
नई दिल्ली। भारत अपनी असाधारण जैव विविधता के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। देश के अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में पाए जाने वाले पौधे, पशु, सूक्ष्मजीव, कृषि प्रजातियां और पारंपरिक जैविक ज्ञान हमारी प्राकृतिक तथा सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इन संसाधनों का संरक्षण करते हुए उनका वैज्ञानिक और आर्थिक उपयोग सुनिश्चित करना आज के समय की बड़ी आवश्यकता है। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए भारत में राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) तथा पहुंच और लाभ-साझाकरण यानी Access and Benefit Sharing (ABS) व्यवस्था को महत्वपूर्ण भूमिका दी गई है।
हाल में एबीएस व्यवस्था के अंतर्गत करीब 2.82 करोड़ रुपये की राशि का वितरण इस दिशा में एक उल्लेखनीय कदम माना जा सकता है। इसका उद्देश्य जैविक संसाधनों के व्यावसायिक उपयोग से प्राप्त लाभ को उन संस्थाओं और समुदायों तक पहुंचाना है, जो इन संसाधनों के संरक्षण और संवर्धन में योगदान देते हैं।
क्या है एबीएस व्यवस्था?
एबीएस यानी Access and Benefit Sharing ऐसी व्यवस्था है, जिसके तहत जैविक संसाधनों और उनसे जुड़े पारंपरिक ज्ञान का उपयोग करने वाले पक्षों तथा संसाधनों के संरक्षक समुदायों के बीच लाभ का उचित बंटवारा सुनिश्चित किया जाता है।
सरल शब्दों में समझें तो यदि किसी कंपनी, अनुसंधान संस्था या अन्य संगठन को किसी क्षेत्र के जैविक संसाधन से व्यावसायिक या अनुसंधान संबंधी लाभ प्राप्त होता है, तो उस लाभ का उचित हिस्सा संसाधन उपलब्ध कराने वाले देश और संबंधित स्थानीय हितधारकों तक पहुंचना चाहिए।
इस व्यवस्था की मूल भावना यही है कि जैव विविधता से मिलने वाला आर्थिक लाभ केवल बड़े संस्थानों या कंपनियों तक सीमित न रहे, बल्कि स्थानीय स्तर पर भी उसका सकारात्मक प्रभाव दिखाई दे।
राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण की भूमिका
भारत में जैव विविधता के संरक्षण और जैविक संसाधनों के नियमन में राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण की अहम भूमिका है। यह व्यवस्था जैव विविधता से संबंधित कानूनों और संस्थागत ढांचे के माध्यम से जैविक संसाधनों के उपयोग तथा उनसे होने वाले लाभों के बंटवारे को व्यवस्थित करने का प्रयास करती है।
राज्य स्तर पर राज्य जैव विविधता बोर्ड और स्थानीय स्तर पर जैव विविधता प्रबंधन समितियां भी इस पूरी व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इस बहुस्तरीय ढांचे का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जैव संसाधनों से जुड़े फैसलों में स्थानीय परिस्थितियों और समुदायों के हितों को पर्याप्त महत्व मिले।
2.82 करोड़ रुपये का वितरण क्यों महत्वपूर्ण?
