
उत्तर प्रदेश के मेरठ जनपद में सामने आई एक दिल दहला देने वाली घटना ने न केवल स्थानीय प्रशासन पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि प्रदेश की राजनीति में भी तीखी प्रतिक्रिया को जन्म दिया है। सरधना क्षेत्र के कपसाड़ गांव में एक दलित महिला की हत्या और उसकी नाबालिग बेटी के लापता होने के मामले ने कानून-व्यवस्था की स्थिति को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
घटना की पृष्ठभूमि
कपसाड़ गांव में जनवरी 2026 के आरंभ में घटी इस घटना में एक अनुसूचित जाति की महिला की हत्या कर दी गई, जबकि उसकी नाबालिग बेटी का अब तक पता नहीं चल सका है। परिजनों के अनुसार, महिला का शव लगभग दो दिनों तक घर में ही पड़ा रहा, क्योंकि समय पर पुलिस कार्रवाई और प्रशासनिक सक्रियता दिखाई नहीं दी। यह स्थिति क्षेत्र में गहरे असंतोष का कारण बनी।
विपक्ष का आक्रामक रुख
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस मामले को गंभीर सामाजिक और प्रशासनिक विफलता करार दिया है। उन्होंने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर सरकार को घेरते हुए कहा कि प्रदेश में कमजोर और वंचित वर्गों की सुरक्षा लगातार खतरे में है। उनका आरोप है कि ऐसी घटनाएं यह दिखाती हैं कि पीड़ितों को न तो समय पर न्याय मिल रहा है और न ही सुरक्षा की गारंटी।
कानून-व्यवस्था पर सवाल
अखिलेश यादव ने यह भी कहा कि जब एक परिवार अपनी बेटी की तलाश में दर-दर भटकने को मजबूर हो जाए और मृतक को सम्मानपूर्वक न्याय तक न मिले, तो यह शासन की संवेदनहीनता को दर्शाता है। उन्होंने दोषियों की तत्काल गिरफ्तारी, बेटी की सुरक्षित बरामदगी और मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की।
सरकार की परीक्षा
इस घटना ने भाजपा सरकार के सामने कानून-व्यवस्था को लेकर नई चुनौती खड़ी कर दी है। दलित समाज और मानवाधिकार संगठनों में भी रोष देखा जा रहा है, जो तेज और पारदर्शी कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। प्रशासन पर अब यह दबाव है कि वह केवल बयानबाज़ी तक सीमित न रहे, बल्कि ठोस कदम उठाकर भरोसा बहाल करे।
आगे की राह
मेरठ का यह मामला अब केवल एक आपराधिक घटना नहीं रहा, बल्कि सामाजिक न्याय, सुरक्षा और शासन की जिम्मेदारी से जुड़ा प्रश्न बन गया है। प्रदेश की राजनीति में इसका असर आने वाले समय में और गहरा होने की संभावना है, खासकर तब जब विपक्ष इसे जनता के बीच एक बड़े मुद्दे के रूप में उठा रहा है।