
1 फरवरी 2026 को प्रयागराज का त्रिवेणी संगम अभूतपूर्व आस्था का साक्षी बना, जब माघी पूर्णिमा के पावन अवसर पर लगभग डेढ़ करोड़ श्रद्धालुओं ने पुण्य स्नान कर धार्मिक परंपराओं का निर्वाह किया। यह महापर्व कल्पवास की साधना का समापन, आत्मशुद्धि का संकल्प और मोक्ष की आकांक्षा का प्रतीक बनकर उभरा।
📖 माघी पूर्णिमा: तिथि और धार्मिक अर्थ
हिंदू पंचांग के अनुसार माघ मास की पूर्णिमा तिथि 1 फरवरी की सुबह 5:53 बजे प्रारंभ होकर 2 फरवरी की सुबह 3:39 बजे तक रही। शास्त्रों में इस दिन को भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और पवित्र नदियों की आराधना के लिए विशेष फलदायी बताया गया है।
मान्यता है कि इस तिथि पर संगम में स्नान करने से पाप क्षीण होते हैं और जीवन में आध्यात्मिक शुद्धता का संचार होता है।
🕉️ संगम पर उमड़ा विश्वास का जनसैलाब
भोर से ही त्रिवेणी संगम पर श्रद्धालुओं का तांता लग गया। दोपहर 12 बजे तक लगभग 1.50 करोड़ लोगों ने आस्था की डुबकी लगाई।
एक महीने तक चले कल्पवास के बाद माघी पूर्णिमा का यह स्नान साधकों के लिए साधना की पूर्णाहुति माना गया। संत, महात्मा, कल्पवासी और गृहस्थ श्रद्धालु—सभी ने मंत्रोच्चार, ध्यान और पूजा के साथ स्नान कर दिव्य अनुभूति प्राप्त की।
🙏 मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का संदेश
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने माघी पूर्णिमा के अवसर पर श्रद्धालुओं को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि यह पर्व आस्था, साधना और दिव्यता के समागम का प्रतीक है। उन्होंने माँ गंगा, माँ यमुना और माँ सरस्वती से सभी साधकों एवं श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूर्ण होने की प्रार्थना की और “हर हर गंगे” के उद्घोष के साथ सबका अभिनंदन किया।
🌅 कल्पवास: तप और संयम की परंपरा
कल्पवास माघ मास में किया जाने वाला विशेष धार्मिक अनुष्ठान है, जिसमें श्रद्धालु गंगा तट पर निवास कर संयम, जप, सेवा और ध्यान का पालन करते हैं।
माघी पूर्णिमा को इसका अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण दिन माना जाता है, जब साधक अंतिम स्नान कर अपने व्रत और तप को पूर्ण करते हैं।
🌍 सामाजिक व आध्यात्मिक महत्व
माघी पूर्णिमा केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता का जीवंत उदाहरण भी है। देश के विभिन्न हिस्सों से आए श्रद्धालु एक साथ जुटकर सांस्कृतिक एकता का अनुभव करते हैं।
दान-पुण्य, सेवा और साधना के माध्यम से यह पर्व आत्मशुद्धि और सकारात्मक जीवन दृष्टि को प्रोत्साहित करता है।
✨ उपसंहार
माघी पूर्णिमा 2026 ने प्रयागराज को एक बार फिर आस्था और अध्यात्म की वैश्विक राजधानी के रूप में स्थापित कर दिया। संगम तट पर उमड़ी विशाल श्रद्धालु संख्या, साधना की ऊर्जा और पवित्र वातावरण ने इस दिन को अविस्मरणीय बना दिया।
यह पर्व न केवल धार्मिक चेतना को जाग्रत करता है, बल्कि भारतीय संस्कृति की गहराई और सामूहिक आस्था की शक्ति को भी सशक्त रूप से दर्शाता है।