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328 पवित्र ‘सरूप’ लापता: पंजाब में आस्था से जुड़ा मामला और एसआईटी की परत-दर-परत जांच


पंजाब में सिख समुदाय की धार्मिक भावनाओं से जुड़ा एक अत्यंत संवेदनशील मुद्दा एक बार फिर सुर्खियों में है। श्री गुरु ग्रंथ साहिब के 328 ‘सरूपों’ के लापता होने की जांच कर रही विशेष जांच टीम (एसआईटी) ने हाल के दिनों में कार्रवाई तेज करते हुए दो लोगों को हिरासत में लिया है। इस घटनाक्रम ने न केवल धार्मिक संस्थानों की कार्यप्रणाली पर, बल्कि प्रशासनिक और राजनीतिक जवाबदेही पर भी गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।

पूरा प्रकरण क्या है?

यह मामला अमृतसर के सी-डिवीजन थाने में दर्ज एक प्राथमिकी से संबंधित है, जिसमें पवित्र ग्रंथों के अनुचित रख-रखाव, बिना वैधानिक अनुमति प्रतिलिपि तैयार करने और उनके गलत भंडारण जैसे आरोप सामने आए थे। जांच में कुल 16 संदिग्धों की भूमिका उजागर हुई, जिनमें से दो अब इस दुनिया में नहीं हैं, जबकि शेष के संबंध में तथ्य जुटाए जा रहे हैं।

एसआईटी की हालिया गिरफ्तारी

जांच एजेंसी ने अब तक दो व्यक्तियों—सतिंदर सिंह कोहली और कंवलजीत सिंह (उर्फ कवलजीत)—को गिरफ्तार किया है। कंवलजीत सिंह को 3 जनवरी 2026 को हिरासत में लिया गया। प्रारंभिक पूछताछ में सामने आया है कि वह पवित्र ग्रंथों के प्रबंधन से जुड़ी व्यवस्था में सहायक भूमिका में था, और कथित तौर पर नियमों के उल्लंघन में उसकी सक्रिय भागीदारी रही।

छापेमारी और बरामदगी

एसआईटी ने जांच के दायरे को बढ़ाते हुए राज्य के विभिन्न जिलों—चंडीगढ़, अमृतसर, गुरदासपुर, रोपड़, तरनतारण और आसपास के ग्रामीण इलाकों—में एक साथ कई स्थानों पर छापे मारे। इस कार्रवाई के दौरान मोबाइल फोन, टैबलेट, लैपटॉप, डिजिटल स्टोरेज उपकरण और महत्वपूर्ण कागजात जब्त किए गए, जिन्हें जांच के लिए फोरेंसिक लैब भेजा गया है।

डिजिटल और आर्थिक कड़ियों की पड़ताल

जांच अब सिर्फ भौतिक सबूतों तक सीमित नहीं है। डिजिटल डेटा के विश्लेषण के साथ-साथ संदिग्ध वित्तीय लेन-देन की भी जांच की जा रही है। कुछ भुगतान रिकॉर्ड ऐसे सामने आए हैं, जिनमें राजनीतिक पृष्ठभूमि से जुड़े नाम भी परोक्ष रूप से जुड़े बताए जा रहे हैं। इन लेन-देनों की सटीक भूमिका और उद्देश्य को स्पष्ट करने के लिए गहन जांच जारी है।

आगे क्या?

एसआईटी अधिकारियों का कहना है कि यह जांच धार्मिक आस्था के सम्मान और कानूनी जवाबदेही—दोनों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। आने वाले समय में और लोगों से पूछताछ, अतिरिक्त गिरफ्तारियां और नई बरामदगी संभव मानी जा रही है। यह मामला न केवल पवित्र ग्रंथों की सुरक्षा से जुड़ा है, बल्कि यह यह भी दिखाता है कि धार्मिक संस्थानों में पारदर्शिता और नियमों का पालन कितना जरूरी है।


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