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जैव प्रौद्योगिकी और AI आधारित अगली औद्योगिक क्रांति में भारत की निर्णायक भूमिका, उभरती तकनीकों में वैश्विक नेतृत्व की ओर बढ़ता देश

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नई दिल्ली। दुनिया तेजी से ऐसी तकनीकी व्यवस्था की ओर बढ़ रही है, जहां अगली औद्योगिक क्रांति का आधार केवल मशीनों, कारखानों और पारंपरिक उत्पादन तक सीमित नहीं रहेगा। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), जैव प्रौद्योगिकी, क्वांटम तकनीक, अंतरिक्ष विज्ञान और उन्नत डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर मिलकर अर्थव्यवस्था और समाज के अगले चरण को आकार देंगे। इसी बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत अपनी वैज्ञानिक और तकनीकी क्षमता को मजबूत करते हुए महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने भी भारत की इस बदलती भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा है कि देश अब केवल तकनीक का उपयोग करने वाला नहीं, बल्कि उभरती तकनीकों के विकास और नवाचार में महत्वपूर्ण भागीदार बन रहा है। हालिया सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था करीब 8-9 अरब डॉलर के स्तर पर है और अगले दशक में इसके लगभग 40-45 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है।

अगली औद्योगिक क्रांति का केंद्र बनेगी जैव प्रौद्योगिकी

बीते दशकों में सूचना प्रौद्योगिकी ने दुनिया की अर्थव्यवस्था को बदल दिया। अब जैव प्रौद्योगिकी को अगली बड़ी तकनीकी क्रांति के प्रमुख आधारों में गिना जा रहा है। इसका प्रभाव स्वास्थ्य, कृषि, खाद्य उत्पादन, पर्यावरण, ऊर्जा और औद्योगिक विनिर्माण जैसे क्षेत्रों पर पड़ सकता है।

भारत ने इस क्षेत्र को नीति स्तर पर मजबूत आधार देने के लिए BioE3 यानी Biotechnology for Economy, Environment and Employment Policy को मंजूरी दी है। इस नीति का उद्देश्य उच्च प्रदर्शन वाले बायोमैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देना और प्रयोगशाला में विकसित तकनीकों को बड़े पैमाने पर औद्योगिक उत्पादन तक पहुंचाना है।

BioE3 के तहत Biomanufacturing Hubs, Bio-AI Hubs और Biofoundries जैसे ढांचे विकसित करने पर जोर दिया गया है। इसके प्रमुख क्षेत्रों में जैव-आधारित रसायन और एंजाइम, स्मार्ट प्रोटीन एवं फंक्शनल फूड, प्रिसिजन बायोथेराप्यूटिक्स, जलवायु-अनुकूल कृषि, कार्बन कैप्चर और उपयोग तथा समुद्री एवं अंतरिक्ष अनुसंधान शामिल हैं।

इसका अर्थ यह है कि भविष्य में जैव प्रौद्योगिकी केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित विषय नहीं होगी, बल्कि उत्पादन और रोजगार का बड़ा आधार बन सकती है।

AI और बायोटेक का संगम बदलेगा विज्ञान का स्वरूप

AI और जैव प्रौद्योगिकी का मेल इस परिवर्तन को और तेज कर सकता है। बड़ी मात्रा में जैविक डेटा का विश्लेषण, नए अणुओं की पहचान, दवा अनुसंधान, जीनोमिक्स और कृषि अनुसंधान जैसे क्षेत्रों में AI वैज्ञानिकों की क्षमता को बढ़ा सकता है।

भारत ने AI के लिए भी राष्ट्रीय स्तर पर एक व्यापक ढांचा तैयार किया है। मार्च 2024 में IndiaAI Mission को ₹10,371.92 करोड़ के बजटीय परिव्यय के साथ मंजूरी दी गई थी। इसका उद्देश्य कंप्यूटिंग क्षमता, डेटा, AI मॉडल, स्टार्टअप, कौशल विकास और सुरक्षित एवं भरोसेमंद AI के लिए व्यापक पारिस्थितिकी तंत्र तैयार करना है।

