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देहरादून में 04 जनवरी को न्याय की हुंकार


अंकिता भंडारी प्रकरण में सीबीआई जांच और प्रभावशाली आरोपियों की गिरफ्तारी को लेकर जनता सड़क पर

उत्तराखंड की शांत पहाड़ियों में एक बार फिर आक्रोश की गूंज सुनाई देने वाली है। अंकिता भंडारी हत्याकांड को लेकर 04 जनवरी 2026 को देहरादून का परेड ग्राउंड जनाक्रोश का केंद्र बनेगा। इस दिन हजारों लोग मुख्यमंत्री आवास की ओर कूच कर निष्पक्ष जांच और प्रभावशाली व्यक्तियों की गिरफ्तारी की मांग उठाएंगे। आयोजकों का कहना है कि यह आंदोलन केवल एक केस नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा सवाल है।


❖ कौन थीं अंकिता भंडारी?

अंकिता भंडारी उत्तराखंड की एक साधारण परिवार से आने वाली 19 वर्षीय युवती थीं, जो ऋषिकेश के पास स्थित वनंतरा रिसॉर्ट में रिसेप्शनिस्ट के तौर पर कार्यरत थीं। सितंबर 2022 में उनके अचानक लापता होने और बाद में हत्या की पुष्टि ने पूरे देश को झकझोर दिया। इस मामले में रिसॉर्ट संचालक पुलकित आर्य सहित तीन लोगों को दोषी ठहराया गया और कोटद्वार न्यायालय ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई।


❖ सजा के बाद भी क्यों खत्म नहीं हुआ सवाल?

हालांकि अदालत का फैसला आ चुका है, लेकिन जनमानस में यह सवाल लगातार बना हुआ है कि क्या पूरे सच से पर्दा उठा? आरोप है कि मामले में एक कथित प्रभावशाली व्यक्ति (VIP) की भूमिका की जांच नहीं हुई या जानबूझकर उसे नजरअंदाज किया गया। पीड़िता की मां और कई सामाजिक संगठनों का कहना है कि साक्ष्य नष्ट किए गए और जांच को सीमित दायरे में रखा गया।


❖ सामाजिक संगठनों के गंभीर आरोप

सामाजिक कार्यकर्ता योगिता भयाना ने खुलकर आरोप लगाया है कि मामले से जुड़े कुछ अहम सबूतों को बुलडोजर कार्रवाई के जरिए मिटाया गया। उन्होंने यह भी कहा कि राजनीतिक संरक्षण के कारण कुछ नामों को जांच से बाहर रखा गया। इसी वजह से अब पुनः जांच की मांग जोर पकड़ रही है।


❖ 04 जनवरी का आंदोलन: जनता बनाम व्यवस्था

देहरादून में प्रस्तावित इस प्रदर्शन को कई सामाजिक संगठनों, महिला समूहों और विपक्षी दलों का समर्थन प्राप्त है। आंदोलन की प्रमुख मांगें हैं:

राजनीतिक स्तर पर भी यह मुद्दा तूल पकड़ चुका है। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया के जरिए नैतिक समर्थन जताया है, जिससे आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है।


❖ सत्ता और विपक्ष के बीच घमासान

जहां सत्तारूढ़ दल की ओर से अब तक जांच को पर्याप्त बताया गया है, वहीं विपक्षी दलों का आरोप है कि सरकार सच्चाई सामने आने से रोक रही है। कांग्रेस, यूकेडी और कुछ भाजपा के भीतर के नेता भी सीबीआई जांच की मांग कर चुके हैं, जिससे राजनीतिक दबाव बढ़ता नजर आ रहा है।


❖ निष्कर्ष: न्याय की अधूरी कहानी?

अंकिता भंडारी हत्याकांड अब केवल एक आपराधिक घटना नहीं रहा। यह सवाल बन गया है—क्या कानून सबके लिए बराबर है? 04 जनवरी को देहरादून की सड़कों पर उतरने वाला जनसैलाब इसी सवाल का जवाब मांग रहा है। अगर सरकार ने पारदर्शी और निष्पक्ष कदम नहीं उठाए, तो यह आंदोलन आने वाले दिनों में और व्यापक रूप ले सकता है।


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