हालिया वितरण में लगभग 2.80 करोड़ रुपये 27 राज्य जैव विविधता बोर्डों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों की जैव विविधता परिषदों को दिए गए। इसके अतिरिक्त भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान (IIHR), कर्नाटक को लगभग 2.01 लाख रुपये की राशि प्रदान की गई।
बताया गया है कि यह राशि मेसर्स एडवांटा एंटरप्राइजेज लिमिटेड से प्राप्त हुई थी। कंपनी द्वारा फूलगोभी, मिर्च, भिंडी और टमाटर की संकर किस्मों से संबंधित आनुवंशिक संसाधनों के उपयोग के संदर्भ में यह राशि एबीएस व्यवस्था के तहत प्राप्त हुई।
इस घटनाक्रम का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि इससे यह संदेश जाता है कि जैविक संसाधनों का आर्थिक उपयोग करने वाले संस्थानों की जिम्मेदारी केवल उत्पाद विकसित करने तक सीमित नहीं है। संसाधनों के संरक्षण और उनसे जुड़े समुदायों के हितों को भी समान महत्व देना आवश्यक है।
किसानों के लिए संभावित फायदे
भारत में किसानों की भूमिका केवल खाद्य उत्पादन तक सीमित नहीं है। सदियों से कृषि समुदायों ने विभिन्न फसलों की स्थानीय किस्मों, बीजों और पारंपरिक खेती के तरीकों को संरक्षित किया है। कई क्षेत्रों में स्थानीय जैव संसाधनों का ज्ञान पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ता रहा है।
एबीएस व्यवस्था इस योगदान को आर्थिक और संस्थागत पहचान देने का माध्यम बन सकती है। इससे प्राप्त धन का उपयोग स्थानीय जैव विविधता संरक्षण, सामुदायिक गतिविधियों और संसाधनों के संवर्धन से जुड़े कार्यों में किया जा सकता है।
यदि इस व्यवस्था को प्रभावी तरीके से लागू किया जाए तो किसानों और स्थानीय समुदायों को कई स्तरों पर लाभ मिल सकता है। जैव संसाधनों के संरक्षण के लिए स्थानीय स्तर पर योजनाएं तैयार की जा सकती हैं, पारंपरिक ज्ञान का दस्तावेजीकरण किया जा सकता है और जैव विविधता से जुड़े संसाधनों के संरक्षण के लिए आवश्यक बुनियादी सुविधाओं को मजबूत किया जा सकता है।
कृषि अनुसंधान और नवाचार को मिलेगा बल
एबीएस से जुड़ी धनराशि का एक महत्वपूर्ण उपयोग अनुसंधान एवं विकास के क्षेत्र में भी हो सकता है। भारत में कृषि अनुसंधान संस्थान लगातार ऐसी फसल किस्मों के विकास पर काम कर रहे हैं, जो किसानों की बदलती जरूरतों और जलवायु परिस्थितियों के अनुरूप हों।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार संबंधित अनुसंधान गतिविधियों में फूलगोभी की 8, मिर्च की 3, भिंडी की 5 और टमाटर की 6 संकर किस्मों से जुड़े कार्य शामिल हैं।
नई किस्मों के विकास का उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं होता। बेहतर रोग प्रतिरोधक क्षमता, बदलते मौसम के प्रति सहनशीलता, बेहतर गुणवत्ता और उपभोक्ताओं की पोषण संबंधी जरूरतों को ध्यान में रखना भी आधुनिक कृषि अनुसंधान का हिस्सा है।
इस दृष्टि से जैव संसाधनों से जुड़े लाभों को दोबारा अनुसंधान और संरक्षण में लगाना एक सकारात्मक चक्र तैयार कर सकता है।
जैव विविधता और आर्थिक विकास के बीच संतुलन
तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के दौर में प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल बढ़ना स्वाभाविक है। लेकिन अनियंत्रित दोहन से जैव विविधता को नुकसान पहुंच सकता है। इसलिए विकास और संरक्षण के बीच संतुलन बनाना जरूरी है।
एबीएस व्यवस्था इसी संतुलन की दिशा में काम करती है। इसका मूल विचार यह है कि जैविक संसाधनों का उपयोग हो, अनुसंधान और उद्योग को आगे बढ़ने का अवसर मिले, लेकिन संसाधनों के संरक्षण और स्थानीय हितधारकों के अधिकारों की अनदेखी न हो।
यह दृष्टिकोण भारत जैसे विशाल और जैव विविधता से संपन्न देश के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
