नहीं उठा सकता, तब न्यायपालिका को उसके हित में खड़ा होना चाहिए।


एक जीवनसाथी की संवेदनशील जिम्मेदारी

प्रोफेसर अल्का आचार्य का यह कदम केवल कानूनी नहीं, बल्कि नैतिक साहस का भी उदाहरण है। उन्होंने साबित किया कि भावनात्मक समर्पण के साथ-साथ कानूनी सजगता भी संकट के समय अत्यंत आवश्यक होती है। उनका संघर्ष उन तमाम परिवारों के लिए प्रेरणा है, जो अपनों के लिए कठिन फैसले लेने से हिचकते हैं।


निष्कर्ष

दिल्ली उच्च न्यायालय का यह निर्णय भारतीय न्याय प्रणाली की करुणा, समझ और व्यावहारिकता को दर्शाता है। ऐसे फैसले यह विश्वास मजबूत करते हैं कि न्याय केवल दंड देने का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन की जटिल परिस्थितियों में सहारा बनने की शक्ति भी रखता है।

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