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दिल्ली हाईकोर्ट का अहम फैसला: “हर संत का एक अतीत होता है, हर पापी का भविष्य”—20 साल जेल काट चुके उम्रकैदी की रिहाई का आदेश

नई दिल्ली, 31 अगस्त 2026: दिल्ली हाईकोर्ट ने सजा और सुधार के बीच संतुलन को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए 20 साल से अधिक समय तक वास्तविक कारावास की सजा काट चुके एक उम्रकैदी की तत्काल रिहाई का आदेश दिया है। अदालत ने अपने फैसले की शुरुआत ऋग्वेद में की गई क्षमा की प्रार्थना के संदर्भ से की और प्रसिद्ध लेखक ऑस्कर वाइल्ड की पंक्ति “No saint is without a past, no sinner is without a future” का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति को केवल उसकी सबसे बड़ी गलती के आधार पर हमेशा के लिए परिभाषित नहीं किया जाना चाहिए।

अदालत ने कहा कि दंड व्यवस्था का उद्देश्य केवल अपराध के लिए सजा देना नहीं, बल्कि जहां संभव हो वहां व्यक्ति के सुधार और समाज में उसके पुनर्वास की संभावना को भी ध्यान में रखना है। इसी दृष्टिकोण के आधार पर हाईकोर्ट ने मोती उर्फ मोहित की समयपूर्व रिहाई से संबंधित याचिका पर फैसला सुनाया।

Court

2004 के हत्या-डकैती मामले में हुई थी गिरफ्तारी

मामला वर्ष 2004 के डिफेंस कॉलोनी थाना क्षेत्र से जुड़ा है। उपलब्ध विवरण के मुताबिक मोती को दो लोगों की हत्या और लूट से संबंधित मामले में दोषी ठहराया गया था। ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 2010 में उसे उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसके बाद उसकी दोषसिद्धि और सजा को दिल्ली हाईकोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट से भी मंजूरी मिली और मामला अंतिम रूप ले चुका था।

सजा के बाद मोती ने लंबे समय तक जेल में रहकर अपनी सजा पूरी की। जब समयपूर्व रिहाई के लिए उसका मामला Sentence Review Board यानी सजा समीक्षा बोर्ड (SRB) के सामने पहुंचा, तब तक वह 20 वर्ष से अधिक वास्तविक कारावास भुगत चुका था। रिमिशन यानी सजा में मिलने वाली छूट को जोड़ने पर उसकी हिरासत की कुल अवधि 24 वर्ष से भी अधिक बताई गई।

इसके बावजूद उसकी समयपूर्व रिहाई की मांग को कई बार अस्वीकार किया गया। इसी निर्णय को चुनौती देते हुए उसने दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

पांचवीं बार याचिका खारिज होने के बाद हाईकोर्ट पहुंचा मामला

मोती की समयपूर्व रिहाई की मांग पहले भी कई अवसरों पर ठुकराई जा चुकी थी। उपलब्ध जानकारी के अनुसार वर्ष 2021, 2023, फरवरी 2024 और दिसंबर 2024 में उसके अनुरोध पर प्रतिकूल निर्णय लिया गया। इसके बाद मामले में न्यायिक हस्तक्षेप हुआ।

25 जुलाई 2025 को हाईकोर्ट की एक समन्वय पीठ ने पहले के निर्णय को अलग रखते हुए SRB को निर्देश दिया था कि वह समयपूर्व रिहाई के संबंध में लागू दिशानिर्देशों के अनुरूप मामले पर दोबारा विचार करे। इसके बाद भी जब राहत नहीं मिली तो मोती ने फिर हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

इस बार अदालत ने पूरे मामले को केवल अपराध की गंभीरता के आधार पर नहीं देखा, बल्कि यह भी विचार किया कि इतने लंबे समय तक जेल में रहने के बाद किसी कैदी के सुधार और भविष्य की संभावनाओं का मूल्यांकन किस तरह किया जाना चाहिए।

“हर अंधेरे में रोशनी की उम्मीद होती है”

न्यायमूर्ति गिरिश कठपालिया ने फैसले में सुधारात्मक न्याय की अवधारणा पर विशेष जोर दिया। अदालत ने टिप्पणी की कि अंधकार के भीतर भी प्रकाश की संभावना होती है और प्रकाश के भीतर भी अतीत की छाया मौजूद रहती है। इसी क्रम को अदालत ने सुधारात्मक दंड व्यवस्था का रास्ता बताया।

इस टिप्पणी का मूल संदेश यह था कि अपराध के बाद दी गई सजा महत्वपूर्ण है, लेकिन सजा की अवधि पूरी होने के साथ सुधार और पुनर्वास की संभावना को भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

अदालत ने यह भी कहा कि हर गलत काम के लिए परिणाम होना जरूरी है, लेकिन हर परिणाम की भी एक सीमा होनी चाहिए, अन्यथा वह स्वयं अन्याय का रूप ले सकता है। इस विचार ने मामले में अदालत के अंतिम निर्णय की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

