
ईरान और अमेरिका के बीच लंबे समय से जारी तनाव एक बार फिर गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है। जून 2026 में दोनों देशों के बीच हुए समझौते के तहत तय की गई 60 दिन की अवधि 17 अगस्त को समाप्त हो गई। इस दौरान स्थायी शांति समझौते की उम्मीदें जरूर बनी थीं, लेकिन प्रमुख मुद्दों पर सहमति नहीं बन सकी। अब दोनों पक्ष एक-दूसरे पर समझौते की शर्तों का पालन न करने का आरोप लगा रहे हैं।
मामले को और संवेदनशील बना रहा है रणनीतिक हॉर्मुज जलडमरूमध्य, जिसके जरिए वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। ईरान और ओमान के बीच समुद्री यातायात के लिए नए रास्ते पर चर्चा की खबरों के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जलडमरूमध्य को लेकर बेहद कड़ा रुख अपनाया है। इससे क्षेत्रीय तनाव के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय व्यापार और ऊर्जा बाजारों पर भी चिंता बढ़ी है।
60 दिन की समयसीमा समाप्त
जून में हुए समझौते का उद्देश्य अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य टकराव को रोकना और आगे की बातचीत के लिए वातावरण तैयार करना था। समझौते में ईरान के परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों, समुद्री यातायात और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर आगे बढ़ने की कोशिश की गई थी।
लेकिन 17 अगस्त को समयसीमा समाप्त होने तक कोई व्यापक अंतिम समझौता नहीं हो सका। अमेरिकी पक्ष का कहना है कि ईरान ने समझौते की अपेक्षित शर्तों को पूरी तरह लागू नहीं किया, जबकि तेहरान की ओर से अमेरिका पर नाकेबंदी और अन्य प्रतिबंधों को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
इस स्थिति ने उस उम्मीद को कमजोर कर दिया है कि जून का समझौता स्थायी शांति की दिशा में निर्णायक कदम साबित होगा।
हॉर्मुज बना सबसे बड़ा विवाद
वर्तमान संकट का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र हॉर्मुज जलडमरूमध्य है। फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी को जोड़ने वाला यह समुद्री मार्ग वैश्विक ऊर्जा व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यहां यातायात में किसी भी बड़ी बाधा का असर तेल की कीमतों, परिवहन लागत और दुनिया के कई देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ सकता है।
ईरान और ओमान ने समुद्री यातायात के लिए एक नए मार्ग संबंधी व्यवस्था पर सहमति की जानकारी दी है। ईरानी अधिकारियों के अनुसार दोनों देशों के बीच जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही को लेकर बातचीत हुई है।
दूसरी ओर, ट्रंप ने हॉर्मुज को लेकर अमेरिका के प्रभाव को मजबूत करने की बात कही है। रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने यहां तक संकेत दिया कि अमेरिका जलडमरूमध्य पर अपना नियंत्रण स्थापित करने के विकल्प पर विचार कर सकता है। इस बयान ने पहले से तनावपूर्ण माहौल को और गंभीर बना दिया है।
ओमान की भूमिका भी महत्वपूर्ण
ईरान और अमेरिका के बीच संवाद में ओमान की भूमिका लंबे समय से महत्वपूर्ण रही है। मस्कट दोनों पक्षों के बीच संपर्क और मध्यस्थता के लिए जाना जाता है। ऐसे समय में जब अमेरिका और ईरान के बीच सीधे संवाद की स्थिति कमजोर दिखाई दे रही है, ओमान जैसे मध्यस्थ देश की भूमिका और बढ़ सकती है।
हालांकि 17 अगस्त को ट्रंप की ओर से ओमान को लेकर दी गई कड़ी चेतावनी ने स्थिति को असामान्य रूप से संवेदनशील बना दिया। इससे आशंका बढ़ी है कि यदि कूटनीतिक प्रयासों के बजाय बयानबाजी और दबाव की नीति आगे बढ़ती है तो क्षेत्रीय तनाव और गहरा सकता है।
स्थायी शांति का रास्ता क्यों कठिन?
