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नेतन्याहू ने बेन ग्विर और स्मोट्रिच से एकजुट होने की अपील, दक्षिणपंथी गठबंधन को लेकर बढ़ी सियासी हलचल

यरुशलम, 28 अगस्त 2026। इजरायल की राजनीति में आगामी चुनाव को लेकर सियासी गतिविधियां तेज हो गई हैं। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने दक्षिणपंथी खेमे के दो प्रमुख नेताओं—इटामार बेन ग्विर और बेज़लेल स्मोट्रिच—से चुनावी एकजुटता की अपील की है। नेतन्याहू का कहना है कि अगर दोनों नेता अलग-अलग चुनाव लड़ते हैं तो दक्षिणपंथी मतों के बंटने का खतरा पैदा हो सकता है और इसका असर सरकार बनाने की संभावनाओं पर पड़ सकता है।

नेतन्याहू ने सोशल मीडिया पर जारी संदेश में बेन ग्विर को संबोधित करते हुए स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य दक्षिणपंथ को कमजोर करना नहीं, बल्कि उसे मजबूत करना है। उन्होंने दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक मतभेदों को पीछे छोड़कर साथ आने की जरूरत पर जोर दिया। उनके मुताबिक, पिछले चुनावी अनुभवों से यह संकेत मिलता है कि दक्षिणपंथी दलों के अलग-अलग चुनाव लड़ने से वोटों का विभाजन हो सकता है।

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बेन ग्विर को नेतन्याहू का सीधा संदेश

नेतन्याहू की अपील ऐसे समय सामने आई है जब बेन ग्विर और स्मोट्रिच की पार्टियों के बीच संभावित चुनावी गठबंधन को लेकर असमंजस बना हुआ है। नेतन्याहू ने बेन ग्विर से कहा कि व्यक्तिगत मतभेदों को राजनीतिक हित से ऊपर नहीं रखा जाना चाहिए। उनका तर्क है कि यदि दोनों दल साथ आते हैं तो दक्षिणपंथी खेमे को चुनाव में अधिक प्रभावी स्थिति मिल सकती है।

नेतन्याहू ने अपने संदेश में यह भी तर्क दिया कि स्मोट्रिच की पार्टी चुनावी सीमा पार करने की स्थिति को लेकर दबाव में है। हालिया सर्वेक्षणों में धार्मिक राष्ट्रवादी दल के प्रदर्शन को लेकर अलग-अलग अनुमान सामने आए हैं। कुछ सर्वेक्षणों में पार्टी के लिए चुनावी सीमा पार करना चुनौतीपूर्ण बताया गया है।

वोटों के बंटवारे की चिंता

इजरायल की संसदीय व्यवस्था में किसी पार्टी के लिए संसद में प्रवेश करने के लिए न्यूनतम चुनावी सीमा पार करना आवश्यक होता है। ऐसे में छोटी पार्टियों के लिए कुछ सीटों का अंतर भी महत्वपूर्ण हो जाता है। यदि कोई पार्टी आवश्यक सीमा तक समर्थन हासिल नहीं कर पाती, तो उसके लिए डाले गए वोट संसद में सीटों में परिवर्तित नहीं होते।

यही वजह है कि नेतन्याहू दक्षिणपंथी दलों के बीच संभावित एकता को महत्वपूर्ण मान रहे हैं। उनके अनुसार, अलग-अलग चुनाव लड़ने की स्थिति में दक्षिणपंथी मतदाताओं का एक हिस्सा ऐसी पार्टियों को जा सकता है जो संसद में पर्याप्त प्रतिनिधित्व हासिल नहीं कर पाएं।

27 अगस्त को नेतन्याहू ने सार्वजनिक रूप से भी दोनों नेताओं से एक साथ चुनाव लड़ने की अपील की। उन्होंने कहा कि अतीत में एकजुट होकर चुनाव लड़ने पर दक्षिणपंथी खेमे को लाभ मिला है, जबकि विभाजन से नुकसान हुआ।

बेन ग्विर और स्मोट्रिच के बीच मतभेद

बेन ग्विर और स्मोट्रिच दोनों इजरायल के दक्षिणपंथी राजनीतिक खेमे में प्रभावशाली नेता हैं, लेकिन उनके राजनीतिक दृष्टिकोण और चुनावी रणनीतियों में अंतर भी दिखाई देता है। दोनों की पार्टियां 2022 के चुनाव में साथ आई थीं, लेकिन चुनाव के बाद दोनों अलग-अलग राजनीतिक रास्ते पर आगे बढ़े।

इस बार भी दोनों नेताओं के बीच संयुक्त चुनावी अभियान को लेकर सहज सहमति नहीं बनी है। अगस्त की शुरुआत में स्मोट्रिच ने कहा था कि उनकी धार्मिक राष्ट्रवादी पार्टी को स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ना चाहिए। उन्होंने पार्टी को एक मजबूत और महत्वपूर्ण राजनीतिक ताकत के रूप में पेश करने की बात कही थी।

वहीं बेन ग्विर भी पहले दोनों दलों के दोबारा विलय के प्रति उत्साहित नहीं दिखाई दिए। उन्होंने तर्क दिया था कि दोनों दल अलग-अलग मतदाता समूहों को आकर्षित करते हैं और उनका राजनीतिक आधार पूरी तरह समान नहीं है।

नेतन्याहू के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह गठबंधन?

