
भारत और अमेरिका के रिश्ते लंबे समय से रणनीतिक सहयोग के रूप में देखे जाते रहे हैं, लेकिन हालिया घटनाओं ने इन संबंधों की प्रकृति पर नए प्रश्न खड़े कर दिए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस बयान—कि “प्रधानमंत्री मोदी मुझे प्रसन्न करना चाहते थे”—ने भारत की विदेश नीति की स्वायत्तता को लेकर राजनीतिक और कूटनीतिक बहस तेज़ कर दी है।
🌍 विदेश नीति का मूल प्रश्न: स्वतंत्र निर्णय या वैश्विक दबाव?
भारत की विदेश नीति पारंपरिक रूप से संतुलन, गुटनिरपेक्षता और राष्ट्रीय हितों पर आधारित रही है। लेकिन मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में, विशेषकर ऊर्जा और व्यापार के क्षेत्र में, यह संतुलन साधना कहीं अधिक जटिल हो गया है। विपक्षी दलों का आरोप है कि हाल के कुछ फैसले संकेत देते हैं कि भारत पर अमेरिकी नीति का प्रभाव बढ़ रहा है।
🛢️ रूसी तेल आयात में बदलाव: नीति का नया मोड़?
2025 के उत्तरार्ध से भारत द्वारा रूस से कच्चे तेल की खरीद में आई गिरावट को लेकर कई सवाल उठे हैं। आलोचकों का कहना है कि यह बदलाव आर्थिक या रणनीतिक ज़रूरत से अधिक, अमेरिका की अपेक्षाओं के अनुरूप दिखाई देता है। वहीं सरकार समर्थकों का तर्क है कि भारत लगातार वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों और विविध आपूर्तिकर्ताओं की ओर बढ़ रहा है, जिससे किसी एक देश पर निर्भरता कम हो।
💼 टैरिफ दबाव और व्यापारिक चुनौतियाँ
इसी दौरान अमेरिका द्वारा भारतीय उत्पादों पर ऊंचे आयात शुल्क लगाए जाने से व्यापारिक समीकरण भी तनावपूर्ण हो गए हैं। निर्यातकों पर बढ़ते दबाव और व्यापार घाटे की चिंता ने यह धारणा बनाई है कि भारत, आर्थिक नुकसान से बचने के लिए, अपने कुछ कूटनीतिक फैसलों में लचीलापन दिखा रहा है।
🗣️ विपक्ष की प्रतिक्रिया: नीति पर सवाल
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने ट्रंप के बयान को भारत के सम्मान और नीति-निर्माण की स्वतंत्रता से जोड़ते हुए सरकार पर हमला बोला है। उनका कहना है कि यदि किसी विदेशी नेता को खुश करने की भावना से फैसले लिए जा रहे हैं, तो यह भारत की वैश्विक छवि और आत्मनिर्भर कूटनीति के लिए चिंताजनक संकेत है।
🌐 बहुध्रुवीय दुनिया में भारत की चुनौती
आज की दुनिया एकध्रुवीय नहीं रही। अमेरिका, चीन, रूस और यूरोपीय शक्तियों के बीच तनाव के बीच भारत को अपनी भूमिका बेहद सावधानी से तय करनी है। बहुपक्षीय संवाद, रणनीतिक साझेदारियां और ऊर्जा सुरक्षा—इन सभी मोर्चों पर संतुलन बनाए रखना भारत के लिए सबसे बड़ी परीक्षा है।
🔎 निष्कर्ष: स्पष्टता और विश्वास की आवश्यकता
ट्रंप के कथन ने भले ही विवाद को जन्म दिया हो, लेकिन असली प्रश्न यह है कि भारत अपने फैसले किन आधारों पर ले रहा है। यदि नीतिगत बदलाव राष्ट्रीय हितों के अनुरूप हैं, तो सरकार को उन्हें स्पष्ट और पारदर्शी ढंग से सामने रखना चाहिए। और यदि कहीं बाहरी दबाव का प्रभाव है, तो उससे निपटने के लिए एक सशक्त और आत्मनिर्भर कूटनीतिक दृष्टि आवश्यक है।
भारत की विदेश नीति आने वाले वर्षों में इसी कसौटी पर आंकी जाएगी—कि वह वैश्विक दबावों के बीच अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता को किस हद तक बनाए रख पाता है।