स्थानीय समुदायों की भागीदारी जरूरी
जैव विविधता संरक्षण केवल सरकारी संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं हो सकती। जंगलों, कृषि क्षेत्रों, पहाड़ी इलाकों, तटीय क्षेत्रों और ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले समुदाय प्राकृतिक संसाधनों के साथ लंबे समय से जुड़े हुए हैं।
इसलिए एबीएस व्यवस्था की सफलता के लिए स्थानीय लोगों को जानकारी देना बेहद जरूरी है। उन्हें यह पता होना चाहिए कि जैव संसाधनों और पारंपरिक ज्ञान के उपयोग से जुड़े मामलों में उनकी क्या भूमिका और अधिकार हैं।
पारदर्शिता, जागरूकता और स्थानीय भागीदारी बढ़ने से एबीएस व्यवस्था का वास्तविक उद्देश्य अधिक प्रभावी ढंग से पूरा किया जा सकता है।
सामने हैं कई चुनौतियां
एबीएस व्यवस्था के सामने कुछ व्यावहारिक चुनौतियां भी हैं। सबसे पहली चुनौती यह है कि लाभ-साझाकरण की प्रक्रिया पारदर्शी और प्रभावी बनी रहे। दूसरी बड़ी आवश्यकता यह है कि संबंधित समुदायों तक लाभ वास्तविक रूप से पहुंचे और उसका उपयोग जैव विविधता संरक्षण तथा स्थानीय विकास के लिए हो।
इसके अलावा जैविक संसाधनों के अत्यधिक दोहन को रोकना भी जरूरी है। केवल आर्थिक लाभ प्राप्त करना पर्याप्त नहीं है; यह भी सुनिश्चित करना होगा कि संसाधनों का इस्तेमाल उनकी प्राकृतिक पुनरुत्पादन क्षमता और पर्यावरणीय संतुलन को नुकसान पहुंचाए बिना हो।
पारंपरिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण और उसकी सुरक्षा को भी प्राथमिकता देनी होगी, ताकि स्थानीय समुदायों की जानकारी का अनुचित व्यावसायिक उपयोग न हो।
भविष्य में बढ़ सकती है एबीएस की उपयोगिता
जैसे-जैसे जैव प्रौद्योगिकी, कृषि अनुसंधान, औषधीय पौधों और प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित उद्योगों का विस्तार होगा, जैव संसाधनों का महत्व भी बढ़ेगा। ऐसे में एबीएस जैसी व्यवस्थाएं यह सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं कि आर्थिक गतिविधियों का लाभ समाज के व्यापक हिस्से तक पहुंचे।
भारत के लिए यह अवसर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश के पास विशाल कृषि जैव विविधता, पारंपरिक ज्ञान और प्राकृतिक संसाधनों का बड़ा आधार है। यदि वैज्ञानिक अनुसंधान, स्थानीय ज्ञान और संरक्षण प्रयासों को एक साथ जोड़ा जाए तो जैव विविधता आर्थिक विकास का आधार बनने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण का मजबूत माध्यम भी बन सकती है।
निष्कर्ष
राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण के माध्यम से एबीएस व्यवस्था के तहत राशि का वितरण भारत में संरक्षण, अनुसंधान और न्यायपूर्ण लाभ-साझाकरण के बीच संबंध मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इसका वास्तविक महत्व केवल वितरित की गई राशि में नहीं, बल्कि उस व्यवस्था में है जिसके माध्यम से जैव संसाधनों से उत्पन्न लाभ को संरक्षण और स्थानीय हितों से जोड़ा जाता है।
भारत की जैव विविधता देश की प्राकृतिक पूंजी होने के साथ-साथ पीढ़ियों से चली आ रही सामुदायिक विरासत भी है। इसलिए इसके उपयोग से मिलने वाले लाभ में उन लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करना जरूरी है, जिन्होंने इन संसाधनों को संरक्षित रखा है।
एबीएस व्यवस्था यदि पारदर्शिता, स्थानीय भागीदारी और प्रभावी निगरानी के साथ आगे बढ़ती है, तो यह किसानों, स्थानीय समुदायों, अनुसंधान संस्थानों और उद्योग के बीच एक ऐसा संतुलन स्थापित कर सकती है, जिसमें जैव विविधता का संरक्षण और आर्थिक प्रगति एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक बनें।