सरकार के अनुसार IndiaAI Mission के तहत कंप्यूटिंग क्षमता को भी तेजी से बढ़ाया गया है। इससे शोधकर्ताओं, स्टार्टअप और उद्योगों को AI आधारित नवाचार के लिए आवश्यक संसाधनों तक बेहतर पहुंच मिल सकती है।

क्वांटम तकनीक में भी भारत की बड़ी तैयारी

AI और बायोटेक के साथ-साथ क्वांटम तकनीक को भविष्य की रणनीतिक तकनीकों में शामिल किया जा रहा है। भारत ने इसके लिए National Quantum Mission की शुरुआत की है। इस मिशन को 2023-24 से 2030-31 की अवधि के लिए ₹6,003.65 करोड़ के कुल परिव्यय के साथ मंजूरी दी गई है।

मिशन के तहत क्वांटम कंप्यूटिंग, क्वांटम कम्युनिकेशन, क्वांटम सेंसिंग एवं मेट्रोलॉजी तथा क्वांटम मैटेरियल्स और डिवाइसेज पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है।

क्वांटम कंप्यूटिंग भविष्य में ऐसे जटिल वैज्ञानिक और औद्योगिक सवालों को हल करने में उपयोगी हो सकती है, जिन्हें पारंपरिक कंप्यूटिंग प्रणालियों के लिए अत्यधिक कठिन माना जाता है। स्वास्थ्य, वित्त, संचार, सुरक्षा और वैज्ञानिक अनुसंधान जैसे क्षेत्रों में इसके संभावित अनुप्रयोग व्यापक हैं।

अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था भारत की नई ताकत

भारत की तकनीकी क्षमता का एक और महत्वपूर्ण स्तंभ अंतरिक्ष क्षेत्र है। पिछले वर्षों में भारत ने सरकारी अंतरिक्ष कार्यक्रम के साथ-साथ निजी कंपनियों और स्टार्टअप के लिए भी अंतरिक्ष क्षेत्र को खोलने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था वर्तमान में करीब 8-9 अरब डॉलर की है और अगले दशक में इसके 40-45 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। इस वृद्धि में निजी भागीदारी, अंतरिक्ष स्टार्टअप, उपग्रह सेवाएं, प्रक्षेपण क्षमता और नए अंतरिक्ष अनुप्रयोगों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।

अंतरिक्ष तकनीक का लाभ केवल उपग्रह प्रक्षेपण तक सीमित नहीं है। मौसम पूर्वानुमान, कृषि निगरानी, आपदा प्रबंधन, संचार, नेविगेशन और राष्ट्रीय विकास की अनेक गतिविधियां अंतरिक्ष आधारित तकनीकों से जुड़ रही हैं।

विज्ञान से सीधे अर्थव्यवस्था तक पहुंचने की कोशिश

भारत के लिए सबसे बड़ा अवसर यह है कि वैज्ञानिक अनुसंधान को उद्योग और बाजार से जोड़ा जाए। केवल शोधपत्र या प्रयोगशाला की उपलब्धि पर्याप्त नहीं होगी। किसी तकनीक को वास्तविक आर्थिक और सामाजिक प्रभाव पैदा करने के लिए उसे उत्पाद, सेवा और बड़े पैमाने के समाधान में बदलना जरूरी होगा।

यही कारण है कि भारत में स्टार्टअप, उद्योग, विश्वविद्यालयों और सरकारी संस्थानों के बीच सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। हाल के वर्षों में देश के बायोटेक स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र में भी उल्लेखनीय विस्तार हुआ है। सरकार ने 2014 के बाद 11,000 से अधिक बायोटेक स्टार्टअप का उल्लेख किया है।

यह बदलाव बताता है कि भारत में विज्ञान और उद्यमिता के बीच संबंध पहले की तुलना में अधिक मजबूत हो रहा है।

स्वास्थ्य से कृषि तक AI का विस्तार

AI आधारित तकनीक का प्रभाव स्वास्थ्य और कृषि जैसे क्षेत्रों में भी दिखाई दे सकता है। स्वास्थ्य क्षेत्र में AI और जीनोमिक्स के संयोजन से बीमारी की पहचान, व्यक्तिगत उपचार और अनुसंधान की गति बढ़ाने की संभावनाएं हैं। सरकार ने भी जीनोमिक्स, AI और उन्नत जैव प्रौद्योगिकी को व्यक्तिगत एवं प्रिसिजन मेडिसिन के उभरते क्षेत्र से जोड़ा है।