ऑस्कर वाइल्ड की पंक्ति का किया उल्लेख

फैसले की सबसे चर्चित बातों में से एक प्रसिद्ध लेखक ऑस्कर वाइल्ड की पंक्ति का अदालत द्वारा उल्लेख किया जाना रहा। अदालत ने इस विचार के जरिए यह समझाने की कोशिश की कि किसी व्यक्ति के अतीत में हुई गलती को उसके पूरे भविष्य का अंतिम परिचय नहीं बनाया जा सकता।

अदालत का दृष्टिकोण यह था कि कानून अपराध को गंभीरता से देखता है, लेकिन न्याय का उद्देश्य केवल प्रतिशोध नहीं होना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति लंबी अवधि तक सजा भुगत चुका है और सुधार की प्रक्रिया से गुजर चुका है, तो कानून के तहत उपलब्ध रिहाई के प्रावधानों पर निष्पक्ष और वास्तविक तरीके से विचार किया जाना चाहिए।

प्रशासनिक स्तर पर बार-बार अस्वीकृति पर सवाल

हाईकोर्ट ने पाया कि मोती की समयपूर्व रिहाई की मांग को कई बार खारिज किया गया था। अदालत ने इस बात पर भी गौर किया कि उसके अनुरोधों को यांत्रिक तरीके से अस्वीकार किया गया, जबकि समयपूर्व रिहाई के मामले में संबंधित दिशानिर्देशों और परिस्थितियों का उचित मूल्यांकन किया जाना चाहिए।

अदालत के सामने सवाल केवल यह नहीं था कि अपराध कितना गंभीर था। सवाल यह भी था कि दोषी व्यक्ति ने कितनी सजा काट ली है, उसके मामले में रिहाई पर विचार करने के लिए लागू नियम क्या कहते हैं और क्या संबंधित प्राधिकरण ने इन सभी पहलुओं का स्वतंत्र एवं उचित मूल्यांकन किया है।

यही वजह रही कि हाईकोर्ट ने प्रशासनिक निर्णय की प्रक्रिया पर भी ध्यान केंद्रित किया।

सुधारात्मक न्याय व्यवस्था पर जोर

भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में सजा के साथ सुधार और पुनर्वास की अवधारणा भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। जेल का उद्देश्य केवल किसी व्यक्ति को समाज से अलग रखना नहीं, बल्कि कानून के अनुसार उसे सुधार का अवसर देना भी हो सकता है।

इस मामले में हाईकोर्ट का फैसला इसी व्यापक सिद्धांत को सामने लाता है। अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया कि लंबे समय तक कारावास भुगत चुके व्यक्ति के मामले में समयपूर्व रिहाई की प्रक्रिया को केवल पुराने अपराध के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता। संबंधित अधिकारियों को नियमों, व्यक्ति के कारावास की अवधि और अन्य प्रासंगिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर निर्णय लेना चाहिए।

तत्काल रिहाई का आदेश

सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने मोती की तत्काल रिहाई का आदेश दिया। यह आदेश उसकी दोषसिद्धि को समाप्त करने वाला फैसला नहीं है। उसे जिस अपराध में दोषी ठहराया गया था, उसकी सजा और दोषसिद्धि पहले ही न्यायिक स्तर पर अंतिम रूप प्राप्त कर चुकी थी। अदालत का वर्तमान आदेश मुख्य रूप से उसकी समयपूर्व रिहाई के प्रश्न से संबंधित था।

फैसले से यह स्पष्ट होता है कि न्यायालय ने अपराध की गंभीरता के साथ-साथ सजा भुगतने की लंबी अवधि और सुधारात्मक न्याय के सिद्धांत को भी महत्व दिया।

फैसले का व्यापक संदेश

दिल्ली हाईकोर्ट का यह फैसला न्याय व्यवस्था में दंड और सुधार के संतुलन की चर्चा को एक बार फिर सामने लाता है। अदालत की टिप्पणियां इस बात पर जोर देती हैं कि कानून व्यक्ति को उसके अपराध के लिए जवाबदेह ठहराता है, लेकिन न्याय व्यवस्था में उसके सुधार और भविष्य की संभावना के लिए भी जगह होनी चाहिए।

इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि किसी व्यक्ति का अतीत चाहे कितना भी कठिन क्यों न रहा हो, कानून के दायरे में उसके भविष्य पर विचार करने की संभावना पूरी तरह खत्म नहीं हो जाती। लंबे कारावास के बाद समयपूर्व रिहाई के मामलों में संबंधित अधिकारियों को नियमों और वास्तविक परिस्थितियों का निष्पक्ष मूल्यांकन करना चाहिए।

इस तरह मोती की रिहाई का आदेश केवल एक कैदी से जुड़ा व्यक्तिगत फैसला नहीं है, बल्कि यह सुधारात्मक न्याय, समयपूर्व रिहाई और दंड की सीमा को लेकर अदालत की सोच को भी सामने रखता है। हाईकोर्ट की टिप्पणियां इस व्यापक सिद्धांत को रेखांकित करती हैं कि न्याय का उद्देश्य केवल अतीत की गलती का हिसाब लेना नहीं, बल्कि कानून के अनुरूप भविष्य की संभावनाओं पर भी विचार करना है।

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