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कोरोना और विश्व व्यवस्था: एक महामारी जिसने सत्ता, समाज और सोच को बदल दिया


कोरोना महामारी केवल एक स्वास्थ्य संकट नहीं थी, बल्कि यह वैश्विक व्यवस्था के लिए एक ऐसी परीक्षा सिद्ध हुई जिसने दुनिया की राजनीतिक संरचना, आर्थिक संतुलन और सामाजिक प्राथमिकताओं को गहराई से झकझोर दिया। 21वीं सदी में पहली बार मानवता ने सामूहिक रूप से महसूस किया कि विज्ञान, विकास और वैश्वीकरण के बावजूद विश्व कितना असुरक्षित और असंतुलित है।

वैश्वीकरण पर महामारी की चोट

कोरोना से पहले विश्व एक ‘ग्लोबल विलेज’ की तरह कार्य कर रहा था। अंतरराष्ट्रीय व्यापार, आवागमन और आपूर्ति-श्रृंखलाएं निरंतर विस्तार में थीं। लेकिन महामारी ने सीमाओं को पुनः सशक्त कर दिया। देशों ने अपने नागरिकों और संसाधनों को प्राथमिकता देना शुरू किया, जिससे वैश्वीकरण की अवधारणा आत्ममंथन के दौर में पहुंच गई।

विश्व राजनीति में बदलते समीकरण

कोरोना काल में वैश्विक नेतृत्व की असली परीक्षा हुई। विकसित देशों की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की कमजोरियां उजागर हुईं, जबकि कुछ विकासशील देशों ने बेहतर समन्वय और अनुशासन का परिचय दिया। अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं जैसे WHO आलोचना के केंद्र में आईं, जिससे वैश्विक शासन प्रणाली की प्रभावशीलता पर नए प्रश्न खड़े हुए।

आर्थिक व्यवस्था का पुनर्संयोजन

लॉकडाउन, उत्पादन ठप होने और रोजगार संकट ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को गहरी चोट पहुंचाई। लेकिन इसी संकट ने “लोकल टू ग्लोबल” जैसी अवधारणाओं को जन्म दिया। आत्मनिर्भरता, डिजिटल अर्थव्यवस्था और वैकल्पिक आपूर्ति-मार्ग विश्व की नई आर्थिक सोच बनकर उभरे।

समाज और संस्कृति में परिवर्तन

कोरोना ने केवल बाजार नहीं बदले, बल्कि समाज की कार्य संस्कृति भी बदल दी। वर्क फ्रॉम होम, ऑनलाइन शिक्षा और डिजिटल स्वास्थ्य सेवाएं सामान्य हो गईं। साथ ही, सामाजिक दूरी ने यह भी सिखाया कि तकनीक भले ही जोड़ती हो, मानवीय संवेदना का विकल्प नहीं बन सकती।

विज्ञान, तकनीक और नैतिकता

टीकों के विकास ने विज्ञान की ताकत साबित की, लेकिन वैक्सीन राष्ट्रवाद ने नैतिक सवाल भी खड़े किए। क्या संकट में मानवता समान हो सकती है? यह प्रश्न विश्व व्यवस्था के भविष्य को परिभाषित करता है।

निष्कर्ष

कोरोना महामारी एक चेतावनी थी—कि विश्व को केवल आर्थिक या सैन्य शक्ति नहीं, बल्कि सहयोग, पारदर्शिता और करुणा से मजबूत किया जा सकता है। आने वाली विश्व व्यवस्था अधिक संतुलित, आत्मनिर्भर और मानव-केंद्रित होगी या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि दुनिया ने कोरोना से कितना सीखा।


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