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CSR की बदलती तस्वीर: खर्च से आगे बढ़कर सामाजिक प्रभाव और स्थायी विकास पर जोर

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नई दिल्ली। कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व यानी CSR (Corporate Social Responsibility) को लेकर भारत में सोच तेजी से बदल रही है। अब CSR को केवल कंपनियों द्वारा सामाजिक कार्यों के लिए राशि खर्च करने की प्रक्रिया के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसका उद्देश्य समाज और समुदायों के जीवन में वास्तविक, दीर्घकालिक तथा मापने योग्य बदलाव लाना बनता जा रहा है। इसी बदलती सोच को रेखांकित करते हुए इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ कॉर्पोरेट अफेयर्स (IICA) द्वारा आयोजित सर्टिफाइड CSR प्रोफेशनल प्रोग्राम के 11वें बैच का उद्घाटन सत्र आयोजित किया गया।

21 अगस्त 2026 को आयोजित यह कार्यक्रम वर्चुअल माध्यम से हुआ। इसमें सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों, निजी कॉरपोरेट संस्थानों, सरकारी संगठनों, शिक्षण संस्थानों और नागरिक समाज से जुड़े कुल 45 पेशेवरों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम का उद्देश्य CSR क्षेत्र में काम करने वाले और इससे जुड़े पेशेवरों को आधुनिक दृष्टिकोण, प्रभाव आधारित कार्यप्रणाली और बेहतर क्रियान्वयन की दिशा में तैयार करना था।

CSR को खर्च नहीं, प्रभाव के नजरिए से देखने की जरूरत

कार्यक्रम में IICA के महानिदेशक एवं सीईओ ज्ञानेश्वर कुमार सिंह ने CSR की मौजूदा भूमिका पर विस्तार से विचार रखा। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि किसी कंपनी के CSR प्रयासों की सफलता केवल इस आधार पर तय नहीं की जानी चाहिए कि उसने कितनी राशि खर्च की। असली सवाल यह होना चाहिए कि उस निवेश से समाज को कितना लाभ मिला और लोगों के जीवन में किस प्रकार का सकारात्मक परिवर्तन आया।

उनके अनुसार CSR को प्रभाव, परिणाम और सामाजिक मूल्यवर्धन से जोड़ने की आवश्यकता है। यदि किसी परियोजना पर बड़ी राशि खर्च होती है, लेकिन उसका लाभ लंबे समय तक समुदाय तक नहीं पहुंचता, तो केवल खर्च का आंकड़ा उस पहल की सफलता साबित नहीं करता।

भारत में CSR गतिविधियों के बढ़ते आर्थिक पैमाने का अंदाजा उपलब्ध आंकड़ों से लगाया जा सकता है। वित्त वर्ष 2023-24 में कंपनियों ने CSR गतिविधियों पर ₹34,908.75 करोड़ खर्च किए। वहीं वित्त वर्ष 2019-20 से 2023-24 के बीच कंपनियों का कुल CSR खर्च ₹1.44 लाख करोड़ से अधिक रहा। यह आंकड़ा बताता है कि CSR भारतीय कॉरपोरेट क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण सामाजिक निवेश के रूप में स्थापित हो चुका है।

नए और कम चर्चित क्षेत्रों पर भी ध्यान देने की अपील

कार्यक्रम में CSR के पारंपरिक क्षेत्रों के साथ-साथ उन क्षेत्रों को भी प्राथमिकता देने की जरूरत बताई गई, जिन पर अपेक्षाकृत कम ध्यान जाता है। इनमें महिला सशक्तिकरण, नवाचार तथा कला एवं संस्कृति जैसे क्षेत्र शामिल हैं।

महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में CSR के माध्यम से शिक्षा, कौशल विकास, रोजगार के अवसर और उद्यमिता को बढ़ावा दिया जा सकता है। इसी प्रकार नवाचार आधारित परियोजनाएं स्थानीय समस्याओं के नए समाधान खोजने में मददगार हो सकती हैं। कला और संस्कृति के संरक्षण के माध्यम से देश की विविध सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का काम भी किया जा सकता है।

