महाराष्ट्र की आदिवासी आश्रमशालाओं से सामने आए विद्यार्थियों की मौत के आंकड़ों ने शिक्षा, स्वास्थ्य और छात्रावासों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है। हाल ही में आदिवासी विकास विभाग के आंकड़ों के हवाले से सामने आई जानकारी के अनुसार, राज्य में वर्ष 2024-25 और 2025-26 के दौरान सरकारी तथा अनुदानित आश्रमशालाओं से जुड़े 584 विद्यार्थियों की मौत हुई। इन मौतों के कारणों में गंभीर बीमारियां, दुर्घटनाएं, सर्पदंश, सिकल सेल जैसी स्वास्थ्य समस्याएं और अन्य कारण शामिल बताए गए हैं।
यह आंकड़ा ऐसे समय सामने आया है जब गढ़चिरौली जिले के एक आवासीय विद्यालय के छात्रावास में तीन आदिवासी छात्राओं की सर्पदंश से मौत की घटना ने पूरे राज्य में चिंता बढ़ा दी। इस घटना के बाद आश्रमशालाओं में बच्चों की सुरक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति पर नए सिरे से सवाल उठने लगे हैं।
584 मौतों का आंकड़ा क्यों बना चिंता का विषय?
आदिवासी बच्चों को शिक्षा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से महाराष्ट्र में बड़ी संख्या में आश्रमशालाएं संचालित की जाती हैं। इन संस्थानों में विद्यार्थी पढ़ाई के साथ-साथ आवासीय सुविधाओं का भी लाभ लेते हैं। आदिवासी विकास विभाग के अनुसार राज्य में करीब 500 सरकारी और 513 सरकारी सहायता प्राप्त आश्रमशालाएं हैं।
उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक दो वित्तीय वर्षों में सरकारी आश्रमशालाओं से जुड़े 384 और अनुदानित आश्रमशालाओं से जुड़े 200 विद्यार्थियों की मौत दर्ज की गई। वर्ष 2024-25 में सरकारी आश्रमशालाओं में 170 और 2025-26 में 214 मौतें दर्ज हुईं। अनुदानित संस्थानों में क्रमशः 81 और 119 मौतों की जानकारी दी गई है।
हालांकि, इन आंकड़ों की व्याख्या करते समय यह समझना भी जरूरी है कि सभी मौतें स्कूल या छात्रावास परिसर में नहीं हुईं। अधिकारियों के अनुसार सरकारी आश्रमशालाओं से जुड़े 348 विद्यार्थियों की मौत घर पर हुई, जबकि 36 मौतें स्कूल परिसर में दर्ज की गईं। अनुदानित आश्रमशालाओं में 170 मौतें घर पर और 30 स्कूल परिसर में हुईं।
इसलिए 584 का आंकड़ा सीधे तौर पर छात्रावासों में हुई मौतों की संख्या नहीं है। फिर भी यह संख्या आदिवासी विद्यार्थियों के स्वास्थ्य, पोषण, चिकित्सा सुविधा और सुरक्षा व्यवस्था की व्यापक समीक्षा की जरूरत जरूर दिखाती है।
बीमारी और दुर्घटनाएं बनीं बड़ी वजह
उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार गंभीर बीमारियां मौतों के प्रमुख कारणों में शामिल रही हैं। रिपोर्टों में कुल 273 मौतों को गंभीर बीमारी से जोड़ा गया है। इसके अलावा 228 मौतें दुर्घटनाओं के कारण दर्ज हुईं। सर्पदंश से 28 और अन्य कारणों से भी विद्यार्थियों की जान गई।
आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच पहले से ही एक महत्वपूर्ण चुनौती मानी जाती है। दूरदराज के इलाकों में रहने वाले परिवारों के बच्चों के लिए आश्रमशाला केवल विद्यालय नहीं, बल्कि रहने, भोजन और स्वास्थ्य देखभाल का भी महत्वपूर्ण केंद्र होती है। ऐसे में किसी गंभीर बीमारी की पहचान और समय पर उपचार की व्यवस्था बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
गढ़चिरौली की घटना ने बढ़ाई चिंता
