नागपुर। देश की आजादी के करीब आठ दशक बीत जाने के बावजूद आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं की स्थिति को लेकर सवाल लगातार उठते रहे हैं। इसी मुद्दे को केंद्र में रखते हुए कॉकroach जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दिपके ने नागपुर से ‘आदिवासी स्कूल ठीक करो’ अभियान शुरू करने की घोषणा की है। अभियान का उद्देश्य आदिवासी इलाकों में संचालित स्कूलों की वास्तविक स्थिति को सामने लाना और वहां पढ़ने वाले बच्चों को उपलब्ध शिक्षा, आवास तथा अन्य बुनियादी सुविधाओं की जमीनी हकीकत दर्ज करना बताया गया है।
वीडियो में अभिजीत दिपके ने कहा कि देश में आदिवासी समुदायों की बड़ी आबादी होने के बावजूद उनके शिक्षा संबंधी मुद्दों को अपेक्षित प्राथमिकता नहीं मिल पाई है। उनके अनुसार अलग-अलग सरकारों के कार्यकाल में आदिवासी क्षेत्रों की समस्याएं सामने आती रही हैं, लेकिन स्कूलों की आधारभूत व्यवस्था और बच्चों के रहने की परिस्थितियों में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ। इसी स्थिति की पड़ताल के लिए अभियान के तहत टीम विभिन्न आदिवासी क्षेत्रों का दौरा करेगी।
स्कूलों की जमीनी स्थिति जानने का दावा
अभियान के तहत केवल सरकारी आंकड़ों या कार्यालयी रिपोर्टों पर निर्भर रहने के बजाय मौके पर जाकर स्कूलों की स्थिति देखने की बात कही गई है। टीम यह जानने का प्रयास करेगी कि आदिवासी बच्चों के लिए उपलब्ध विद्यालयों में भवन, कक्षाएं, छात्रावास, पेयजल, भोजन, स्वच्छता और अन्य आवश्यक सुविधाएं किस स्थिति में हैं।
अभियान से जुड़े वक्तव्य में यह भी कहा गया है कि बच्चों के लिए शिक्षा की व्यवस्था केवल स्कूल भवन तक सीमित नहीं होनी चाहिए। जिन विद्यार्थियों को आवासीय विद्यालयों में रखा जाता है, उनके रहने और दैनिक जीवन से जुड़ी सुविधाओं की भी नियमित समीक्षा आवश्यक है। टीम इन परिस्थितियों को दस्तावेज के रूप में दर्ज करने और संबंधित अधिकारियों के सामने रखने की योजना बना रही है।
आदिवासी बच्चों की मौत को लेकर चिंता
वीडियो में महाराष्ट्र में पिछले दो वर्षों के दौरान 590 से अधिक आदिवासी बच्चों की मौत का दावा किया गया है। यह आंकड़ा अभियान के वक्ता द्वारा प्रस्तुत किया गया है और इसके स्वतंत्र सत्यापन की आवश्यकता है। वक्तव्य में महाराष्ट्र के अलावा मध्य प्रदेश के बालाघाट सहित दूसरे क्षेत्रों में भी आदिवासी बच्चों की मौत से जुड़े मामलों के पर्याप्त रूप से सामने नहीं आने की बात कही गई।
अभियान से जुड़े वक्तव्य में इन घटनाओं के बाद प्रभावित परिवारों को मिलने वाले मुआवजे को लेकर भी सवाल उठाया गया है। अभिजीत दिपके का कहना है कि किसी परिवार के बच्चे की मौत केवल एक संख्या नहीं है, बल्कि उससे पूरा परिवार प्रभावित होता है। ऐसे मामलों में सरकारी सहायता और पुनर्वास की व्यवस्था कितनी प्रभावी है, इसकी भी जांच जरूरी है।
हालांकि, मृत्यु से संबंधित आंकड़ों और उनके कारणों की पुष्टि के लिए सरकारी विभागों, आधिकारिक रिपोर्टों और स्वतंत्र स्रोतों से विस्तृत जानकारी सामने आना आवश्यक होगा।
एकलव्य आवासीय विद्यालयों की व्यवस्था पर सवाल
अभियान के दौरान एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों की स्थिति को भी प्रमुख मुद्दा बनाए जाने की बात कही गई है। वीडियो में दावा किया गया कि देश में 700 से अधिक एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों की व्यवस्था है, लेकिन इनमें से केवल 477 के कार्यरत होने की बात सामने रखी गई।
इसके साथ ही यह आरोप भी लगाया गया कि कई विद्यालयों के पास अपना स्थायी भवन नहीं है और कुछ संस्थान किराए के भवनों में संचालित हो रहे हैं। यदि ऐसा है, तो इसका सीधा संबंध विद्यार्थियों के लिए उपलब्ध शैक्षणिक वातावरण, छात्रावास की क्षमता और दीर्घकालिक आधारभूत ढांचे से जुड़ता है।
एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों का उद्देश्य विशेष रूप से आदिवासी क्षेत्रों के विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और आवासीय सुविधा उपलब्ध कराना है। ऐसे में विद्यालयों की संख्या बढ़ाने के साथ-साथ उनके भवन, शिक्षक, छात्रावास, भोजन, स्वास्थ्य और सुरक्षा जैसी सुविधाओं की गुणवत्ता भी महत्वपूर्ण मानी जाती है।
