
नए आपराधिक कानूनों की प्रदर्शनी और भारत की तकनीक-आधारित न्याय व्यवस्था
भारत की न्याय प्रणाली को आधुनिक स्वरूप देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण क्षण तब सामने आया, जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 4 जनवरी 2026 को अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के श्री विजयपुरम में तीन नए आपराधिक कानूनों पर आधारित विशेष प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। यह आयोजन केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह संकेत था कि देश अब न्याय को तेज, पारदर्शी और वैज्ञानिक बनाने के दौर में प्रवेश कर चुका है।
🚔 त्वरित न्याय की ओर ठोस कदम
अपने संबोधन में गृह मंत्री ने कहा कि नए आपराधिक कानूनों का उद्देश्य आम नागरिक को समय पर और निष्पक्ष न्याय उपलब्ध कराना है। ई-एफआईआर और ज़ीरो एफआईआर जैसी व्यवस्थाओं को कानूनी रूप देने से अब पीड़ित को थाने की सीमाओं में नहीं बांधा जाएगा। इसके साथ ही डिजिटल प्रक्रियाओं के माध्यम से जांच और सुनवाई को अधिक सटीक बनाया गया है।
🧪 फॉरेंसिक साक्ष्य को मिली केंद्रीय भूमिका
अमित शाह ने स्पष्ट किया कि अब अपराध की जांच केवल बयान या अनुमान के आधार पर नहीं होगी, बल्कि वैज्ञानिक प्रमाणों को प्राथमिकता दी जाएगी। इसी उद्देश्य से सरकार ने अगले पांच वर्षों में करीब ₹30,000 करोड़ के निवेश की योजना बनाई है, ताकि देश के कोने-कोने में आधुनिक फॉरेंसिक प्रयोगशालाएं स्थापित की जा सकें।
🎓 ज्ञान और कौशल का राष्ट्रीय विस्तार
नए कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए प्रशिक्षित मानव संसाधन को जरूरी बताते हुए गृह मंत्री ने कहा कि आने वाले वर्षों में हर साल लगभग 35,000 फॉरेंसिक विशेषज्ञ तैयार किए जाएंगे। इसके लिए राष्ट्रीय फॉरेंसिक विज्ञान विश्वविद्यालय (NFSU) के कैंपस विभिन्न राज्यों में स्थापित किए जाएंगे, जिससे वैज्ञानिक जांच की क्षमता में बड़ा विस्तार होगा।
🏛️ नागरिकों और अधिकारियों के लिए सीखने का मंच
यह प्रदर्शनी केवल कानून की जानकारी देने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बताती है कि नए आपराधिक कानून किस प्रकार नागरिक अधिकारों की सुरक्षा करते हुए न्याय प्रक्रिया को अधिक भरोसेमंद बना रहे हैं। गृह मंत्री ने अंडमान-निकोबार के निवासियों, पुलिस अधिकारियों और न्यायिक क्षेत्र से जुड़े सभी लोगों से इस प्रदर्शनी को देखने का आग्रह किया।
⚙️ एकरूपता और विश्वसनीयता की दिशा में प्रयास
कार्यक्रम के दौरान यह जानकारी भी साझा की गई कि फॉरेंसिक जांच के लिए एक समान वैज्ञानिक मानक तय किए गए हैं, ताकि पूरे देश में जांच की गुणवत्ता में समानता बनी रहे। इससे न केवल मामलों की सच्चाई सामने आएगी, बल्कि अदालतों में सबूतों की विश्वसनीयता भी बढ़ेगी।
निष्कर्ष
अंडमान और निकोबार में आयोजित यह प्रदर्शनी भारत की बदलती न्यायिक सोच का प्रतीक है। तकनीक, विज्ञान और कानून के समन्वय से तैयार यह नया ढांचा आने वाले समय में न्याय को अधिक तेज, पारदर्शी और जन-केंद्रित बनाने में अहम भूमिका निभाएगा।