
नई दिल्ली: भारत की कृषि व्यवस्था में विज्ञान और तकनीक का दायरा लगातार बढ़ रहा है। अब परमाणु विज्ञान का इस्तेमाल केवल ऊर्जा या चिकित्सा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव खेतों तक भी पहुंच चुका है। भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) ने विकिरण-प्रेरित उत्परिवर्तन यानी Radiation-Induced Mutagenesis और क्रॉस ब्रीडिंग की मदद से अलग-अलग फसलों की 72 उन्नत किस्में विकसित की हैं। इन किस्मों को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों के सहयोग से देशभर में व्यावसायिक खेती के लिए जारी और अधिसूचित किया जा चुका है।
सरकार के मुताबिक इन नई किस्मों में अधिक उत्पादन, बेहतर बीज आकार, जल्दी पकने की क्षमता और सूखा, गर्मी तथा लवणता जैसी जलवायु चुनौतियों को सहने की क्षमता जैसे गुण शामिल हैं। कई किस्मों में रोग प्रतिरोधक क्षमता भी विकसित की गई है। ऐसे समय में जब बदलता मौसम भारतीय खेती के सामने बड़ी चुनौती बन रहा है, परमाणु तकनीक आधारित यह कृषि अनुसंधान किसानों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
🌾 BARC की 72 किस्मों में कौन-कौन सी फसलें शामिल?
BARC द्वारा विकसित 72 उन्नत किस्में कई महत्वपूर्ण खाद्यान्न, दलहन और तिलहन फसलों से जुड़ी हैं। सरकार की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार इनमें मूंगफली की 17, चावल की 10, मूंग की 9, सरसों की 9, उड़द की 8, अरहर की 5 और ज्वार की 3 किस्में शामिल हैं।
इसके अलावा लोबिया, गेहूं और सोयाबीन की 2-2 किस्में तथा केला, तिल, अलसी, सूरजमुखी और जूट की एक-एक किस्म विकसित की गई है।
यह विविधता बताती है कि परमाणु विज्ञान आधारित फसल सुधार का प्रयोग केवल एक या दो फसलों तक सीमित नहीं है। इसका दायरा अनाज से लेकर दलहन, तिलहन, फल और रेशेदार फसलों तक फैल चुका है।
⚛️ आखिर radiation से फसल की नई किस्म कैसे बनती है?
यहां एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है कि आखिर विकिरण का इस्तेमाल करके पौधों की नई किस्म तैयार कैसे की जाती है?
Radiation-Induced Mutagenesis एक ऐसी तकनीक है जिसमें बीज या पौधों की आनुवंशिक सामग्री में नियंत्रित तरीके से परिवर्तन उत्पन्न किए जाते हैं। इसका उद्देश्य ऐसे उपयोगी गुणों वाले पौधों की पहचान करना होता है जो सामान्य प्रजनन प्रक्रिया में आसानी से सामने नहीं आते।
सरकार के अनुसार इस प्रक्रिया में बीजों को विकिरण के संपर्क में लाकर DNA में परिवर्तन उत्पन्न किए जाते हैं। इसके बाद वैज्ञानिक कई पीढ़ियों और विभिन्न परिस्थितियों में पौधों का परीक्षण करते हैं। उपयोगी गुण वाले पौधों को आगे बढ़ाया जाता है और फिर उनका व्यापक मूल्यांकन किया जाता है।
इस तकनीक को प्राकृतिक उत्परिवर्तन की प्रक्रिया को तेज करने के एक वैज्ञानिक तरीके के रूप में समझा जा सकता है।
🧬 क्या radiation से तैयार फसलें सुरक्षित हैं?
परमाणु तकनीक का नाम सुनते ही अक्सर लोगों के मन में रेडियोधर्मिता और स्वास्थ्य सुरक्षा को लेकर सवाल उठते हैं। सरकार ने स्पष्ट किया है कि विकिरण-प्रेरित उत्परिवर्तन से तैयार फसलें रेडियोधर्मी नहीं बनतीं।
सरकारी जानकारी के अनुसार नई किस्मों को किसानों के लिए जारी करने से पहले कई स्तरों पर परीक्षण किया जाता है। इनका विभिन्न स्थानों पर बहु-स्थलीय परीक्षण, कृषि प्रदर्शन, अनुकूलता और मौजूदा किस्मों की तुलना में श्रेष्ठता का मूल्यांकन किया जाता है। इसके बाद ही उपयुक्त किस्म को व्यावसायिक खेती के लिए जारी किया जाता है।
यानी किसी किस्म को सीधे प्रयोगशाला से खेत तक नहीं पहुंचाया जाता, बल्कि उसे लंबे परीक्षण और मूल्यांकन की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।
☀️ बदलती जलवायु के बीच किसानों के लिए क्यों महत्वपूर्ण?
