
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर वैश्विक राजनीति के केंद्र में हैं—इस बार अपने तीखे बयानों, नोबेल शांति पुरस्कार को लेकर नाराज़गी और नाटो पर सीधे हमलों की वजह से। ट्रंप का दावा है कि उन्होंने अपने व्यक्तिगत नेतृत्व से दुनिया को कई बड़े संघर्षों से बचाया, लेकिन इसके बावजूद उन्हें वह अंतरराष्ट्रीय मान्यता नहीं मिली, जिसके वे हक़दार थे।
“मैंने युद्ध रोके, दुनिया बची” — ट्रंप का आत्मविश्वास
अपने सोशल मीडिया मंच ट्रुथ सोशल पर ट्रंप ने लिखा कि उनके नेतृत्व में आठ अलग-अलग युद्ध या बड़े सैन्य टकराव समाप्त हुए या टल गए। उनका कहना है कि इन फैसलों से लाखों निर्दोष लोगों की जान बची और वैश्विक अस्थिरता कम हुई।
ट्रंप के अनुसार, अमेरिका की सैन्य और आर्थिक ताकत ऐसी है कि रूस और चीन जैसे देश सीधे वॉशिंगटन को ही गंभीरता से लेते हैं, न कि किसी बहुपक्षीय सैन्य गठबंधन को।
नोबेल शांति पुरस्कार और नार्वे पर सीधा हमला
ट्रंप की नाराज़गी का मुख्य कारण नोबेल शांति पुरस्कार है। उनका आरोप है कि नार्वे, जो इस पुरस्कार की मेज़बानी और प्रक्रिया से जुड़ा देश है, ने “राजनीतिक सोच” के चलते उन्हें नज़रअंदाज़ किया।
उन्होंने यह तक कहा कि नार्वे अमेरिका की सुरक्षा ढाल का लाभ तो उठाता है, लेकिन अमेरिका की भूमिका को सम्मान नहीं देता। इस साल नोबेल शांति पुरस्कार वेनेज़ुएला की विपक्षी नेता मारिया कोरीना माचाडो को दिए जाने से ट्रंप की नाराज़गी और बढ़ गई।
नाटो पर सवाल: “अमेरिका नहीं तो नाटो कुछ नहीं”
ट्रंप ने नाटो देशों पर वर्षों पुराना आरोप दोहराते हुए कहा कि यूरोप अपनी रक्षा की ज़िम्मेदारी अमेरिका पर डाल देता है। उनके अनुसार, कई नाटो देश रक्षा बजट पर खर्च करने से बचते रहे हैं और अमेरिका को उनकी सुरक्षा का बोझ उठाना पड़ा।
ट्रंप ने यह भी दावा किया कि उनके दबाव और सख्त रुख के कारण नाटो सदस्यों ने अपने रक्षा खर्च को 2% से कहीं आगे बढ़ाया—जिसे पहले असंभव माना जा रहा था।
यूक्रेन युद्ध पर आत्मश्रेय
रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर ट्रंप ने कहा कि अगर उनका हस्तक्षेप और रणनीतिक दबाव न होता, तो रूस अब तक पूरा यूक्रेन अपने कब्ज़े में ले चुका होता। उनका दावा है कि उनकी विदेश नीति “चुपचाप लेकिन प्रभावी” रही, भले ही उसे औपचारिक पुरस्कार न मिले।
निष्कर्ष: प्रशंसा की तलाश या राजनीतिक संदेश?
डोनाल्ड ट्रंप के ये बयान केवल आत्मप्रशंसा तक सीमित नहीं हैं—वे अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं, पुरस्कार प्रक्रियाओं और अमेरिकी सहयोगी देशों को खुली चुनौती भी हैं। उनके दावों की स्वतंत्र पुष्टि आसान नहीं है, लेकिन यह स्पष्ट है कि ट्रंप अपनी छवि एक ऐसे नेता के रूप में स्थापित करना चाहते हैं जिसने ताकत, डर और सौदेबाज़ी के ज़रिये शांति कायम की।
नोबेल मिले या न मिले, ट्रंप की राजनीति में विवाद और वैश्विक बहस हमेशा बनी रहती है—और शायद यही उनकी सबसे बड़ी पहचान भी है।