सरकारी जवाबदेही पर जोर
‘आदिवासी स्कूल ठीक करो’ अभियान का एक प्रमुख उद्देश्य सरकार और प्रशासन से जवाबदेही की मांग करना बताया गया है। अभियान की टीम आदिवासी क्षेत्रों में जाकर स्कूलों की वास्तविक परिस्थितियों को रिकॉर्ड करेगी और समस्याओं को सार्वजनिक रूप से सामने लाने का प्रयास करेगी।
वीडियो में कहा गया है कि केवल घोषणाएं या बजट आवंटित करना पर्याप्त नहीं है। योजनाओं का वास्तविक लाभ बच्चों तक पहुंच रहा है या नहीं, इसकी निगरानी भी जरूरी है। यदि किसी स्कूल का भवन अधूरा है, छात्रावास में क्षमता से अधिक बच्चे रह रहे हैं, जरूरी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं या विद्यालय स्थायी भवन के अभाव में संचालित हो रहा है, तो इन समस्याओं की जिम्मेदारी तय किए जाने की आवश्यकता है।
शिक्षा से जुड़े सवालों को राजनीतिक बहस से आगे ले जाने की कोशिश
अभियान की घोषणा ऐसे समय में हुई है जब देश के विभिन्न हिस्सों में सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता, शिक्षकों की उपलब्धता और विद्यार्थियों के लिए बुनियादी सुविधाओं को लेकर बहस जारी रहती है। आदिवासी क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियां कई बार इन चुनौतियों को और जटिल बना देती हैं।
दूरदराज के गांवों तक स्कूलों की पहुंच, शिक्षकों की नियमित उपस्थिति, विद्यार्थियों के लिए परिवहन, छात्रावासों की व्यवस्था और स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता जैसे विषय आदिवासी शिक्षा व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में जमीनी निरीक्षण से उन समस्याओं की पहचान हो सकती है जो केवल कागजी रिपोर्टों में स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देतीं।
दस्तावेजीकरण के जरिए दबाव बनाने की योजना
अभियान से जुड़े लोगों के अनुसार टीम आदिवासी क्षेत्रों में जाकर वहां की परिस्थितियों का दस्तावेजीकरण करेगी। स्कूल भवनों, छात्रावासों और बच्चों को उपलब्ध सुविधाओं की जानकारी जुटाकर उसे सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा बनाया जाएगा।
अभियान का लक्ष्य संबंधित सरकारों और प्रशासनिक अधिकारियों के समक्ष वास्तविक परिस्थितियां रखने तथा सुधार के लिए दबाव बनाने का बताया गया है। यदि अभियान के दौरान सामने आने वाले दावों के साथ आधिकारिक आंकड़े और स्वतंत्र जांच भी जुड़ती है, तो इससे नीति निर्माण और प्रशासनिक जवाबदेही पर व्यापक चर्चा संभव हो सकती है।
आगे क्या होगा?
अब अभियान की वास्तविक प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करेगी कि टीम कितने क्षेत्रों तक पहुंचती है, कितने विद्यालयों का निरीक्षण करती है और सामने आने वाली समस्याओं के संबंध में किस प्रकार के दस्तावेज और प्रमाण प्रस्तुत करती है। साथ ही, सरकार और संबंधित विभाग इन आरोपों तथा मांगों पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं, यह भी महत्वपूर्ण रहेगा।
आदिवासी बच्चों के लिए शिक्षा केवल स्कूल में प्रवेश तक सीमित विषय नहीं है। सुरक्षित भवन, पर्याप्त शिक्षक, छात्रावास, पोषण, स्वास्थ्य, स्वच्छता और सम्मानजनक वातावरण भी उनकी शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इसलिए ‘आदिवासी स्कूल ठीक करो’ अभियान ने जिन सवालों को उठाया है, वे केवल किसी एक क्षेत्र या संस्था तक सीमित नहीं हैं, बल्कि आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा की पहुंच और गुणवत्ता से जुड़े व्यापक मुद्दों की ओर संकेत करते हैं।
अभियान के दौरान सामने आने वाली जमीनी रिपोर्ट यह स्पष्ट करने में मदद कर सकती है कि आदिवासी बच्चों के लिए सरकारी शिक्षा योजनाएं वास्तविक धरातल पर किस स्तर तक प्रभावी हैं और किन क्षेत्रों में तत्काल सुधार की आवश्यकता है। फिलहाल अभियान की शुरुआत के साथ आदिवासी स्कूलों की स्थिति, आवासीय शिक्षा व्यवस्था और बच्चों की सुरक्षा से जुड़े मुद्दे एक बार फिर सार्वजनिक चर्चा के केंद्र में आ गए हैं।
