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ईरान के खिलाफ यूरोप की सख्त रणनीति


मानवाधिकार संकट पर ईयू की कड़ी चेतावनी, IRGC पर बढ़ाई गई कार्रवाई

ईरान में जारी जनआंदोलनों को दबाने के लिए अपनाई जा रही सरकारी नीतियों ने अब अंतरराष्ट्रीय समुदाय को खुलकर प्रतिक्रिया देने पर मजबूर कर दिया है। नागरिक स्वतंत्रताओं पर लगाम, व्यापक गिरफ्तारियाँ और हिंसक दमन के आरोपों के बीच यूरोपीय संघ ने ईरानी नेतृत्व के प्रति अपना रुख पहले से कहीं अधिक कठोर कर दिया है। इसी नीति के तहत यूरोप ने इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के खिलाफ सख्त कदम उठाने का संकेत देते हुए दबाव की राजनीति तेज कर दी है।

आंदोलन की आग और सरकार की प्रतिक्रिया

बीते कुछ समय से ईरान के विभिन्न हिस्सों में सामाजिक और राजनीतिक असंतोष लगातार गहराता जा रहा है। आम नागरिकों, छात्रों और महिलाओं की भागीदारी वाले प्रदर्शन सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गए हैं। इन विरोधों को नियंत्रित करने के लिए अपनाए गए कड़े सुरक्षा उपायों पर मानवाधिकार संगठनों ने गंभीर आपत्ति जताई है। आरोप हैं कि शांतिपूर्ण आवाज़ों को भी बलपूर्वक दबाया गया, जिससे स्थिति और अधिक विस्फोटक बनती चली गई।

यूरोपीय संघ की चिंता और संदेश

यूरोपीय संघ का कहना है कि किसी भी सरकार को अपने नागरिकों की मूल स्वतंत्रताओं को कुचलने का अधिकार नहीं है। ईयू नेताओं के अनुसार, ईरान में जो कुछ हो रहा है वह केवल आंतरिक मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह वैश्विक मानवाधिकार मूल्यों से जुड़ा विषय बन चुका है। इसी कारण यूरोप ने कूटनीतिक शब्दों से आगे बढ़ते हुए व्यावहारिक कार्रवाई का रास्ता चुना है।

IRGC पर शिकंजा

इस पूरी प्रक्रिया में IRGC यूरोपीय संघ के निशाने पर प्रमुख रूप से रहा है। ईयू का आरोप है कि आंतरिक दमन और क्षेत्रीय अस्थिरता में इस संगठन की भूमिका अहम रही है। प्रतिबंधों के ज़रिये यूरोप यह स्पष्ट करना चाहता है कि मानवाधिकार उल्लंघन की कीमत चुकानी होगी, चाहे वह कितना ही प्रभावशाली संस्थान क्यों न हो।

आगे क्या?

विश्लेषकों के मुताबिक, यूरोपीय संघ का यह रुख ईरान के लिए केवल आर्थिक या कूटनीतिक चुनौती नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी छवि पर भी गहरा प्रभाव डालेगा। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि ईरानी सरकार संवाद और सुधार का रास्ता अपनाती है या टकराव की नीति को और आगे बढ़ाती है।


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