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दिल्ली हाईकोर्ट का सख़्त रुख: कथित पारिवारिक ड्रग नेटवर्क से जुड़े मामले में महिला को जमानत से किया वंचित


दिल्ली हाईकोर्ट ने संगठित अपराध से जुड़े एक गंभीर प्रकरण में सख़्ती दिखाते हुए एक महिला आरोपी अनुराधा उर्फ़ चिकू को राहत देने से इनकार कर दिया है। अदालत के समक्ष यह मामला महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (MCOCA) के अंतर्गत प्रस्तुत किया गया था, जिसमें आरोप है कि अनुराधा दिल्ली के सुल्तानपुरी इलाके में संचालित एक अवैध मादक पदार्थ नेटवर्क का हिस्सा रही है, जिसका संचालन उसकी मां द्वारा किया जा रहा था।

अदालत की अहम टिप्पणी

मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति संजीव नरूला ने कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड और प्रारंभिक साक्ष्यों को देखते हुए इस स्तर पर यह मानने का कोई ठोस कारण नहीं है कि आरोपी अधिनियम के तहत दोषमुक्त है। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि यदि जमानत दी जाती है, तो गवाहों को प्रभावित करने या साक्ष्यों से छेड़छाड़ की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

अभियोजन का पक्ष

सरकारी वकील ने अदालत को बताया कि जांच के दौरान सह-आरोपी अमित ने स्वीकार किया था कि वह अपनी मां कुसुम, बहन दीपा और अनुराधा के साथ मिलकर नशीले पदार्थों के अवैध कारोबार में संलिप्त था। अभियोजन के अनुसार, यह एक संगठित सिंडिकेट के रूप में काम करता था, जिसमें ड्रग्स की सप्लाई, भंडारण और उससे होने वाले मुनाफे का बंटवारा किया जाता था।

जांच एजेंसियों ने यह भी दावा किया कि अनुराधा के निवास स्थान से बरामद नकदी और कीमती आभूषण इस अवैध गतिविधि से अर्जित धन से जुड़े हो सकते हैं।

MCOCA लागू होने पर बहस

आरोपी की ओर से यह दलील दी गई कि उसके खिलाफ पिछले एक दशक में कोई चार्जशीट दाख़िल नहीं हुई है, इसलिए MCOCA की कठोर धाराएं उस पर लागू नहीं की जा सकतीं। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। न्यायालय ने कहा कि संगठित अपराध में संलिप्तता केवल पूर्व मामलों की संख्या से नहीं, बल्कि वर्तमान साक्ष्यों और भूमिका से तय होती है।

अदालत के अनुसार, सामग्री यह संकेत देती है कि आरोपी ने न केवल सिंडिकेट की गतिविधियों में भाग लिया, बल्कि अवैध ड्रग व्यापार से आर्थिक लाभ भी उठाया।

निचली अदालत के आदेश पर मुहर

यह याचिका रोहिणी स्थित निचली अदालत के 31 अक्टूबर 2025 के उस आदेश के खिलाफ दायर की गई थी, जिसमें जमानत देने से इंकार किया गया था। दिल्ली हाईकोर्ट ने उस आदेश को सही ठहराते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया आरोप गंभीर हैं और आरोपी की भूमिका को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

व्यापक संदेश

यह फैसला संगठित अपराध के विरुद्ध न्यायपालिका के सख़्त रवैये को दर्शाता है। साथ ही, यह भी स्पष्ट करता है कि ऐसे मामलों में अदालतें गवाहों की सुरक्षा, जांच की निष्पक्षता और समाजिक हितों को व्यक्तिगत राहत से ऊपर रखती हैं।


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