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उत्तर प्रदेश में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद प्रकरण पर का बयान

लखनऊ, 13 फरवरी 2026।
उत्तर प्रदेश विधानसभा के बजट सत्र के दौरान मुख्यमंत्री ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और माघ मेला प्रशासन से जुड़े हालिया विवाद पर स्पष्ट और कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने सदन में कहा कि किसी भी व्यक्ति की पहचान, पद या प्रतिष्ठा कानून से ऊपर नहीं हो सकती। राज्य सरकार की प्राथमिकता कानून-व्यवस्था और आमजन की सुरक्षा है।

प्रकरण का संदर्भ

माघ मेले में प्रवेश और व्यवस्थाओं को लेकर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद तथा प्रशासन के बीच मतभेद की स्थिति बनी, जिससे समर्थकों और अधिकारियों के बीच तनाव उत्पन्न हुआ। इस मुद्दे को लेकर ने स्वामी के पक्ष में बयान दिए। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए मुख्यमंत्री ने वर्ष 2015 की घटना की याद दिलाई, जब वाराणसी में तत्कालीन सरकार के समय स्वामी के खिलाफ कार्रवाई की गई थी। उन्होंने विपक्ष पर दोहरे मानदंड अपनाने का आरोप लगाया।

संवैधानिक व्यवस्था और अनुशासन

मुख्यमंत्री ने कहा कि भारत का लोकतांत्रिक ढांचा सभी नागरिकों को समान दायित्व देता है। उन्होंने यह भी कहा कि धार्मिक या सामाजिक प्रभाव के आधार पर प्रशासनिक नियमों को चुनौती देना उचित नहीं है। उनका तर्क था कि जब करोड़ों श्रद्धालु मेला क्षेत्र में आते-जाते हैं, तब सुरक्षा प्रोटोकॉल का सख्ती से पालन अनिवार्य हो जाता है। नियमों की अनदेखी भीड़ प्रबंधन के लिहाज से गंभीर जोखिम पैदा कर सकती है।

विपक्ष पर राजनीतिक प्रहार

सदन में बोलते हुए उन्होंने समाजवादी आंदोलन की मूल विचारधारा का हवाला देते हुए कहा कि समय के साथ उसमें वैचारिक विचलन दिखाई देता है। उनके अनुसार, सिद्धांतों की राजनीति की जगह अवसरवादी रुख ने ले ली है। मुख्यमंत्री ने विपक्ष के व्यवहार को परिस्थितियों के अनुसार बदलने वाला बताया और इसे जनता के साथ छल करार दिया।

व्यापक राजनीतिक संकेत

इस पूरे घटनाक्रम के जरिए राज्य सरकार ने दो संदेश स्पष्ट करने की कोशिश की—

  1. कानून और व्यवस्था के मामले में किसी प्रकार की रियायत नहीं दी जाएगी।
  2. विपक्ष की कथनी और करनी के अंतर को उजागर किया जाएगा।

निष्कर्ष

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से जुड़ा यह विवाद अब केवल प्रशासनिक मतभेद भर नहीं रह गया है। यह मुद्दा उत्तर प्रदेश की राजनीति में संवैधानिक सिद्धांतों, धार्मिक प्रभाव और राजनीतिक रणनीति के त्रिकोण के रूप में उभर रहा है। मुख्यमंत्री ने अपने वक्तव्य के माध्यम से यह जताने का प्रयास किया कि शासन की प्राथमिकता व्यवस्था और सुरक्षा है, न कि राजनीतिक समीकरण।

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