ईरान-अमेरिका विवाद केवल युद्धविराम तक सीमित नहीं है। दोनों देशों के बीच कई दशकों से परमाणु कार्यक्रम, आर्थिक प्रतिबंध, क्षेत्रीय प्रभाव और सुरक्षा नीति को लेकर मतभेद रहे हैं।
ईरान की प्रमुख मांगों में प्रतिबंधों में राहत, अमेरिकी सैन्य दबाव में कमी और युद्ध से संबंधित आर्थिक नुकसान की भरपाई जैसे मुद्दे शामिल हैं। दूसरी ओर अमेरिका ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय गतिविधियों को लेकर कठोर आश्वासन चाहता है।
यही कारण है कि युद्ध रोकना अपेक्षाकृत आसान होने के बावजूद स्थायी राजनीतिक समझौता करना कठिन साबित हो रहा है।
बातचीत के दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं
हालांकि 60 दिन की अवधि समाप्त हो गई है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि कूटनीति की सभी संभावनाएं खत्म हो गई हैं। रिपोर्टों में अमेरिका और ईरान के बीच पर्दे के पीछे संपर्क जारी रहने की बात सामने आई है। कुछ क्षेत्रीय देश भी दोनों पक्षों को बातचीत की मेज पर वापस लाने की कोशिश कर रहे हैं।
यही कूटनीतिक संपर्क भविष्य में किसी नए समझौते की आधारशिला बन सकते हैं। लेकिन इसके लिए दोनों देशों को अपने अधिकतम दबाव वाले रुख में कुछ नरमी लानी होगी।
गाजा और पश्चिम एशिया का व्यापक संकट
ईरान-अमेरिका तनाव को पश्चिम एशिया के व्यापक संकट से अलग करके देखना मुश्किल है। गाजा में संघर्ष, वेस्ट बैंक में जारी हिंसा और यमन से जुड़े सैन्य तनाव ने पूरे क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति को जटिल बना दिया है।
अमेरिकी स्तर पर गाजा को लेकर अलग-अलग कूटनीतिक प्रयास भी जारी हैं। इससे स्पष्ट है कि पश्चिम एशिया में एक संकट दूसरे संकट को प्रभावित कर रहा है। यदि ईरान और अमेरिका के बीच तनाव फिर सैन्य टकराव में बदलता है तो उसका असर पहले से अस्थिर क्षेत्र के अन्य हिस्सों पर भी पड़ सकता है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर
हॉर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति का असर केवल ईरान और अमेरिका तक सीमित नहीं रहेगा। समुद्री परिवहन बाधित होने की स्थिति में तेल और अन्य ऊर्जा संसाधनों की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कीमतों पर दबाव बढ़ने की संभावना रहती है।
पहले से ही संघर्ष के कारण जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों की संख्या सामान्य स्तर की तुलना में काफी कम हुई है। इससे ऊर्जा बाजार और वैश्विक व्यापार के लिए अनिश्चितता बढ़ी है।
भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देश भी पश्चिम एशिया की घटनाओं पर करीबी नजर रखते हैं, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में तेज वृद्धि का असर परिवहन लागत और महंगाई पर पड़ सकता है।
आगे क्या हो सकता है?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि 60 दिन की अवधि खत्म होने के बाद अमेरिका और ईरान किस दिशा में आगे बढ़ेंगे। एक संभावना यह है कि दोनों पक्ष दबाव बढ़ाने के बावजूद पर्दे के पीछे बातचीत जारी रखें और नया समझौता तैयार करें। दूसरी संभावना यह है कि हॉर्मुज और परमाणु कार्यक्रम जैसे मुद्दों पर मतभेद और गहरे हों।
क्षेत्रीय देशों की मध्यस्थता भी महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। ओमान समेत अन्य देश यदि दोनों पक्षों के बीच भरोसा बहाल करने में सफल होते हैं तो तनाव कम करने का रास्ता खुल सकता है।
फिलहाल स्थिति बेहद नाजुक है। जून का समझौता स्थायी शांति स्थापित करने में सफल नहीं हुआ है और 17 अगस्त की समयसीमा समाप्त हो चुकी है।
निष्कर्ष
ईरान और अमेरिका के बीच मौजूदा संकट केवल दो देशों का विवाद नहीं है। इसके केंद्र में परमाणु नीति, आर्थिक प्रतिबंध, क्षेत्रीय सुरक्षा और हॉर्मुज जलडमरूमध्य जैसे अंतरराष्ट्रीय महत्व के मुद्दे हैं। 60 दिन की समझौता अवधि समाप्त होने के बाद तनाव बढ़ा जरूर है, लेकिन कूटनीति की संभावनाएं अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं।
आने वाले दिनों में यह तय होगा कि दोनों देश टकराव को आगे बढ़ाते हैं या बातचीत के जरिए किसी नए समझौते की तलाश करते हैं। फिलहाल पूरी दुनिया की नजर हॉर्मुज जलडमरूमध्य और वाशिंगटन-तेहरान के अगले कदम पर टिकी है।
