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कनाडा-अमेरिका व्यापार संबंधों में बढ़ा तनाव, वार्ता विफल होने के बाद टैरिफ युद्ध का खतरा

नई दिल्ली/वॉशिंगटन। कनाडा और अमेरिका के बीच लंबे समय से चले आ रहे व्यापारिक रिश्तों में अगस्त 2026 में तनाव एक नए स्तर पर पहुंच गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी की सरकार के बीच व्यापार समझौते को लेकर चल रही बातचीत आखिरी दौर में टूट गई। इसके बाद अमेरिका ने कनाडा के कई उत्पादों पर 50 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लागू कर दिया, जबकि कनाडा ने भी जवाबी कार्रवाई के तौर पर अमेरिकी सामान पर समान मूल्य के प्रतिशोधी शुल्क लगाने की घोषणा की है।

यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका और कनाडा दुनिया के सबसे गहरे आर्थिक रूप से जुड़े पड़ोसी देशों में शामिल हैं। दोनों देशों के बीच ऊर्जा, ऑटोमोबाइल, कृषि, धातु, विनिर्माण और उपभोक्ता वस्तुओं का बड़ा कारोबार होता है। ऐसे में टैरिफ बढ़ने का असर केवल सरकारों और बड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि कारोबार, रोजगार और उपभोक्ताओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है।

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वार्ता टूटने से बिगड़ा माहौल

पिछले कई सप्ताह से दोनों देशों के अधिकारी व्यापार संबंधों को स्थिर करने और नए समझौते तक पहुंचने के लिए बातचीत कर रहे थे। अगस्त के मध्य में दोनों पक्षों की ओर से यह संकेत मिले थे कि बातचीत में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। कनाडा के प्रधानमंत्री कार्यालय ने 18 अगस्त को कहा था कि अमेरिका ने कुछ कनाडाई वस्तुओं पर प्रस्तावित 50 प्रतिशत टैरिफ लागू करने की समयसीमा को 21 अगस्त तक टाल दिया है, ताकि वार्ता जारी रह सके।

हालांकि, अंतिम चरण में दोनों देशों की प्राथमिकताओं के बीच अंतर इतना बढ़ गया कि समझौता नहीं हो सका। प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने 22 अगस्त को कहा कि अमेरिका की ओर से अंतिम समय में रखी गई कुछ शर्तें कनाडा के लिए अनुचित और आर्थिक रूप से नुकसानदेह थीं। कनाडा ने इसी आधार पर बातचीत से अपने वार्ताकारों को वापस बुला लिया।

दूसरी ओर, अमेरिकी प्रशासन का रुख यह है कि अमेरिका को अपने व्यापारिक हितों की रक्षा करने और अमेरिकी कंपनियों के लिए समान परिस्थितियां सुनिश्चित करने का अधिकार है। दोनों देशों के दावों के बीच अंतर ने विवाद को और गहरा कर दिया है।

अमेरिका ने 50 प्रतिशत टैरिफ लगाया

वार्ता विफल होने के बाद अमेरिका ने लगभग 20 अरब डॉलर मूल्य के कनाडाई सामान पर 50 प्रतिशत टैरिफ लागू कर दिया। रिपोर्टों के अनुसार इससे कनाडा के अमेरिका को होने वाले कुल निर्यात का लगभग 5 प्रतिशत हिस्सा प्रभावित होता है। प्रभावित उत्पादों में कई उपभोक्ता और औद्योगिक वस्तुएं शामिल हैं।

इन शुल्कों का असर कुछ ऐसे उत्पादों पर भी पड़ सकता है जो पहले दोनों देशों के बीच अपेक्षाकृत आसान व्यापार व्यवस्था का लाभ उठा रहे थे। हॉकी उपकरण, खाद्य सामग्री, फर्नीचर, सीमेंट, कपड़ा, इलेक्ट्रॉनिक सामान और कुछ अन्य उत्पादों को नई टैरिफ व्यवस्था में शामिल किया गया है। हालांकि ऊर्जा, पोटाश और कुछ समुद्री उत्पादों जैसे क्षेत्रों को अलग रखा गया है।

अमेरिकी कदम ने कनाडा में राजनीतिक और आर्थिक प्रतिक्रिया तेज कर दी है। कनाडाई सरकार का कहना है कि वह अपने उद्योगों और श्रमिकों के हितों की रक्षा करेगी।

