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🚀 भारत की स्पेस इंडस्ट्री में ऐतिहासिक छलांग! Astrobase का ‘EVEREST’ इंजन लॉन्च, निजी क्षेत्र ने दिखाई 800 kN FFSC तकनीक की ताकत

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भारत के तेजी से उभरते निजी अंतरिक्ष क्षेत्र ने अगस्त 2026 में एक बड़ी तकनीकी उपलब्धि दर्ज की है। बेंगलुरु की स्पेस स्टार्टअप Astrobase Space Technologies ने ‘EVEREST’ नाम से अपना पूरी तरह एकीकृत Full-Flow Staged Combustion यानी FFSC LOX-Methane रॉकेट इंजन पेश किया है। कंपनी के अनुसार यह भारत का पहला निजी तौर पर विकसित 80-टन-क्लास FFSC इंजन है, जिसे देश में ही डिजाइन और तैयार किया गया है। इंजन की वैक्यूम थ्रस्ट क्षमता लगभग 800 kN बताई गई है।

यह उपलब्धि इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि FFSC रॉकेट इंजन दुनिया की सबसे जटिल और उच्च-प्रदर्शन वाली लिक्विड रॉकेट इंजन तकनीकों में गिना जाता है। Astrobase का लक्ष्य केवल इंजन बनाना नहीं, बल्कि इसी तकनीक के आधार पर भविष्य में रीयूजेबल रॉकेट लॉन्च सिस्टम तैयार करना है।

🔥 EVEREST नाम क्यों है इतना खास?

EVEREST नाम अपने आप में इस इंजन की तकनीकी चुनौती को दर्शाता है। Full-Flow Staged Combustion तकनीक को विकसित करना बेहद कठिन माना जाता है, क्योंकि इसमें इंजन के ईंधन और ऑक्सीडाइजर दोनों को प्री-बर्नर सिस्टम के माध्यम से गैसीय अवस्था में ले जाकर टर्बोपंप चलाने की प्रक्रिया अपनाई जाती है।

इसका उद्देश्य ईंधन की बर्बादी कम करना और इंजन की दक्षता बढ़ाना है। यही कारण है कि FFSC तकनीक को रॉकेट प्रणोदन के सबसे महत्वाकांक्षी डिजाइनों में शामिल किया जाता है। भारत में इस तकनीक को निजी क्षेत्र द्वारा बड़े पैमाने पर विकसित किया जाना देश के स्पेस स्टार्टअप इकोसिस्टम के लिए महत्वपूर्ण कदम है।

🧪 LOX-Methane: भविष्य के रॉकेट ईंधन पर बड़ा दांव

EVEREST इंजन में Liquid Oxygen यानी LOX और Liquid Methane को प्रणोदक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। Methane आधारित इंजन को भविष्य के रीयूजेबल रॉकेटों के लिए आकर्षक विकल्प माना जाता है, क्योंकि यह उच्च प्रदर्शन के साथ पुन: उपयोग वाली प्रणालियों के लिए उपयुक्त हो सकता है।

Astrobase के अनुसार उसका इंजन 800 kN वैक्यूम थ्रस्ट देने के लिए डिजाइन किया गया है और इसमें 50% से 110% तक थ्रॉटलिंग क्षमता रखी गई है। इंजन को कई उड़ानों के लिए पुन: उपयोग योग्य बनाने की दिशा में डिजाइन किया गया है।

🛰️ सिर्फ इंजन नहीं, भारत के रीयूजेबल रॉकेट का आधार

Astrobase की योजना EVEREST को एक बड़े रीयूजेबल लॉन्च व्हीकल के केंद्र में रखने की है। कंपनी के प्रस्तावित दो-चरणीय रॉकेट में LOX-Methane प्रणोदन और FFSC इंजन तकनीक का इस्तेमाल किया जाना है।

कंपनी की जानकारी के मुताबिक प्रस्तावित लॉन्च वाहन का लक्ष्य 500 किलोमीटर की लो अर्थ ऑर्बिट में कई टन पेलोड पहुंचाना है। पहले चरण को Return-to-Launch-Site यानी RTLS तरीके से वापस लाने की योजना है। इसका अर्थ है कि भविष्य में रॉकेट के इस्तेमाल के बाद उसका पहला चरण दोबारा पृथ्वी पर लौटकर उतर सकेगा।

