
आर्मेनियाई नरसंहार (1915) एक ऐसा ऐतिहासिक अध्याय है, जो आज भी वैश्विक राजनीति में असहज प्रश्न खड़े करता है। यह केवल अतीत की त्रासदी नहीं, बल्कि वर्तमान की राजनीतिक प्राथमिकताओं और नैतिक प्रतिबद्धताओं की भी परीक्षा है। हाल के दिनों में अमेरिका की राजनीति में यह विषय फिर से चर्चा में आया, जब उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस के आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट से इस संदर्भ में किया गया एक पोस्ट बिना किसी औपचारिक स्पष्टीकरण के हटा दिया गया।
यह कदम तकनीकी भले ही छोटा लगे, लेकिन इसके निहितार्थ व्यापक हैं। सोशल मीडिया पोस्ट का हटना इस बात की याद दिलाता है कि इतिहास की स्वीकार्यता अक्सर सत्ता, रणनीति और कूटनीति के बीच फँस जाती है।
स्मृति की राजनीति और अमेरिकी भूमिका
1915 में उस्मानी साम्राज्य के दौरान लाखों आर्मेनियाइयों की मौत को कई देश और इतिहासकार नरसंहार मानते हैं। अमेरिका में दशकों तक इस शब्द के प्रयोग से परहेज़ किया गया, खासतौर पर तुर्की के साथ सामरिक संबंधों के कारण। हालाँकि हाल के वर्षों में आधिकारिक स्तर पर इसे स्वीकार किया गया, लेकिन यह स्वीकृति भी पूरी तरह विवादों से मुक्त नहीं रही।
वेंस से जुड़ी घटना बताती है कि अमेरिकी राजनीति में यह विषय आज भी कितनी सतर्कता से संभाला जाता है। एक बयान या पोस्ट, जो नैतिक दृष्टि से सही प्रतीत हो, वह विदेश नीति के समीकरणों में असुविधाजनक बन सकता है।
डिजिटल युग में इतिहास की सीमाएँ
सोशल मीडिया आज राजनीतिक अभिव्यक्ति का सबसे तेज़ माध्यम बन चुका है। लेकिन वही माध्यम सत्ता की सीमाओं को भी उजागर करता है। किसी पोस्ट का हटाया जाना केवल कंटेंट मॉडरेशन नहीं, बल्कि यह संदेश भी देता है कि कुछ ऐतिहासिक सच्चाइयाँ आज भी “सुविधाजनक” और “असुविधाजनक” श्रेणियों में बाँटी जाती हैं।
यह सवाल उठता है कि क्या डिजिटल युग में भी इतिहास को कूटनीतिक चश्मे से ही देखा जाएगा, या फिर स्मृति को स्वतंत्र रूप से स्वीकार करने का साहस दिखाया जाएगा।
नैतिकता बनाम रणनीति
आर्मेनियाई नरसंहार का मुद्दा अमेरिका के लिए नैतिक जिम्मेदारी और रणनीतिक हितों के बीच संतुलन का प्रतीक बन चुका है। एक ओर मानवाधिकार और ऐतिहासिक न्याय की बात है, तो दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों और क्षेत्रीय राजनीति की मजबूरियाँ।
वेंस की पोस्ट का हटना इस द्वंद्व का ताजा उदाहरण है—जहाँ सत्ता को यह तय करना पड़ता है कि सच को कितनी दूर तक सार्वजनिक मंच पर जगह दी जाए।
निष्कर्ष
आर्मेनियाई नरसंहार पर अमेरिकी राजनीति की प्रतिक्रिया यह दिखाती है कि इतिहास कभी सिर्फ अतीत नहीं रहता। वह वर्तमान फैसलों, नीतियों और नैतिक दृष्टिकोण को लगातार चुनौती देता है। सोशल मीडिया पर एक पोस्ट का मिट जाना शायद क्षणिक घटना हो, लेकिन यह उस गहरे सवाल को फिर सामने लाता है—क्या सत्ता इतिहास की स्मृति से सचमुच ईमानदारी से सामना करने को तैयार है?