कनाडा की जवाबी कार्रवाई

अमेरिकी टैरिफ के जवाब में प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने अमेरिकी उत्पादों पर “डॉलर के बदले डॉलर” के आधार पर जवाबी शुल्क लगाने की घोषणा की है। कनाडा की ओर से यह कदम 8 सितंबर से लागू किए जाने की बात कही गई है। प्रस्तावित जवाबी टैरिफ में अमेरिकी स्टील, इलेक्ट्रॉनिक्स, उपकरण, कृषि मशीनरी और अन्य वस्तुओं को निशाना बनाया जा सकता है।

कनाडा का कहना है कि उसका उद्देश्य अमेरिकी अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाना नहीं, बल्कि अपने उद्योगों और कारोबारियों को अमेरिकी टैरिफ के प्रभाव से बचाना है। साथ ही कनाडा अपने निर्यात बाजारों में विविधता लाने की रणनीति पर भी जोर दे रहा है।

ऑटोमोबाइल और स्टील बना बड़ा मुद्दा

दोनों देशों के बीच व्यापार विवाद में ऑटोमोबाइल, स्टील और एल्युमिनियम जैसे रणनीतिक उद्योग सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में रहे हैं। अमेरिका कनाडाई उत्पादों के लिए ऐसी व्यापार व्यवस्था चाहता है जिससे अमेरिकी उद्योगों को अधिक संरक्षण मिले, जबकि कनाडा अपने निर्माताओं को अमेरिकी बाजार तक प्रतिस्पर्धी पहुंच बनाए रखना चाहता है।

ऑटो सेक्टर दोनों अर्थव्यवस्थाओं के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। कनाडा और अमेरिका में वाहन निर्माण की आपूर्ति श्रृंखलाएं लंबे समय से एक-दूसरे से जुड़ी हैं। किसी एक देश में शुल्क बढ़ने पर उत्पादन लागत बढ़ सकती है और इसका असर दूसरे देश के कारखानों पर भी पड़ सकता है।

स्टील और एल्युमिनियम को लेकर भी पहले से विवाद चल रहा है। कनाडा का कहना है कि इन क्षेत्रों में ऊंचे अमेरिकी शुल्क उसके उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को प्रभावित करते हैं। वहीं अमेरिका अपने घरेलू उद्योगों को मजबूत करने को टैरिफ नीति का प्रमुख आधार बताता रहा है।

USMCA के भविष्य पर भी सवाल

अमेरिका, कनाडा और मेक्सिको के बीच व्यापार संबंधों को नियंत्रित करने वाला USMCA यानी अमेरिका-मेक्सिको-कनाडा समझौता भी इस विवाद के बीच चर्चा में है। व्यापार विशेषज्ञों के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि यदि टैरिफ विवाद लंबे समय तक जारी रहता है तो उत्तर अमेरिकी व्यापार व्यवस्था में अनिश्चितता बढ़ सकती है।

कई कंपनियां उत्पादन और निवेश से जुड़े फैसले वर्षों पहले बनाती हैं। लेकिन लगातार बदलती टैरिफ नीति उनके लिए लागत और बाजार की स्थिति का अनुमान लगाना कठिन बना सकती है। इससे नए निवेश पर भी असर पड़ने की आशंका है।

उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है असर

टैरिफ का सीधा अर्थ है कि आयातित सामान पर अतिरिक्त शुल्क लगाया जाता है। शुरुआत में इसका भार आयातकों और कंपनियों पर पड़ सकता है, लेकिन लंबे समय तक शुल्क जारी रहने पर उसका कुछ हिस्सा उत्पादों की कीमतों के माध्यम से उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है।

अमेरिका और कनाडा में ऐसे कई उद्योग हैं जिनकी आपूर्ति श्रृंखलाएं सीमा के दोनों ओर फैली हुई हैं। इसलिए किसी एक देश द्वारा शुल्क बढ़ाने पर कंपनियों को वैकल्पिक आपूर्तिकर्ता तलाशने, उत्पादन व्यवस्था बदलने या कीमतों में बदलाव करने की जरूरत पड़ सकती है।

विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि लंबे समय तक चलने वाला व्यापार संघर्ष दोनों देशों में कारोबारी लागत और उपभोक्ता कीमतों को बढ़ा सकता है।