गढ़चिरौली के जप्तलाई गांव स्थित एक सरकारी सहायता प्राप्त आदिवासी आवासीय विद्यालय के छात्रावास में 9 अगस्त की रात सर्पदंश की घटना सामने आई। इस घटना में तीन आदिवासी छात्राओं की मौत हुई और अन्य छात्राओं का उपचार कराया गया। इसके बाद आश्रमशालाओं की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर सवाल उठे।
घटना के बाद महाराष्ट्र सरकार की ओर से संबंधित आवासीय विद्यालय का लाइसेंस स्थायी रूप से रद्द करने का आदेश दिया गया। साथ ही राज्य की अन्य आश्रमशालाओं में सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा की बात भी सामने आई।
यह घटना बताती है कि दूरदराज के छात्रावासों में केवल भवन उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं है। वहां नियमित निरीक्षण, आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था, प्रशिक्षित कर्मचारियों और सुरक्षित आवासीय वातावरण की भी आवश्यकता होती है।
विक्रांत भूरिया ने उठाए गंभीर सवाल
आदिवासी कांग्रेस के अध्यक्ष विक्रांत भूरिया ने इस मुद्दे को लेकर सरकार पर तीखा हमला किया है। उनके द्वारा साझा किए गए वीडियो में आश्रमशालाओं में विद्यार्थियों की मौत के आंकड़ों को लेकर चिंता जताई गई है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि बड़ी संख्या में बच्चों की मौत हो रही है तो उनके परिवारों की पीड़ा और संस्थानों की व्यवस्था पर सरकार का ध्यान कितना है।
भूरिया ने बच्चों के पोषण और शुरुआती देखभाल से जुड़े आंगनवाड़ी केंद्रों की स्थिति पर भी सवाल उठाए। उनके अनुसार कई स्थानों पर लंबे समय से कर्मचारियों की कमी जैसी समस्याएं बनी हुई हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अलग-अलग स्थानों पर अलग हो सकती है, इसलिए संबंधित सरकारी रिकॉर्ड और स्थानीय जांच के आधार पर स्थिति का मूल्यांकन किया जाना आवश्यक है।
पोषण और स्वास्थ्य व्यवस्था भी अहम
आदिवासी क्षेत्रों में बच्चों की शिक्षा को केवल कक्षा और पाठ्यपुस्तकों तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। कई बच्चों के लिए आश्रमशाला ऐसी जगह होती है जहां उन्हें भोजन, रहने की सुविधा और बुनियादी स्वास्थ्य सहायता भी मिलती है।
यदि किसी बच्चे को नियमित पौष्टिक भोजन नहीं मिलता, बीमारी की समय पर पहचान नहीं होती या अस्पताल तक पहुंचने में अत्यधिक देरी होती है, तो सामान्य स्वास्थ्य समस्या भी गंभीर रूप ले सकती है। यही कारण है कि आश्रमशालाओं में स्वास्थ्य जांच, पौष्टिक भोजन, स्वच्छ पेयजल और साफ-सफाई को शिक्षा व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
केवल आंकड़े नहीं, हर संख्या के पीछे एक परिवार
584 का आंकड़ा केवल सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज एक संख्या नहीं है। प्रत्येक संख्या के पीछे एक परिवार, माता-पिता और एक ऐसा बच्चा है जिसकी शिक्षा और भविष्य को लेकर परिवार ने उम्मीदें बांधी होंगी।
विशेष रूप से दूरदराज और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए बच्चे की शिक्षा एक बड़ा सपना होती है। ऐसे में किसी विद्यार्थी की असमय मौत परिवार के लिए भावनात्मक और सामाजिक दोनों स्तरों पर गहरा आघात हो सकती है।
इसी वजह से हर मृत्यु की पारदर्शी जांच जरूरी है। यदि किसी मामले में लापरवाही सामने आती है तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए और यदि किसी बीमारी या दुर्घटना को रोका जा सकता था, तो भविष्य में ऐसी घटनाओं की रोकथाम के लिए स्पष्ट व्यवस्था बनाई जानी चाहिए।
सरकार के सामने क्या हैं बड़ी चुनौतियां?
