
पश्चिम बंगाल में केंद्र और राज्य के बीच चल रहा राजनीतिक तनाव अब न्यायिक मंचों तक साफ तौर पर पहुंच चुका है। जनवरी 2026 के पहले सप्ताह में प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा कोलकाता में राजनीतिक सलाहकार संस्था से जुड़े ठिकानों पर की गई कार्रवाई ने राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी है। इस पूरे घटनाक्रम ने न केवल कानूनी सवाल खड़े किए हैं, बल्कि संघीय ढांचे में शक्तियों की सीमाओं पर भी नई बहस छेड़ दी है।
सुप्रीम कोर्ट में कैविएट: पहले सुने राज्य की बात
ममता बनर्जी सरकार ने इस मामले में एक अग्रिम कानूनी कदम उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दाखिल की है। इस पहल का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि यदि केंद्रीय जांच एजेंसी सर्वोच्च न्यायालय में कोई राहत मांगती है, तो राज्य सरकार को सुने बिना कोई अंतरिम आदेश न पारित हो। विशेषज्ञों के अनुसार, यह कदम संभावित एकतरफा आदेशों से बचने की रणनीति के तहत उठाया गया है।
ईडी का रुख: जांच में बाधा का आरोप
प्रवर्तन निदेशालय ने कलकत्ता हाईकोर्ट के समक्ष यह दावा किया है कि छापेमारी के दौरान जांच अधिकारियों को अपने कर्तव्यों के निर्वहन में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। एजेंसी का आरोप है कि राजनीतिक दबाव और हस्तक्षेप के चलते कुछ महत्वपूर्ण साक्ष्यों की सुरक्षा प्रभावित हुई। ईडी ने इस पूरे मामले को कानून के शासन से जुड़ा गंभीर विषय बताया है।
राज्य सरकार की दलील: जब्ती पर सवाल
दूसरी ओर, पश्चिम बंगाल सरकार ने हाईकोर्ट में दायर अपनी याचिका में ईडी की कार्रवाई को चुनौती दी है। राज्य का कहना है कि जिन डिजिटल उपकरणों और दस्तावेज़ों को जब्त किया गया है, वे एक राजनीतिक दल से संबंधित हैं और उनमें गोपनीय रणनीतिक जानकारियां शामिल हैं। सरकार ने इन्हें तत्काल लौटाने की मांग की है और कार्रवाई को अधिकार क्षेत्र से बाहर बताया है।
अदालत की कार्यवाही: अगली सुनवाई का इंतज़ार
जब यह मामला कलकत्ता हाईकोर्ट में सूचीबद्ध हुआ, तो न्यायालय परिसर में उत्पन्न अव्यवस्था के कारण सुनवाई आगे नहीं बढ़ सकी। अदालत ने स्थिति को ध्यान में रखते हुए मामले की अगली तारीख तय की है, जिस पर दोनों पक्षों की दलीलें विस्तार से सुनी जाएंगी।
आगे की राह: राजनीति, कानून और संघवाद
इस पूरे प्रकरण ने यह स्पष्ट कर दिया है कि राजनीतिक संघर्ष अब केवल रैलियों और बयानों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि अदालतों में कानूनी रणनीतियों के रूप में सामने आ रहा है। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में लंबित याचिकाएं आने वाले दिनों में न सिर्फ इस मामले की दिशा तय करेंगी, बल्कि केंद्र-राज्य संबंधों को लेकर एक महत्वपूर्ण न्यायिक मिसाल भी बन सकती हैं।