नई दिल्ली: एआईएमआईएम प्रमुख और सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने एक भाषण के दौरान मनुस्मृति, भारतीय संविधान, स्वतंत्रता आंदोलन और देश की मौजूदा राजनीति से जुड़े मुद्दों पर आरएसएस और बीजेपी पर तीखे सवाल उठाए। अपने संबोधन में उन्होंने इतिहास के विभिन्न प्रसंगों का उल्लेख करते हुए सामाजिक न्याय, धार्मिक संस्थानों और राजनीतिक विरोध के मुद्दे पर अपनी बात रखी।
संविधान और मनुस्मृति पर चर्चा
ओवैसी ने कहा कि देश में मनुस्मृति को लेकर लगातार चर्चा होती रही है। उन्होंने 26 नवंबर 1949 को संविधान अपनाए जाने के बाद संविधान को लेकर आरएसएस से जुड़े लोगों की कथित आलोचनाओं का जिक्र किया।
उन्होंने दावा किया कि उस दौर में कुछ लोग भारतीय संविधान की जगह मनुस्मृति को प्राथमिकता देने के पक्ष में थे। इसी संदर्भ में उन्होंने विनायक दामोदर सावरकर का भी उल्लेख किया और मनुस्मृति से जुड़े उनके कथित विचारों पर सवाल उठाए।
सावरकर और स्वतंत्रता आंदोलन का मुद्दा
अपने भाषण में ओवैसी ने सावरकर के अंडमान कारावास से जुड़े इतिहास का जिक्र किया। उन्होंने ब्रिटिश सरकार को भेजे गए सावरकर के पत्रों को लेकर आलोचनात्मक टिप्पणी की और इसे स्वतंत्रता संघर्ष में उनके रवैये के संदर्भ में पेश किया।
इसके विपरीत उन्होंने अल्लामा फज़ल-ए-हक खैराबादी जैसे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े व्यक्ति का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने जेल में कठिन परिस्थितियों का सामना किया और ब्रिटिश शासन के सामने समझौता नहीं किया।
ओवैसी ने इस दौरान आरएसएस की स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका को लेकर भी सवाल उठाया।
अंडमान जेल का भी किया उल्लेख
भाषण में ओवैसी ने मक्का मस्जिद से जुड़े मौलवी अलाउद्दीन का भी उल्लेख किया और उन्हें अंडमान में कैद किए गए प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों में बताया। उन्होंने इन ऐतिहासिक उदाहरणों के जरिए स्वतंत्रता आंदोलन में अलग-अलग व्यक्तियों और संगठनों की भूमिका पर बहस की।
हालांकि, भाषण में किए गए ऐतिहासिक दावों की स्वतंत्र पुष्टि अलग-अलग ऐतिहासिक स्रोतों के आधार पर की जानी चाहिए।
मनुस्मृति के प्रावधानों पर सवाल
ओवैसी ने मनुस्मृति के कुछ अध्यायों और उसमें वर्णित सामाजिक व्यवस्था को लेकर आलोचना की। उन्होंने विशेष रूप से दलितों और शूद्रों से संबंधित कथित प्रावधानों का हवाला देते हुए सवाल उठाया कि आधुनिक भारत की संवैधानिक व्यवस्था में ऐसी सामाजिक अवधारणाओं की क्या जगह हो सकती है।
उनका तर्क था कि भारतीय संविधान समानता और नागरिक अधिकारों की आधुनिक व्यवस्था का आधार है।
उत्तर प्रदेश की घटना का जिक्र
भाषण के दौरान ओवैसी ने उत्तर प्रदेश में मुबीन नाम के एक चित्रकार से जुड़ी कथित घटना का भी उल्लेख किया। उन्होंने दावा किया कि एक झंडे पर बंदूक का चित्र बनाने के मामले में मुबीन को जेल भेजा गया।
इस घटना को उन्होंने अभिव्यक्ति और विरोध के अधिकार से जोड़ते हुए सरकार की कार्रवाई पर सवाल उठाया। मामले से जुड़े आरोपों और कानूनी तथ्यों की पुष्टि आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर ही की जा सकती है।
हुसैन इब्न अली का उदाहरण