महाराष्ट्र की आश्रमशालाओं में विद्यार्थियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कई स्तरों पर काम करने की जरूरत दिखाई देती है। सबसे पहले प्रत्येक छात्रावास की भवन सुरक्षा, बिजली, पानी, स्वच्छता और सोने की व्यवस्था की नियमित जांच होनी चाहिए।
दूसरा, दूरस्थ आश्रमशालाओं में प्राथमिक चिकित्सा और आपातकालीन परिवहन की व्यवस्था मजबूत करनी होगी। गंभीर बीमारी की स्थिति में अस्पताल तक पहुंचने में देरी किसी बच्चे के लिए जोखिम बढ़ा सकती है।
तीसरा, विद्यार्थियों की नियमित स्वास्थ्य जांच और पोषण संबंधी निगरानी को मजबूत करना आवश्यक है। विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहां कुछ बीमारियों का जोखिम अधिक है, स्थानीय स्वास्थ्य विभाग और आश्रमशालाओं के बीच बेहतर समन्वय होना चाहिए।
चौथा, छात्रावासों में पर्याप्त प्रशिक्षित कर्मचारियों की उपलब्धता भी सुनिश्चित करनी होगी। बच्चों की सुरक्षा केवल शिक्षकों की जिम्मेदारी नहीं हो सकती; इसके लिए प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग और स्थानीय अधिकारियों की साझा जवाबदेही आवश्यक है।
राजनीतिक आरोपों से आगे बढ़कर समाधान की जरूरत
इस मुद्दे पर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप स्वाभाविक रूप से तेज हुए हैं। विपक्ष सरकार पर लापरवाही के आरोप लगा रहा है, जबकि सरकार की ओर से भी घटनाओं के बाद कार्रवाई और सुरक्षा समीक्षा जैसे कदम सामने आए हैं। लेकिन इस गंभीर विषय का समाधान केवल राजनीतिक बयानबाजी से संभव नहीं होगा।
जरूरत इस बात की है कि पिछले दो वर्षों में हुई सभी 584 मौतों का व्यवस्थित विश्लेषण किया जाए। मौत की परिस्थितियां, स्थान, स्वास्थ्य संबंधी कारण, चिकित्सा सहायता की उपलब्धता और प्रशासनिक प्रतिक्रिया जैसे पहलुओं को अलग-अलग देखा जाना चाहिए।
निष्कर्ष
महाराष्ट्र की आश्रमशालाओं में दो वर्षों के दौरान 584 विद्यार्थियों की मौत का आंकड़ा निश्चित रूप से चिंता पैदा करने वाला है। साथ ही यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि इनमें बड़ी संख्या में मौतें स्कूल परिसर के बाहर हुईं। इसलिए पूरे आंकड़े को छात्रावासों में हुई मौतों के रूप में प्रस्तुत करना सही नहीं होगा।
फिर भी गंभीर बीमारियों, दुर्घटनाओं और सर्पदंश जैसी घटनाओं से हुई मौतें यह सवाल जरूर खड़ा करती हैं कि आदिवासी बच्चों के लिए स्वास्थ्य और सुरक्षा तंत्र को और कितना मजबूत किया जा सकता है।
बच्चों को बेहतर शिक्षा देना तभी सार्थक है जब उन्हें सुरक्षित वातावरण, पौष्टिक भोजन, समय पर चिकित्सा और सम्मानजनक आवासीय सुविधाएं भी मिलें। महाराष्ट्र की आश्रमशालाओं से सामने आया यह आंकड़ा इसी व्यापक जिम्मेदारी की ओर ध्यान आकर्षित करता है। अब आवश्यकता आरोपों से आगे बढ़कर पारदर्शी जांच, जवाबदेही और ऐसी ठोस व्यवस्था बनाने की है, जिसमें किसी भी बच्चे की सुरक्षा और जीवन से समझौता न हो।