भारतीय कृषि आज कई मोर्चों पर चुनौती का सामना कर रही है। कहीं अत्यधिक बारिश फसल बर्बाद करती है तो कहीं लंबे समय तक सूखा पड़ जाता है। कई क्षेत्रों में तापमान बढ़ने, मिट्टी में लवणता और नए रोगों का दबाव भी खेती की लागत और उत्पादन दोनों को प्रभावित करता है।
ऐसे वातावरण में ऐसी फसल किस्मों की जरूरत बढ़ जाती है जो जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को सहन कर सकें।
BARC की विकसित किस्मों में सूखा, गर्मी और लवणता जैसी परिस्थितियों के प्रति सहनशीलता तथा रोग प्रतिरोधकता जैसे गुणों को महत्व दिया गया है। अगर इन किस्मों का प्रदर्शन अलग-अलग कृषि-जलवायु क्षेत्रों में उम्मीद के अनुरूप रहता है, तो ये किसानों के लिए जोखिम कम करने में मददगार हो सकती हैं।
📈 ज्यादा उत्पादन और जल्दी पकने का फायदा
किसान के लिए किसी भी नई किस्म की सफलता का सबसे महत्वपूर्ण पैमाना उसका आर्थिक लाभ होता है। अधिक उत्पादन, कम अवधि में फसल तैयार होना और रोगों से कम नुकसान सीधे तौर पर किसान की आय और लागत को प्रभावित करते हैं।
सरकारी जानकारी के अनुसार BARC की नई किस्मों में अधिक उपज, बेहतर बीज आकार और जल्दी परिपक्वता जैसे गुण मौजूद हैं। कुछ किस्मों में अन्य उपयोगी कृषि गुण भी विकसित किए गए हैं।
अगर कम समय में फसल तैयार होती है तो किसान कई क्षेत्रों में फसल चक्र को बेहतर तरीके से प्रबंधित कर सकता है। वहीं रोग और मौसम संबंधी नुकसान कम होने से उत्पादन में स्थिरता आने की संभावना बढ़ती है।
🔬 ICAR और कृषि विश्वविद्यालयों की अहम भूमिका
BARC द्वारा विकसित किसी किस्म को सीधे किसानों तक पहुंचाना संभव नहीं है। इसके लिए कृषि अनुसंधान संस्थानों और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
सरकार के अनुसार इन किस्मों के विकास, मूल्यांकन और व्यावसायिक रिलीज में ICAR और State Agricultural Universities (SAUs) के साथ सहयोग किया गया है। विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों में इन किस्मों का परीक्षण किया जाता है ताकि यह पता लगाया जा सके कि कौन सी किस्म किस क्षेत्र और मौसम के लिए अधिक उपयुक्त है।
इस वैज्ञानिक मूल्यांकन के बाद ही बेहतर प्रदर्शन करने वाली किस्मों को आगे बढ़ाया जाता है।
🌱 किसानों तक बीज पहुंचाने की तैयारी
किसी नई कृषि तकनीक की असली सफलता तब मानी जाती है जब उसका लाभ प्रयोगशाला से निकलकर खेत तक पहुंचे। इसी दिशा में Department of Atomic Energy (DAE) ने Trombay किस्मों के गुणवत्तापूर्ण बीजों के बड़े पैमाने पर उत्पादन और वितरण के लिए विभिन्न संस्थाओं के साथ काम किया है।
इन बीजों को राज्य बीज निगमों, कृषि विभागों, कृषि विश्वविद्यालयों, कृषि विज्ञान केंद्रों (KVKs), किसान उत्पादक संगठनों (FPOs), किसान सहकारी समितियों, बीज कंपनियों और किसानों तक पहुंचाने की व्यवस्था की जा रही है।
इसके अलावा किसान मेलों, फील्ड डेमोंस्ट्रेशन, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और जागरूकता अभियानों के माध्यम से भी इन किस्मों की जानकारी किसानों तक पहुंचाई जा रही है।
🥜 सिर्फ फसल सुधार नहीं, भोजन संरक्षण पर भी जोर
परमाणु विज्ञान का इस्तेमाल कृषि क्षेत्र में केवल नई किस्में तैयार करने तक सीमित नहीं है। BARC ने विकिरण आधारित खाद्य संरक्षण तकनीक भी विकसित की है।
इस तकनीक का इस्तेमाल फल, सब्जियों, अनाज, दालों और मसालों जैसे कृषि उत्पादों की शेल्फ लाइफ बढ़ाने तथा कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करने के लिए किया जा सकता है। कुछ कृषि उत्पादों के लिए विकिरण उपचार अंतरराष्ट्रीय फाइटोसैनिटरी आवश्यकताओं को पूरा करने में भी मदद करता है।
