
भारत की रक्षा और एयरोस्पेस क्षमता ने बीते कुछ दशकों में जिस आत्मविश्वास के साथ उड़ान भरी है, उसका सबसे सशक्त प्रतीक स्वदेशी लड़ाकू विमान एलसीए तेजस है। इसी गौरवशाली यात्रा के 25 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर बेंगलुरु में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी “एरोनॉटिक्स–2047” न केवल अतीत की उपलब्धियों का उत्सव बनी, बल्कि भारत की भावी हवाई शक्ति की स्पष्ट रूपरेखा भी प्रस्तुत करती है।
राष्ट्रीय सोच का मंच बना एरोनॉटिक्स–2047
4 और 5 जनवरी 2026 को आयोजित इस संगोष्ठी का उद्देश्य था—भारत की एरोनॉटिक्स और एयरोस्पेस तकनीक को स्वतंत्रता के 100वें वर्ष यानी 2047 तक वैश्विक नेतृत्व के स्तर पर पहुँचाना। इस आयोजन ने वैज्ञानिकों, वायुसेना नेतृत्व, नीति निर्माताओं और उद्योग जगत को एक साझा मंच प्रदान किया, जहाँ भविष्य की चुनौतियों और संभावनाओं पर गंभीर मंथन हुआ।
कार्यक्रम का उद्घाटन वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल ए.पी. सिंह द्वारा किया गया। उनके साथ रक्षा अनुसंधान एवं विकास क्षेत्र के अनेक प्रतिष्ठित चेहरे भी उपस्थित रहे, जिनमें DRDO और ISRO के शीर्ष नेतृत्व शामिल थे। यह उपस्थिति इस बात का संकेत थी कि भारत का रक्षा और अंतरिक्ष भविष्य अब साझा दृष्टि और समन्वित प्रयासों से आगे बढ़ रहा है।
तेजस: एक विमान नहीं, एक राष्ट्रीय संकल्प
एलसीए तेजस केवल एक लड़ाकू विमान नहीं है, बल्कि यह भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता की जीवंत कहानी है। इसकी परिकल्पना से लेकर परिचालन तैनाती तक की यात्रा आसान नहीं रही, लेकिन हर चुनौती ने देश की वैज्ञानिक क्षमता को और मजबूत किया।
संगोष्ठी के दौरान तेजस परियोजना से जुड़े उन महान व्यक्तित्वों को सम्मानित किया गया, जिन्होंने इस स्वप्न को साकार करने में निर्णायक भूमिका निभाई। इनमें तेजस के मुख्य वास्तुकार, पहले परीक्षण उड़ान को अंजाम देने वाले पायलट, उड़ान परीक्षण कार्यक्रम के मार्गदर्शक और HAL के नेतृत्व से जुड़े अनुभवी विशेषज्ञ शामिल थे। उनका सम्मान दरअसल उस सामूहिक प्रयास का सम्मान था, जिसने भारत को विदेशी निर्भरता से आगे बढ़ने का साहस दिया।
25 वर्षों की उपलब्धियाँ और सीख
तेजस की 25 वर्ष की यात्रा भारत के रक्षा अनुसंधान मॉडल की कई महत्वपूर्ण सीखों को सामने लाती है—
- दीर्घकालिक दृष्टि और धैर्य का महत्व
- स्वदेशी तकनीक विकसित करने में आने वाली जटिलताओं की समझ
- सेना, वैज्ञानिक संस्थानों और उद्योग के बीच तालमेल की आवश्यकता
आज तेजस भारतीय वायुसेना की परिचालन क्षमता का अभिन्न हिस्सा है और इसके उन्नत संस्करण भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर विकसित किए जा रहे हैं।
2047 की ओर उड़ान: भविष्य की तैयारी
“एरोनॉटिक्स–2047” संगोष्ठी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू था भविष्य पर केंद्रित विमर्श। इसमें उन्नत लड़ाकू विमानों, मानव–रहित प्रणालियों, स्वदेशी इंजन विकास, स्टील्थ तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे विषयों पर गहन विचार-विमर्श हुआ। स्पष्ट संदेश यह था कि आने वाले वर्षों में भारत केवल उपयोगकर्ता नहीं, बल्कि तकनीक निर्माता और निर्यातक के रूप में उभरेगा।
निष्कर्ष
तेजस की 25वीं वर्षगांठ और एरोनॉटिक्स–2047 संगोष्ठी, दोनों मिलकर एक ही बात को रेखांकित करते हैं—भारत अब अपनी हवाई शक्ति को लेकर आत्मविश्वासी है और भविष्य को लेकर महत्वाकांक्षी भी। यह आयोजन अतीत की उपलब्धियों को नमन करने के साथ-साथ आने वाले दशकों की दिशा तय करने वाला क्षण सिद्ध हुआ।
जब भारत 2047 की ओर बढ़ रहा है, तब तेजस जैसी परियोजनाएँ यह विश्वास दिलाती हैं कि देश की उड़ान अब सीमित नहीं, बल्कि वैश्विक आकाश तक पहुँचने के लिए तैयार है।