कनाडा अब नए बाजारों की ओर देख रहा

प्रधानमंत्री कार्नी ने संकेत दिया है कि कनाडा को अमेरिकी बाजार पर अत्यधिक निर्भरता कम करनी होगी। कनाडा पहले से ही यूरोप और एशिया सहित अन्य बाजारों के साथ अपने व्यापारिक संबंधों को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।

कनाडा के लिए यह आसान बदलाव नहीं होगा, क्योंकि अमेरिका उसका सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार है। फिर भी मौजूदा विवाद ने ओटावा को आर्थिक विविधीकरण की दिशा में तेजी से आगे बढ़ने का कारण दिया है।

कनाडा सरकार घरेलू निवेश, आंतरिक व्यापार बाधाओं को कम करने और नए निर्यात बाजार विकसित करने पर भी जोर दे रही है

अमेरिका के लिए भी जोखिम कम नहीं

यह विवाद केवल कनाडा के लिए चुनौती नहीं है। अमेरिकी कंपनियां भी कनाडा से आने वाले कच्चे माल और तैयार उत्पादों पर निर्भर हैं। यदि आयात महंगा होता है तो अमेरिकी कंपनियों की उत्पादन लागत बढ़ सकती है।

अमेरिकी व्यापारिक संगठनों और कुछ नेताओं ने भी चेतावनी दी है कि लंबे समय तक चलने वाला टैरिफ संघर्ष अमेरिकी उपभोक्ताओं और उद्योगों पर दबाव डाल सकता है। ऑटोमोबाइल, कृषि, निर्माण और सीमा से जुड़े कारोबार विशेष रूप से संवेदनशील माने जा रहे हैं।

राजनीतिक रिश्तों पर भी असर

कनाडा और अमेरिका के संबंध केवल व्यापार तक सीमित नहीं हैं। दोनों देश सुरक्षा, ऊर्जा, सीमा प्रबंधन और क्षेत्रीय सहयोग में भी लंबे समय से साझेदार रहे हैं। इसलिए व्यापार विवाद का असर व्यापक द्विपक्षीय संबंधों पर पड़ने की आशंका है।

मार्क कार्नी ने स्पष्ट किया है कि कनाडा अमेरिका के साथ बेहतर संबंध चाहता है, लेकिन वह ऐसा समझौता स्वीकार नहीं करेगा जिसे वह अपने आर्थिक हितों या संप्रभुता के खिलाफ मानता हो। उन्होंने साथ ही कहा है कि दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक और पारस्परिक रूप से लाभकारी समझौते की संभावना अभी समाप्त नहीं हुई है।

आगे क्या हो सकता है?

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या दोनों देश फिर से बातचीत की मेज पर लौटेंगे। व्यापार विवाद में अक्सर शुरुआती टैरिफ के बाद बातचीत का नया दौर शुरू होता है, क्योंकि दोनों देशों के उद्योगों पर दबाव बढ़ने लगता है।

यदि अमेरिका और कनाडा समझौते की दिशा में आगे बढ़ते हैं तो टैरिफ में कमी और व्यापारिक अनिश्चितता खत्म करने की संभावना बन सकती है। लेकिन यदि दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर कायम रहते हैं, तो व्यापार तनाव लंबे समय तक जारी रह सकता है।

आने वाले सप्ताहों में कनाडा की जवाबी टैरिफ नीति और अमेरिका की अगली प्रतिक्रिया इस विवाद की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण होगी।

निष्कर्ष

कनाडा और अमेरिका के बीच मौजूदा व्यापार विवाद केवल टैरिफ का मामला नहीं रह गया है। यह दोनों देशों के बीच आर्थिक साझेदारी के भविष्य, व्यापारिक नियमों, औद्योगिक प्रतिस्पर्धा और राष्ट्रीय हितों से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन चुका है। अमेरिका द्वारा कनाडाई वस्तुओं पर 50 प्रतिशत शुल्क और कनाडा की ओर से जवाबी कार्रवाई ने तनाव को और बढ़ा दिया है।

हालांकि दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे पर काफी निर्भर हैं, इसलिए लंबे समय तक चलने वाला व्यापार युद्ध किसी के लिए भी आसान नहीं होगा। कंपनियों, श्रमिकों और उपभोक्ताओं के हित में यही होगा कि दोनों सरकारें बातचीत के जरिए ऐसा समाधान खोजें जिसमें व्यापारिक स्थिरता के साथ-साथ दोनों देशों के आर्थिक और राष्ट्रीय हितों का सम्मान हो।

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