यदि यह तकनीक सफल होती है, तो भारत में कम लागत और तेजी से दोबारा इस्तेमाल किए जा सकने वाले लॉन्च सिस्टम के विकास को बड़ा बढ़ावा मिल सकता है।

🇮🇳 निजी क्षेत्र की ताकत का बड़ा प्रदर्शन

भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम लंबे समय तक मुख्य रूप से सरकारी संस्थानों पर आधारित रहा है। लेकिन हाल के वर्षों में निजी कंपनियों और स्टार्टअप्स ने इस क्षेत्र में तेजी से अपनी जगह बनाई है।

Astrobase का EVEREST इसी बदलाव का उदाहरण है। कंपनी 2024 में शुरू हुई और उसने अपेक्षाकृत कम समय में इंजन डिजाइन, निर्माण, परीक्षण और बड़े पैमाने के इंफ्रास्ट्रक्चर पर काम आगे बढ़ाया है। कंपनी बेंगलुरु में अपनी असेंबली और इंटीग्रेशन सुविधा तथा आंध्र प्रदेश में इंजन परीक्षण सुविधाओं का विकास कर रही है।

🏭 भारत में ही निर्माण पर जोर

इस परियोजना की एक महत्वपूर्ण विशेषता इसका स्वदेशी निर्माण मॉडल है। Astrobase का लक्ष्य इंजन के डिजाइन और निर्माण से लेकर परीक्षण तक की क्षमताओं को देश में विकसित करना है।

कंपनी ने अपने इंजन के जटिल हिस्सों के निर्माण में 3D प्रिंटिंग जैसी आधुनिक तकनीकों को भी अपनाया है। मार्च 2026 में Astrobase की सुविधा पर भारत की बड़ी औद्योगिक 3D प्रिंटिंग मशीनों में से एक पहुंचने की खबर सामने आई थी। इसका उद्देश्य जटिल रॉकेट इंजन घटकों के उत्पादन को तेज और अधिक स्वदेशी बनाना था।

इस तरह EVEREST केवल एक इंजन प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि भारत में हाई-टेक एयरोस्पेस मैन्युफैक्चरिंग क्षमता तैयार करने की कोशिश भी है।

💥 हॉट-फायर टेस्ट की दिशा में बढ़ते कदम

किसी भी रॉकेट इंजन का वास्तविक परीक्षण उसके डिजाइन या प्रदर्शन से कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण होता है। इंजन को अत्यधिक तापमान, दबाव और कंपन की परिस्थितियों में काम करना पड़ता है।

Astrobase ने सितंबर 2025 में अपने छोटे पैमाने के इंजन का पहला हॉट-फायर टेस्ट सफलतापूर्वक पूरा करने की जानकारी दी थी। 2026 में कंपनी बड़े इंजन के हॉट-फायर परीक्षण की दिशा में आगे बढ़ रही है।

इसलिए EVEREST का अनावरण एक महत्वपूर्ण विनिर्माण और एकीकरण उपलब्धि है, लेकिन इसे अभी अंतिम उड़ान-सफलता के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। पूर्ण पैमाने के हॉट-फायर, लंबी अवधि के परीक्षण और अंततः उड़ान परीक्षण इसके अगले महत्वपूर्ण चरण होंगे।

🏛️ IN-SPACe के समर्थन से मिली रफ्तार

Astrobase को भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र के नियामक एवं प्रोत्साहन निकाय IN-SPACe के Technology Adoption Fund के तहत 800 kN LOX-Methane FFSC इंजन के विकास के लिए चुना गया है।

जून 2026 में इसकी घोषणा हुई थी। इस समर्थन का उद्देश्य स्वदेशी हाई-एंड रॉकेट प्रणोदन तकनीक के विकास को गति देना है। यह इस बात का संकेत है कि भारत का अंतरिक्ष इकोसिस्टम अब सरकारी संस्थानों के साथ-साथ निजी कंपनियों की अत्याधुनिक प्रणोदन क्षमताओं को भी महत्व दे रहा है।

🌍 SpaceX की Raptor तकनीक से क्यों हो रही तुलना?

