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में डिजिटल ‘नकली गिरफ्तारी’ स्कैम: 19 लाख की ठगी से हड़कंप

महाराष्ट्र के पुणे शहर में साइबर अपराध का एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने आम लोगों की सुरक्षा भावना को झकझोर दिया है। जालसाजों ने खुद को डीजीपी और क्राइम ब्रांच का अधिकारी बताकर एक सेवानिवृत्त अधिकारी से 19 लाख रुपये ठग लिए। यह घटना बताती है कि तकनीक का दुरुपयोग किस तरह सुनियोजित तरीके से किया जा रहा है और लोगों को मानसिक दबाव में डालकर बड़ी रकम ऐंठी जा रही है।


कैसे रची गई पूरी साजिश?

इस मामले में अपराधियों ने बेहद पेशेवर अंदाज़ अपनाया।

जब तक पीड़ित को सच्चाई का अहसास हुआ, तब तक रकम अलग-अलग खातों में भेजी जा चुकी थी। पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए कुछ संदिग्धों को हिरासत में लिया है और साइबर सेल के माध्यम से लेन-देन की जांच जारी है।


क्या है ‘डिजिटल अरेस्ट’ फ्रॉड?

यह ठगी का ऐसा तरीका है जिसमें अपराधी खुद को उच्च अधिकारी या जांच एजेंसी का सदस्य बताकर पीड़ित को डराते हैं।

असलियत यह है कि “डिजिटल अरेस्ट” जैसी कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं होती। कानून व्यवस्था में गिरफ्तारी एक औपचारिक और प्रत्यक्ष प्रक्रिया है, न कि वीडियो कॉल या फोन के जरिए दी जाने वाली धमकी।


बढ़ती घटनाएँ और चिंताजनक आंकड़े

पिछले पांच महीनों में पुणे में ऐसे 21 मामलों का पंजीकरण हुआ है। इन मामलों में कुल मिलाकर 9.21 करोड़ रुपये की ठगी दर्ज की गई है। हैरानी की बात यह है कि पीड़ितों में अधिकतर बुजुर्ग, रिटायर्ड कर्मचारी, शिक्षक और आईटी सेक्टर से जुड़े लोग शामिल हैं। इससे स्पष्ट है कि साइबर अपराधी खास तौर पर ऐसे लोगों को निशाना बना रहे हैं जो आर्थिक रूप से सक्षम और अपेक्षाकृत अकेले रहते हैं।


पुलिस की पहल और जागरूकता अभियान

पुणे पुलिस ने साइबर अपराध शाखा को और सक्रिय करते हुए 1930 हेल्पलाइन पर तुरंत शिकायत दर्ज कराने की अपील की है।

पुलिस लगातार लोगों को यह समझा रही है कि भय और हड़बड़ी में लिया गया निर्णय ही जालसाजों का सबसे बड़ा हथियार होता है।


समाज के लिए सीख

यह मामला केवल एक व्यक्ति की ठगी भर नहीं है, बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी है। डिजिटल दुनिया में जागरूकता और संयम बेहद जरूरी हैं।

डिजिटल युग में सुरक्षा का सबसे प्रभावी माध्यम जानकारी और सतर्कता ही है। यदि हम सजग रहें तो ऐसे साइबर अपराधियों की चालें नाकाम की जा सकती हैं।

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