
दिल्ली उच्च न्यायालय में 5 जनवरी 2026 को नितीश कटारा हत्याकांड के दोषी विकास यादव की 21 दिनों की फरलो याचिका पर सुनवाई हुई, जिसके बाद अदालत ने अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया। यह मामला महज़ एक कैदी की अस्थायी रिहाई की मांग नहीं है, बल्कि यह भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली की उस कसौटी को छूता है जहाँ व्यक्तिगत अधिकार, पीड़ित पक्ष की सुरक्षा और सामाजिक विश्वास आमने-सामने आ जाते हैं।
विकास यादव का मामला: एक चर्चित पृष्ठभूमि
विकास यादव, पूर्व राजनेता डी.पी. यादव के पुत्र हैं और उन्हें बहुचर्चित नितीश कटारा हत्या प्रकरण में दोषी ठहराया गया था। यह केस इसलिए भी ऐतिहासिक रहा क्योंकि इसने यह सवाल उठाया कि क्या रसूख और राजनीतिक प्रभाव न्याय प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं। अदालत ने उन्हें 25 साल की कठोर सजा सुनाई थी, और वे दो दशकों से अधिक समय से जेल में बंद हैं।
फरलो की याचिका: आधार और दलीलें
फरलो के लिए दाख़िल याचिका में विकास यादव ने हाल ही में हुए अपने विवाह का हवाला देते हुए कहा कि उन्हें सामाजिक और पारिवारिक दायित्व निभाने के लिए अस्थायी रूप से जेल से बाहर आने की अनुमति दी जाए। उनके अधिवक्ता ने तर्क दिया कि जेल के भीतर उनका आचरण संतोषजनक रहा है और दिल्ली जेल नियम, 2018 के अंतर्गत वे फरलो पाने के पात्र हैं।
सरकारी पक्ष और पीड़ित की चिंताएँ
दिल्ली सरकार और पीड़ित पक्ष ने इस मांग का कड़ा विरोध किया। उनका कहना था कि अपराध की प्रकृति अत्यंत गंभीर है और फरलो मिलने की स्थिति में गवाहों की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। विशेष रूप से यह आशंका जताई गई कि प्रमुख गवाहों को डराया-धमकाया जा सकता है या कानून-व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। जेल प्रशासन पहले ही अक्टूबर 2025 में यह कहते हुए याचिका अस्वीकार कर चुका है कि संबंधित नियमों के तहत यादव को फरलो देना उचित नहीं होगा।
न्यायालय के समक्ष संवेदनशील सवाल
न्यायमूर्ति रविंद्र दुडेजा के समक्ष यह मामला आसान नहीं है। अदालत को यह तय करना है कि एक ओर संविधान से प्राप्त अधिकारों का सम्मान कैसे किया जाए, वहीं दूसरी ओर यह सुनिश्चित किया जाए कि पीड़ित पक्ष और समाज की सुरक्षा से कोई समझौता न हो। यही इस याचिका को साधारण कानूनी प्रक्रिया से आगे एक नैतिक और सामाजिक प्रश्न बना देता है।
समापन विचार
विकास यादव की फरलो याचिका पर आने वाला फैसला दूरगामी प्रभाव डाल सकता है। यह न केवल इस मामले से जुड़े पक्षों के लिए अहम होगा, बल्कि भविष्य में गंभीर अपराधों में दोषी ठहराए गए कैदियों की अस्थायी रिहाई से जुड़े न्यायिक दृष्टिकोण को भी दिशा दे सकता है। सवाल यही है—क्या सुधार और मानवीय आधार सुरक्षा चिंताओं से ऊपर रखे जा सकते हैं, या फिर समाजिक न्याय सर्वोपरि रहेगा?