HIT AND HOT NEWS

चीन पर भाजपा की नीति पर अखिलेश यादव का हमला: कथनी, करनी और सियासत का विरोधाभास


भारतीय राजनीति में नीतियों से अधिक उनके व्यवहारिक अनुप्रयोग पर सवाल उठते रहे हैं। जब कोई राजनीतिक दल सार्वजनिक मंच पर एक रुख अपनाता है और व्यवहार में उससे अलग दिशा में चलता हुआ दिखता है, तब विपक्ष की आलोचना तेज होना स्वाभाविक है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने हालिया टिप्पणी में भारतीय जनता पार्टी की चीन संबंधी नीति को इसी कसौटी पर परखा है।

नारों की राजनीति बनाम ज़मीनी सच्चाई

अखिलेश यादव का कहना है कि भाजपा ने वर्षों तक चीन विरोध को जनभावनाओं से जोड़कर प्रस्तुत किया। चुनावी सभाओं, प्रचार अभियानों और सार्वजनिक वक्तव्यों में चीनी उत्पादों के बहिष्कार को राष्ट्रभक्ति से जोड़ा गया। आम नागरिकों से अपेक्षा की गई कि वे स्वदेशी अपनाकर आर्थिक राष्ट्रवाद को मजबूती दें।

लेकिन सवाल यह उठता है कि जब जनमानस को भावनात्मक रूप से तैयार किया गया, तब सरकारी स्तर पर वही दृढ़ता क्यों नहीं दिखी? आलोचकों के अनुसार, व्यवहार और बयानबाज़ी के बीच यही अंतर सबसे बड़ा विरोधाभास बनकर उभरता है।

व्यापारिक निर्भरता पर उठते प्रश्न

अखिलेश यादव की आलोचना का दूसरा बड़ा पक्ष भारत-चीन व्यापार से जुड़ा है। वे इशारों में यह सवाल उठाते हैं कि अगर चीन को रणनीतिक और वैचारिक चुनौती माना जाता है, तो उसके साथ व्यापारिक रिश्ते लगातार कैसे बढ़ते रहे। आयात के आँकड़े और आर्थिक समझौते, सार्वजनिक नारों से बिल्कुल उलट तस्वीर पेश करते हैं।

उनके अनुसार, यदि सरकार वास्तव में आत्मनिर्भरता को प्राथमिकता देती, तो घरेलू उद्योगों को व्यावहारिक संरक्षण मिलता और विदेशी निर्भरता घटाने की ठोस पहल दिखाई देती।

विदेश नीति या राजनीतिक सुविधा?

इस आलोचना में विदेश नीति की दिशा भी कटघरे में आती है। अखिलेश यादव का मत है कि भाजपा की चीन नीति सिद्धांत आधारित कम और परिस्थितिजन्य अधिक दिखाई देती है। जब सियासी लाभ की बात आती है, तब चीन विरोध मुखर हो जाता है, और जब आर्थिक या कूटनीतिक दबाव सामने आते हैं, तो वही तेवर नरम पड़ जाते हैं।

यह दृष्टिकोण विपक्ष की ओर से यह संकेत देता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक हितों जैसे गंभीर विषयों को केवल राजनीतिक लाभ के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए।

मतदाता और नीति का रिश्ता

इस बहस का सबसे अहम पहलू आम जनता से जुड़ा है। मतदाता यह जानना चाहता है कि क्या राजनीतिक दलों के वादे केवल चुनावी मंच तक सीमित हैं या उनका असर दीर्घकालिक नीति निर्माण में भी दिखाई देता है। अखिलेश यादव की टिप्पणी इसी असमंजस को उजागर करती है।

निष्कर्ष

चीन को लेकर भाजपा की नीति पर उठे सवाल केवल एक राजनीतिक आलोचना नहीं हैं, बल्कि वे शासन, जवाबदेही और पारदर्शिता से जुड़े व्यापक मुद्दों की ओर ध्यान खींचते हैं। अखिलेश यादव की टिप्पणी यह संदेश देती है कि राष्ट्रहित के प्रश्नों पर कथन और कर्म के बीच सामंजस्य होना ज़रूरी है। लोकतंत्र में यही निरंतर सवाल-जवाब की प्रक्रिया नीतियों को मजबूती प्रदान करती है।


Exit mobile version