कृषि में AI का उपयोग मौसम संबंधी जानकारी, फसल निगरानी, संसाधन प्रबंधन और किसानों को बेहतर निर्णय लेने में सहायता देने के लिए किया जा सकता है। सरकार ने कृषि क्षेत्र में AI और अंतरिक्ष तकनीक के उपयोग की संभावनाओं पर भी जोर दिया है।

सबसे बड़ी चुनौती होगी प्रतिभा और अनुसंधान

भारत के सामने अवसर जितने बड़े हैं, चुनौतियां भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। अत्याधुनिक तकनीक के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व के लिए केवल सरकारी योजनाएं पर्याप्त नहीं होंगी। उच्च गुणवत्ता वाले वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, डेटा विशेषज्ञों, जैव प्रौद्योगिकी विशेषज्ञों और उद्यमियों की बड़ी संख्या तैयार करनी होगी।

इसके साथ ही विश्वविद्यालयों में अत्याधुनिक शोध सुविधाओं, उद्योग-अकादमिक साझेदारी, निजी क्षेत्र के R&D निवेश और स्टार्टअप के लिए जोखिम पूंजी को मजबूत करना होगा।

हाल ही में भारत में इंजीनियरिंग बायोलॉजी से संबंधित शिक्षा और कौशल विकास की दिशा में भी कदम उठाए गए हैं, जो भविष्य की जैव प्रौद्योगिकी आधारित अर्थव्यवस्था के लिए मानव संसाधन तैयार करने की कोशिश का हिस्सा है।

भारत के लिए बड़ा अवसर

अगली औद्योगिक क्रांति भारत के लिए केवल तकनीकी प्रतिस्पर्धा का विषय नहीं है, बल्कि रोजगार, विनिर्माण, स्वास्थ्य, कृषि और आर्थिक विकास को नई दिशा देने का अवसर भी है।

यदि AI की कंप्यूटिंग क्षमता, जैव प्रौद्योगिकी की वैज्ञानिक शक्ति, क्वांटम तकनीक की संभावनाओं और अंतरिक्ष क्षेत्र की क्षमताओं को एक-दूसरे से जोड़ा जाता है, तो भारत एक ऐसा व्यापक तकनीकी पारिस्थितिकी तंत्र विकसित कर सकता है जिसमें अनुसंधान से लेकर उत्पादन और वैश्विक बाजार तक की पूरी श्रृंखला देश के भीतर मजबूत हो।

भारत के लिए असली लक्ष्य केवल यह नहीं होना चाहिए कि वह दुनिया की नई तकनीकों का सबसे बड़ा बाजार बने। लक्ष्य यह होना चाहिए कि वह नई तकनीकों का निर्माता, शोधकर्ता, उत्पादक और निर्यातक भी बने।

इसी दिशा में BioE3, IndiaAI Mission और National Quantum Mission जैसी पहलें महत्वपूर्ण आधार तैयार करती हैं।

निष्कर्ष

दुनिया की अगली औद्योगिक क्रांति अब केवल कारखानों की क्षमता से नहीं, बल्कि डेटा, AI, जैव विज्ञान, क्वांटम तकनीक और अंतरिक्ष विज्ञान की संयुक्त शक्ति से तय होगी। भारत ने इन क्षेत्रों में नीतिगत और संस्थागत स्तर पर कई महत्वपूर्ण पहल शुरू की हैं।

अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का विस्तार, बायोटेक स्टार्टअप का बढ़ता आधार, BioE3 जैसी नीति, IndiaAI Mission और National Quantum Mission भारत को उभरती तकनीकी अर्थव्यवस्था में मजबूत स्थान दिलाने की क्षमता रखते हैं।

आने वाले वर्षों में भारत की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह इन पहलों को कितनी तेजी से शोध, कौशल, स्टार्टअप, उद्योग और वैश्विक बाजार से जोड़ पाता है। यदि यह तालमेल मजबूत होता है, तो भारत तकनीकी क्रांति का केवल दर्शक नहीं रहेगा, बल्कि उसके निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाने वाले देशों में शामिल हो सकता है।

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