नेतन्याहू के लिए बेन ग्विर और स्मोट्रिच के बीच एकता केवल दो राजनीतिक दलों का मामला नहीं है। इसका सीधा संबंध आगामी चुनाव में दक्षिणपंथी गठबंधन की संभावनाओं से जुड़ा हुआ है।

यदि दक्षिणपंथी दल अलग-अलग चुनाव लड़ते हैं और किसी छोटी पार्टी को पर्याप्त समर्थन नहीं मिलता, तो दक्षिणपंथी खेमे के कुल सीटों पर उसका प्रभाव पड़ सकता है। इसके विपरीत, एक संयुक्त सूची चुनावी समर्थन को अधिक प्रभावी तरीके से सीटों में बदलने में मदद कर सकती है। हालिया एक सर्वेक्षण के अनुसार, दोनों दल अलग-अलग लड़ें तो धार्मिक राष्ट्रवादी पार्टी के चुनावी सीमा से नीचे रहने की संभावना जताई गई, जबकि संयुक्त रूप से लड़ने पर दोनों को मिलाकर अधिक सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया।

इसी राजनीतिक गणित को देखते हुए नेतन्याहू दोनों नेताओं के बीच समझौते की कोशिश कर रहे हैं।

बेन ग्विर ने क्या संकेत दिए?

नेतन्याहू की अपील के बाद बेन ग्विर की प्रतिक्रिया से स्पष्ट हुआ कि दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक मतभेद अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। रिपोर्टों के अनुसार, बेन ग्विर ने नेतन्याहू की चिंता पर सवाल उठाते हुए यह संकेत दिया कि वे अपनी पार्टी की राजनीतिक स्वतंत्रता को बनाए रखना चाहते हैं।

बेन ग्विर की राजनीति का आधार व्यापक दक्षिणपंथी मतदाताओं तक पहुंच बनाने की कोशिश पर केंद्रित रहा है, जबकि स्मोट्रिच का समर्थन धार्मिक राष्ट्रवादी मतदाताओं में अधिक केंद्रित माना जाता है। यही अंतर दोनों दलों की चुनावी रणनीति को प्रभावित कर सकता है।

स्मोट्रिच की स्थिति भी अहम

स्मोट्रिच के लिए चुनावी सीमा एक महत्वपूर्ण राजनीतिक चुनौती बनती दिखाई दे रही है। हालिया रिपोर्टों में उनके दल के समर्थन को लेकर उतार-चढ़ाव का उल्लेख किया गया है। ऐसे माहौल में नेतन्याहू की एकता की अपील स्मोट्रिच के लिए भी महत्वपूर्ण राजनीतिक विकल्प बन सकती है।

हालांकि, संयुक्त चुनाव लड़ने का निर्णय केवल चुनावी गणित से तय नहीं होगा। दोनों दलों के नेताओं को उम्मीदवारों के बंटवारे, नेतृत्व की भूमिका, नीति संबंधी प्राथमिकताओं और चुनाव के बाद संभावित गठबंधन जैसे मुद्दों पर भी सहमति बनानी होगी।

आगामी चुनाव पर पड़ेगा असर

इजरायल का आगामी चुनाव पहले से ही कई राजनीतिक समीकरणों के बीच हो रहा है। विपक्षी खेमे में भी नई राजनीतिक संरचनाएं उभर रही हैं और प्रधानमंत्री नेतन्याहू के सामने कई चुनौतीपूर्ण समीकरण हैं। ऐसे में दक्षिणपंथी मतों को एकजुट रखना उनके लिए महत्वपूर्ण रणनीतिक लक्ष्य बन गया है।

नेतन्याहू पहले भी व्यापक राजनीतिक गठबंधन और राष्ट्रीय एकता की बात कर चुके हैं। हालांकि दक्षिणपंथी खेमे के भीतर ही गठबंधन को लेकर अलग-अलग विचार मौजूद हैं।

आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि बेन ग्विर और स्मोट्रिच नेतन्याहू की अपील पर किस तरह प्रतिक्रिया देते हैं और क्या दोनों दल संयुक्त चुनावी रणनीति तैयार करने पर सहमत होते हैं।

निष्कर्ष

इजरायल की राजनीति में बेन ग्विर और स्मोट्रिच को एक साथ लाने की नेतन्याहू की कोशिश चुनावी गणित को देखते हुए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। प्रधानमंत्री का मुख्य तर्क है कि दक्षिणपंथी वोटों का विभाजन राजनीतिक नुकसान में बदल सकता है, जबकि एकजुट होकर चुनाव लड़ने से दोनों दलों की संयुक्त ताकत बढ़ सकती है।

फिलहाल दोनों नेताओं के बीच मतभेद पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं। इसलिए यह देखना दिलचस्प होगा कि आगामी चुनाव से पहले क्या दक्षिणपंथी खेमे में समझौता हो पाता है या दोनों पार्टियां अपनी-अपनी पहचान के साथ अलग-अलग चुनाव मैदान में उतरती हैं। इस फैसले का असर न केवल दोनों दलों के भविष्य पर, बल्कि इजरायल में अगली सरकार के गठन के राजनीतिक समीकरण पर भी पड़ सकता है।

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