इस तरह CSR का दायरा केवल स्कूल, अस्पताल या बुनियादी सुविधाओं तक सीमित न रहकर समाज के व्यापक विकास से जुड़ सकता है।

समुदाय की जरूरतों को समझना सबसे पहला कदम

कार्यक्रम में कोयला मंत्रालय की अपर सचिव रुपिंदर बरार ने CSR परियोजनाओं की सफलता के लिए समुदाय की वास्तविक जरूरतों को समझने पर जोर दिया। उनका दृष्टिकोण यह है कि किसी क्षेत्र में CSR परियोजना शुरू करने से पहले वहां रहने वाले लोगों की समस्याओं और प्राथमिकताओं को समझना जरूरी है।

कई बार ऐसी योजनाएं तैयार कर दी जाती हैं जो कागज पर अच्छी दिखाई देती हैं, लेकिन स्थानीय परिस्थितियों से उनका पर्याप्त संबंध नहीं होता। परिणामस्वरूप परियोजना का अपेक्षित सामाजिक प्रभाव सामने नहीं आ पाता।

इसलिए CSR के प्रभावी मॉडल में समुदाय से संवाद, स्थानीय जरूरतों का आकलन और निरंतर निगरानी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लोगों की भागीदारी से तैयार परियोजनाओं के लंबे समय तक सफल रहने की संभावना भी बढ़ती है।

मजबूत कार्यान्वयन एजेंसियां बनेंगी सफलता की आधारशिला

CSR के लिए बजट उपलब्ध होना पर्याप्त नहीं है। धन का सही इस्तेमाल, उपयुक्त परियोजना का चयन और उसे जमीन पर प्रभावी ढंग से लागू करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इसी संदर्भ में कार्यक्रम के दौरान सक्षम इम्प्लीमेंटिंग एजेंसियों की भूमिका को प्रमुखता दी गई।

जमीनी स्तर पर काम करने वाली संस्थाओं के पास स्थानीय परिस्थितियों की समझ, मानव संसाधन और परियोजनाओं को संचालित करने की क्षमता होना जरूरी है। यदि कार्यान्वयन संस्था कमजोर है, तो अच्छी योजना और पर्याप्त वित्तीय संसाधन होने के बावजूद अपेक्षित परिणाम हासिल करना मुश्किल हो सकता है।

इसलिए CSR क्षेत्र में संस्थागत क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ कार्यान्वयन एजेंसियों के प्रशिक्षण, मूल्यांकन और निगरानी की व्यवस्था मजबूत करना जरूरी है।

तकनीक और डेटा से बढ़ सकती है पारदर्शिता

आधुनिक CSR व्यवस्था में तकनीक की भूमिका लगातार बढ़ रही है। डिजिटल प्लेटफॉर्म, डेटा आधारित निगरानी और ऑनलाइन रिपोर्टिंग के जरिए परियोजनाओं की प्रगति को अधिक व्यवस्थित तरीके से देखा जा सकता है।

कार्यक्रम में पारदर्शिता को CSR की विश्वसनीयता का महत्वपूर्ण आधार बताया गया। तकनीक और डेटा का इस्तेमाल यह समझने में मदद कर सकता है कि किसी परियोजना के लिए कितनी राशि निर्धारित हुई, उसका इस्तेमाल किस प्रकार हुआ और उसका वास्तविक परिणाम क्या रहा।

CSR Exchange Portal जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म भी CSR से जुड़े हितधारकों के बीच बेहतर समन्वय और पारदर्शिता को बढ़ावा देने में उपयोगी हो सकते हैं। आने वाले समय में डेटा आधारित निर्णय लेने की क्षमता CSR कार्यक्रमों को अधिक प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

