
नई दिल्ली।
संसद के चालू सत्र में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव को लेकर हुई चर्चा ने राजनीतिक माहौल को खासा गर्म कर दिया। दोनों सदनों में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली। बहस के केंद्र में देश की विदेश नीति, सीमा सुरक्षा और विशेष रूप से चीन से जुड़े सवाल रहे, जिन पर पक्ष-विपक्ष आमने-सामने आ गए।
चर्चा के दौरान विपक्ष ने सरकार पर आरोप लगाया कि चीन के साथ सीमा से जुड़े मुद्दों पर पारदर्शिता की कमी है। नेता विपक्ष राहुल गांधी ने सरकार की नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे गंभीर मामलों में संसद और जनता को भरोसे में लिया जाना चाहिए। उनकी इस टिप्पणी पर सत्ता पक्ष के सदस्यों ने कड़ी आपत्ति जताई, जिसके बाद सदन में शोर-शराबा बढ़ गया।
सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने पलटवार करते हुए कहा कि सरकार ने देश की सीमाओं की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है और चीन के मुद्दे पर किसी भी तरह का समझौता नहीं किया गया है। उन्होंने विपक्ष पर राष्ट्रीय हित से जुड़े विषयों का राजनीतिकरण करने का आरोप लगाया। सत्ता पक्ष का यह भी कहना था कि राष्ट्रपति के अभिभाषण में सरकार की उपलब्धियों और भविष्य की नीतियों का स्पष्ट रोडमैप प्रस्तुत किया गया है, जिस पर सकारात्मक बहस होनी चाहिए।
बहस के दौरान कई बार कार्यवाही बाधित हुई और अध्यक्ष को सदस्यों से संयम बरतने की अपील करनी पड़ी। कुछ विपक्षी सदस्यों ने सदन में तख्तियां भी लहराईं, जबकि सत्ता पक्ष ने इसे संसदीय परंपराओं के खिलाफ बताया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि धन्यवाद प्रस्ताव की यह बहस आने वाले दिनों की सियासी दिशा तय कर सकती है। चीन जैसे संवेदनशील मुद्दे पर संसद में खुली बहस यह दर्शाती है कि विदेश नीति अब केवल कूटनीतिक दायरे तक सीमित नहीं, बल्कि घरेलू राजनीति का भी अहम हिस्सा बन चुकी है।
कुल मिलाकर, राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा ने यह साफ कर दिया कि संसद का यह सत्र सरकार और विपक्ष के बीच तीखे राजनीतिक संघर्ष का गवाह बनने वाला है।