FFSC तकनीक का नाम इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि SpaceX का Raptor इंजन इसी प्रकार के Full-Flow Staged Combustion cycle का इस्तेमाल करता है। इस तकनीक को उच्च दक्षता और उच्च प्रदर्शन की क्षमता के कारण बेहद उन्नत प्रणोदन वास्तुकला माना जाता है।

हालांकि तुलना करते समय सावधानी जरूरी है। किसी इंजन का डिजाइन समान तकनीकी श्रेणी में होना और उसका अंतरिक्ष में सफलतापूर्वक उड़ान भरना दो अलग बातें हैं। EVEREST के लिए आगे होने वाले पूर्ण पैमाने के परीक्षण और भविष्य की उड़ानें ही इसकी वास्तविक क्षमता को साबित करेंगी।

💰 भारत की स्पेस इकोनॉमी को मिल सकता है बड़ा फायदा

यदि EVEREST तकनीकी परीक्षणों में सफल होता है और इसके आधार पर रीयूजेबल लॉन्च व्हीकल विकसित किया जाता है, तो भारत के वाणिज्यिक अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए नए अवसर खुल सकते हैं।

सैटेलाइट लॉन्च की बढ़ती वैश्विक मांग के बीच कम लागत, तेज टर्नअराउंड और पुन: उपयोग योग्य रॉकेट लॉन्च सिस्टम भारत को अंतरराष्ट्रीय बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी बना सकते हैं।

इससे केवल लॉन्च सेवाओं को लाभ नहीं होगा, बल्कि इंजन निर्माण, एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग, सेंसर, एवियोनिक्स, कंपोजिट मटेरियल और अन्य एयरोस्पेस क्षेत्रों में भी नई कंपनियों और रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं।

🚀 अगला लक्ष्य: परीक्षण से उड़ान तक

Astrobase की आधिकारिक समयरेखा के अनुसार 2026 में फुल-स्केल इंजन हॉट-फायर टेस्ट और स्टेज स्टैटिक फायर टेस्ट की दिशा में काम किया जा रहा है। इसके बाद 2027 में होप टेस्ट और 2028 में लॉन्च पैड पर बूस्टर स्टैटिक फायर तथा पहली ऑर्बिटल लॉन्च की महत्वाकांक्षी योजना बताई गई है।

इन तारीखों को लक्ष्य के रूप में देखना चाहिए, अंतिम गारंटी के रूप में नहीं। रॉकेट विकास में परीक्षण के परिणामों के आधार पर कार्यक्रमों में बदलाव होना सामान्य है।

🔥 निष्कर्ष: भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र का नया अध्याय

Astrobase का EVEREST इंजन भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण तकनीकी मील का पत्थर है। 800 kN वर्ग का LOX-Methane FFSC इंजन विकसित करने का प्रयास यह दिखाता है कि भारतीय स्टार्टअप अब केवल छोटे उपग्रह या सहायक अंतरिक्ष तकनीक तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि हाई-थ्रस्ट रॉकेट प्रणोदन जैसी बेहद कठिन तकनीकों में भी कदम रख रहे हैं।

सबसे बड़ी चुनौती अब सामने है—इंजन को बार-बार सुरक्षित तरीके से हॉट-फायर करना, उसकी विश्वसनीयता साबित करना और अंततः उसे रॉकेट की उड़ान में सफल बनाना।

अगर EVEREST इन चरणों में सफल होता है, तो यह भारत की स्वदेशी रॉकेट तकनीक, रीयूजेबल लॉन्च सिस्टम और निजी अंतरिक्ष उद्योग के लिए बड़ा परिवर्तनकारी कदम साबित हो सकता है।

चांद और मंगल तक पहुंचने के बाद भारत अब अंतरिक्ष तक पहुंचने के अपने साधनों को भी नई ताकत देने की कोशिश कर रहा है। EVEREST इसी नई दौड़ का एक शक्तिशाली प्रतीक बनकर उभरा है—जहां भारत का निजी अंतरिक्ष क्षेत्र अब सिर्फ आसमान की ओर देख नहीं रहा, बल्कि खुद अपना रॉकेट इंजन बनाकर अंतरिक्ष की अगली मंजिल की तैयारी कर रहा है।

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