सार्वजनिक क्षेत्र के CSR से बन सकता है व्यापक मॉडल

सार्वजनिक उद्यम विभाग के संयुक्त सचिव लुकास एल. कामसुआन ने सार्वजनिक क्षेत्र के CSR की संभावनाओं पर जोर दिया। सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां बड़े पैमाने पर सामाजिक और विकासात्मक परियोजनाओं को संचालित करने की क्षमता रखती हैं। उनके अनुभवों और मॉडल का इस्तेमाल CSR के व्यापक इकोसिस्टम को मजबूत करने के लिए किया जा सकता है।

सार्वजनिक क्षेत्र की संस्थाओं के पास देश के विभिन्न हिस्सों में काम करने का अनुभव और संसाधन मौजूद हैं। यदि इन प्रयासों को बेहतर योजना, पारदर्शिता और प्रभाव मूल्यांकन से जोड़ा जाए तो CSR को सामाजिक विकास के लिए अधिक प्रभावी साधन बनाया जा सकता है।

प्रशिक्षित CSR पेशेवरों की बढ़ेगी मांग

CSR का स्वरूप जितना जटिल और प्रभाव आधारित होता जा रहा है, उतनी ही आवश्यकता ऐसे पेशेवरों की महसूस हो रही है जो सामाजिक क्षेत्र और कॉरपोरेट प्रबंधन दोनों को समझते हों।

इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए सर्टिफाइड CSR प्रोफेशनल प्रोग्राम जैसे प्रशिक्षण कार्यक्रम महत्वपूर्ण हो जाते हैं। ऐसे पाठ्यक्रमों के माध्यम से पेशेवरों को CSR रणनीति तैयार करने, परियोजनाओं की निगरानी, हितधारकों के साथ संवाद, प्रभाव मूल्यांकन और पारदर्शिता जैसे विषयों की व्यावहारिक समझ दी जा सकती है।

एक मजबूत और प्रशिक्षित CSR कार्यबल कंपनियों को केवल अनुदान आधारित गतिविधियों से आगे बढ़ाकर परिणाम आधारित सामाजिक निवेश की दिशा में ले जा सकता है।

आने वाले समय में CSR की दिशा

भारत में CSR का अगला चरण केवल अधिक धन खर्च करने का नहीं, बल्कि सही स्थान पर, सही उद्देश्य के लिए और मापने योग्य परिणामों के साथ निवेश करने का हो सकता है। कंपनियों के सामने अब यह चुनौती है कि वे अपनी CSR योजनाओं को स्थानीय जरूरतों, सतत विकास और सामाजिक प्रभाव से कैसे जोड़ती हैं।

महिला सशक्तिकरण, शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल विकास, नवाचार, पर्यावरण संरक्षण और संस्कृति जैसे क्षेत्रों में CSR की भूमिका आने वाले वर्षों में और महत्वपूर्ण हो सकती है। इसके साथ ही तकनीक और डेटा के बढ़ते इस्तेमाल से CSR परियोजनाओं के परिणामों का अधिक सटीक मूल्यांकन संभव होगा।

निष्कर्ष

IICA के सर्टिफाइड CSR प्रोफेशनल प्रोग्राम के 11वें बैच का उद्घाटन सत्र इस बात का संकेत देता है कि भारत में कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व की अवधारणा एक नए चरण में प्रवेश कर रही है। अब CSR को केवल राशि खर्च करने की गतिविधि के बजाय समुदायों के जीवन में स्थायी परिवर्तन लाने वाले माध्यम के रूप में देखने पर जोर बढ़ रहा है।

CSR की सफलता के लिए समुदाय की वास्तविक जरूरतों की पहचान, सक्षम कार्यान्वयन एजेंसियां, तकनीक आधारित निगरानी, पारदर्शिता और प्रशिक्षित पेशेवर महत्वपूर्ण होंगे। यदि कॉरपोरेट क्षेत्र अपने सामाजिक निवेश को दीर्घकालिक प्रभाव से जोड़ने में सफल रहता है, तो CSR भारत के समावेशी और सतत विकास में एक महत्वपूर्ण भागीदार बन सकता है।

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