भारत जैसे देश में, जहां बड़ी मात्रा में कृषि उपज कटाई के बाद खराब हो जाती है, ऐसी तकनीक किसानों और कृषि व्यापार दोनों के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है।
🥭 निर्यात को भी मिल सकता है बड़ा फायदा
खाद्य संरक्षण तकनीक का एक और महत्वपूर्ण लाभ कृषि निर्यात से जुड़ा है। कुछ देशों में फलों और अन्य कृषि उत्पादों के आयात के लिए विशेष फाइटोसैनिटरी उपचार जरूरी होते हैं।
BARC द्वारा विकसित विकिरण आधारित तकनीकों का इस्तेमाल ऐसे उत्पादों के लिए किया जा रहा है, जिससे उनकी गुणवत्ता और भंडारण अवधि बनाए रखने में मदद मिलती है तथा अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच आसान हो सकती है।
इससे भारतीय किसानों को केवल घरेलू बाजार ही नहीं, बल्कि वैश्विक कृषि बाजार में भी बेहतर अवसर मिलने की संभावना है।
🏭 देश में बढ़ रहा food irradiation infrastructure
सरकार ने खाद्य विकिरण तकनीक को बढ़ावा देने के लिए बुनियादी ढांचे के विस्तार पर भी जोर दिया है। PIB की हालिया जानकारी के अनुसार देश में 42 food irradiation facilities कमीशन की जा चुकी हैं। इसके अलावा निजी क्षेत्र को भी तकनीक के व्यावसायीकरण के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।
इससे भविष्य में कृषि उपज के संरक्षण, प्रसंस्करण और निर्यात से जुड़ी पूरी वैल्यू चेन को मजबूती मिल सकती है।
🚜 किसानों के लिए क्या बदल सकता है?
BARC की 72 उन्नत किस्मों और radiation-based food technologies का व्यापक प्रभाव कई स्तरों पर दिखाई दे सकता है।
पहला, बेहतर किस्मों से उत्पादन और फसल की गुणवत्ता में सुधार की संभावना है।
दूसरा, जल्दी पकने और मौसम सहनशील गुणों से खेती का जोखिम कम हो सकता है।
तीसरा, रोग प्रतिरोधी और जलवायु-अनुकूल किस्में बदलते मौसम में किसानों के लिए सुरक्षा कवच बन सकती हैं।
चौथा, खाद्य संरक्षण तकनीक से कटाई के बाद होने वाला नुकसान कम करने में मदद मिल सकती है।
पांचवां, बेहतर संरक्षण और फाइटोसैनिटरी उपचार से कृषि निर्यात को बढ़ावा मिल सकता है।
🔥 भारत की कृषि में विज्ञान की नई दिशा
भारत में परमाणु ऊर्जा का उपयोग लंबे समय से चिकित्सा, उद्योग और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में किया जाता रहा है। अब इसका एक महत्वपूर्ण विस्तार कृषि क्षेत्र में दिखाई दे रहा है।
BARC की 72 उन्नत फसल किस्में इस बात का उदाहरण हैं कि अत्याधुनिक विज्ञान को किसानों की रोजमर्रा की जरूरतों से जोड़ा जा सकता है। यहां परमाणु तकनीक का उद्देश्य किसी जटिल प्रयोग तक सीमित नहीं, बल्कि बेहतर बीज, अधिक उत्पादन, जलवायु सहनशीलता और खाद्य सुरक्षा जैसे सीधे कृषि लक्ष्यों को हासिल करना है।
निष्कर्ष
भारत के लिए कृषि केवल अर्थव्यवस्था का हिस्सा नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आजीविका और देश की खाद्य सुरक्षा की आधारशिला है। ऐसे में BARC द्वारा विकसित 72 उन्नत फसल किस्में विज्ञान और खेती के बीच बनते मजबूत रिश्ते की बड़ी मिसाल हैं।
मूंगफली, चावल, मूंग, सरसों, उड़द, अरहर, ज्वार, गेहूं, सोयाबीन, केला और जूट जैसी विभिन्न फसलों में विकसित इन किस्मों का लक्ष्य केवल अधिक उत्पादन नहीं, बल्कि ऐसी खेती को बढ़ावा देना है जो मौसम के बदलते मिजाज के सामने ज्यादा मजबूत और टिकाऊ हो।
अब चुनौती इन वैज्ञानिक उपलब्धियों को ज्यादा से ज्यादा किसानों तक पहुंचाने की है। यदि गुणवत्तापूर्ण बीज, सही कृषि सलाह, स्थानीय स्तर पर परीक्षण और बाजार तक बेहतर पहुंच सुनिश्चित होती है, तो परमाणु विज्ञान से निकली यह तकनीक भारतीय खेतों में नई उत्पादकता और खाद्य सुरक्षा की मजबूत नींव रख सकती है।