ओवैसी ने अपने भाषण में हुसैन इब्न अली का उल्लेख करते हुए अत्याचार के खिलाफ संघर्ष और बलिदान का उदाहरण पेश किया। उन्होंने ऐतिहासिक घटनाओं को वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों से जोड़ते हुए कहा कि सत्ता और शासन हमेशा स्थायी नहीं होते।
उन्होंने अपने समर्थकों के संदर्भ में कहा कि उन्हें राजनीतिक ताकतों से डरने के बजाय अपने धार्मिक विश्वास पर भरोसा है।
योगी आदित्यनाथ पर भी निशाना
ओवैसी ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ओर इशारा करते हुए मोहम्मद अली जौहर की विरासत पर सवाल उठाए जाने की आलोचना की।
उन्होंने मोहम्मद अली जौहर को शिक्षित राजनीतिक नेता बताते हुए उनके खिलाफ की जाने वाली टिप्पणियों का विरोध किया। ओवैसी ने जौहर के खिलाफत आंदोलन और कांग्रेस से जुड़े राजनीतिक सफर का भी उल्लेख किया।
मोहम्मद अली जौहर की भूमिका का किया बचाव
ओवैसी ने कहा कि मोहम्मद अली जौहर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रहे और देश की आजादी के लिए राजनीतिक संघर्ष किया। उन्होंने जौहर के जीवन के अंतिम दौर और लंदन में उनकी मृत्यु का उल्लेख करते हुए उनकी ऐतिहासिक भूमिका को रेखांकित किया।
उन्होंने यह भी बताया कि जौहर को अल-अक्सा मस्जिद के निकट दफनाया गया था।
हेडगेवार को लेकर भी टिप्पणी
भाषण में ओवैसी ने आरएसएस के संस्थापक के.बी. हेडगेवार का उल्लेख किया और उनके जेल जाने के इतिहास पर सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि हेडगेवार की गिरफ्तारी का प्रमुख संदर्भ खिलाफत आंदोलन के दौर से जुड़ा था।
इस तुलना के जरिए ओवैसी ने स्वतंत्रता आंदोलन में अलग-अलग राजनीतिक नेताओं की भूमिका पर बहस खड़ी करने की कोशिश की।
मदरसों और मस्जिदों को लेकर चिंता
भाषण के अंतिम हिस्से में ओवैसी ने मदरसों और मस्जिदों से जुड़े मामलों का भी उल्लेख किया। उन्होंने आरोप लगाया कि धार्मिक संस्थानों पर कार्रवाई करके असहमति की आवाजों को दबाया नहीं जा सकता।
उन्होंने अपने भाषण में राजनीतिक विरोध और विचारों की स्वतंत्र अभिव्यक्ति को लेकर सरकार की नीतियों की आलोचना की तथा कहा कि दबाव के बावजूद विरोध की आवाजें जारी रहेंगी।
इतिहास से वर्तमान राजनीति तक जुड़ी बहस
ओवैसी का यह भाषण केवल मनुस्मृति और संविधान तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास, सावरकर और हेडगेवार जैसे नेताओं, मोहम्मद अली जौहर तथा धार्मिक संस्थानों से जुड़े मुद्दों को वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों से जोड़कर अपनी बात रखी।
उनके भाषण में लगाए गए राजनीतिक और ऐतिहासिक आरोपों को लेकर अलग-अलग पक्षों की अलग-अलग राय हो सकती है। ऐसे दावों की वास्तविकता समझने के लिए संबंधित दस्तावेजों और आधिकारिक ऐतिहासिक स्रोतों को देखना आवश्यक है।
निष्कर्ष
असदुद्दीन ओवैसी के भाषण ने संविधान बनाम मनुस्मृति, स्वतंत्रता आंदोलन में संगठनों की भूमिका, सामाजिक समानता और धार्मिक संस्थानों जैसे मुद्दों को एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। ओवैसी ने इतिहास के कई प्रसंगों का सहारा लेते हुए आरएसएस और बीजेपी की विचारधारा तथा वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों पर सवाल उठाए।
भाषण के बाद इन मुद्दों पर राजनीतिक प्रतिक्रिया और इतिहास की व्याख्या को लेकर बहस आगे बढ़ने की संभावना है।
