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धर्मशाला में कॉलेज छात्रा की मौत पर उबाल: सीपीआई(एम) ने उठाई न्याय और जवाबदेही की आवाज़


धर्मशाला (हिमाचल प्रदेश) में एक सरकारी कॉलेज की दलित छात्रा की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मृत्यु ने न सिर्फ स्थानीय समुदाय को झकझोर दिया है, बल्कि राज्य की उच्च शिक्षा प्रणाली की संवेदनशीलता और सुरक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। यह मामला अब व्यक्तिगत त्रासदी से आगे बढ़कर सामाजिक और संस्थागत विफलता की बहस बन चुका है।

🚩 सीपीआई(एम) का प्रतिरोध और सार्वजनिक आक्रोश

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने इस घटना को लेकर धर्मशाला में विरोध प्रदर्शन किया। कार्यकर्ताओं और नेताओं ने कॉलेज परिसरों में रैगिंग और उत्पीड़न के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग करते हुए आरोप लगाया कि संबंधित संस्थान और प्रशासन ने शुरू में मामले को गंभीरता से नहीं लिया। उनका कहना है कि यदि समय रहते हस्तक्षेप होता, तो हालात इतने भयावह न होते।

🧾 घटना की पृष्ठभूमि

जानकारी के अनुसार, 19 वर्षीय छात्रा सरकारी डिग्री कॉलेज में स्नातक द्वितीय वर्ष में पढ़ रही थी। परिवार के आरोप हैं कि उसे लंबे समय तक सहपाठी छात्राओं और एक शिक्षक द्वारा अपमान, दबाव और उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। लगातार मानसिक तनाव के चलते उसकी तबीयत बिगड़ती चली गई और इलाज के दौरान दिसंबर 2025 में उसकी मौत हो गई। परिजनों का कहना है कि छात्रा ने कई बार अपनी परेशानी साझा की थी, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।

⚖️ जांच, एफआईआर और अदालत का रुख

पीड़िता के पिता की शिकायत के आधार पर पुलिस ने तीन छात्राओं और एक प्राध्यापक के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता तथा हिमाचल प्रदेश रैगिंग निषेध अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया। अदालत ने संबंधित प्रोफेसर को सीमित शर्तों के साथ अंतरिम राहत दी है और उन्हें जांच में पूर्ण सहयोग करने का निर्देश दिया गया है। मामले की अगली सुनवाई जनवरी मध्य में प्रस्तावित है।

🏛️ राज्य सरकार का पक्ष

राज्य सरकार ने घटना की गंभीरता को देखते हुए एक जांच समिति के गठन की घोषणा की है। सरकार का कहना है कि रिपोर्ट आने के बाद दोषियों के खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएंगे और यह सुनिश्चित किया जाएगा कि भविष्य में ऐसी घटनाएं दोहराई न जाएं।

🎓 शिक्षा व्यवस्था के लिए चेतावनी

यह मामला सिर्फ एक कॉलेज या एक परिवार तक सीमित नहीं है। यह उस वास्तविकता को उजागर करता है, जहां कानून और नियमों के बावजूद कमजोर तबके के छात्र आज भी सुरक्षित महसूस नहीं करते। रैगिंग और भेदभाव के खिलाफ बनी नीतियां तभी प्रभावी होंगी, जब उन्हें संस्थानों में ईमानदारी से लागू किया जाए।

✍️ निष्कर्ष

धर्मशाला की यह घटना शिक्षा के नाम पर चल रही असंवेदनशीलता पर करारा तमाचा है। सीपीआई(एम) का विरोध केवल एक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि एक सामूहिक चेतावनी है कि अगर जवाबदेही तय नहीं हुई, तो भरोसा टूटता जाएगा। जरूरत है कि शैक्षणिक संस्थानों को डर और चुप्पी नहीं, बल्कि सुरक्षा और सम्मान का स्थान बनाया जाए।


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