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सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा विरोध प्रदर्शनों में चेहरे की पहचान और बायोमेट्रिक निगरानी का मामला, निजता के अधिकार पर उठे गंभीर सवाल

नई दिल्ली। देश में पुलिसिंग और तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल के बीच सुप्रीम कोर्ट ने विरोध प्रदर्शन स्थलों पर फेस रिकग्निशन टेक्नोलॉजी (FRT) और अन्य बायोमेट्रिक निगरानी उपायों के कथित इस्तेमाल से जुड़े मामले पर सुनवाई के लिए सहमति जताई है। यह मामला खास तौर पर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल लोगों की तस्वीरों और बायोमेट्रिक जानकारी के संग्रह, पहचान और इस्तेमाल को नागरिकों के मौलिक अधिकारों के संदर्भ में चुनौती दी गई है।

मामला दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए हालिया छात्र प्रदर्शनों के दौरान दिल्ली पुलिस द्वारा कथित तौर पर इस्तेमाल किए गए डिजिटल निगरानी तंत्र से जुड़ा है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि प्रदर्शनकारियों की पहचान के लिए कैमरों, ड्रोन और मोबाइल कमांड एवं कंट्रोल सिस्टम जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया। याचिकाकर्ता का कहना है कि इस प्रक्रिया में नागरिकों की जानकारी उनकी स्पष्ट अनुमति के बिना एकत्र की गई और कथित तौर पर निजी संस्थाओं के पास भी डेटा होस्ट किया गया।

तीन सदस्यीय पीठ करेगी मामले पर विचार

सुप्रीम कोर्ट की जिस पीठ ने याचिका पर विचार करने की सहमति दी है, उसमें मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के साथ न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल हैं। पीठ ने मामले को हालिया छात्र प्रदर्शनों से संबंधित अन्य लंबित याचिकाओं के साथ टैग किया है। इससे संकेत मिलता है कि अदालत इस पूरे विवाद को केवल तकनीकी निगरानी के एक मामले के रूप में नहीं, बल्कि विरोध प्रदर्शन, नागरिक स्वतंत्रता और निजता से जुड़े व्यापक कानूनी सवालों के संदर्भ में देख सकती है।

याचिका CPI(M) के राज्यसभा सांसद ए.ए. रहीम की ओर से दायर की गई है। उनके पक्ष से वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने दलीलें रखीं। याचिका में दिल्ली पुलिस द्वारा प्रदर्शन स्थल पर चेहरे की मैपिंग और अन्य डिजिटल निगरानी तकनीकों के कथित इस्तेमाल पर सवाल उठाए गए हैं।

क्या है विवाद का मुख्य आधार?

याचिका का केंद्रीय सवाल यह है कि क्या पुलिस को किसी शांतिपूर्ण सार्वजनिक सभा में शामिल लोगों की बड़े पैमाने पर बायोमेट्रिक पहचान करने का अधिकार मौजूदा कानूनों से मिलता है।

याचिकाकर्ता का तर्क है कि केवल किसी व्यक्ति का प्रदर्शन में शामिल होना उसे अपराधी नहीं बना देता। ऐसे में किसी प्रदर्शन में मौजूद प्रत्येक व्यक्ति की तस्वीर या चेहरे से जुड़ी जानकारी को स्वचालित रूप से पहचानना और उसका डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करना निजता के अधिकार को प्रभावित कर सकता है।

याचिका में यह भी दावा किया गया है कि दिल्ली पुलिस ने CCTV कैमरों, ड्रोन, मोबाइल कमांड एंड कंट्रोल वाहन और अन्य निगरानी माध्यमों से प्रदर्शन स्थल पर मौजूद लोगों की तस्वीरें एकत्र कीं। इनमें प्रदर्शनकारी, पत्रकार और अन्य नागरिक भी शामिल हो सकते हैं।

हालांकि, इन आरोपों पर अंतिम न्यायिक निष्कर्ष अभी नहीं आया है। सुप्रीम कोर्ट का याचिका पर विचार करना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि पुलिस की कार्रवाई गैरकानूनी थी। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत दोनों पक्षों के तर्क और उपलब्ध कानूनी प्रावधानों को देखेगी।

निजता के मौलिक अधिकार का सवाल

इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू संविधान के अनुच्छेद 21 से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट पहले ही निजता को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का महत्वपूर्ण हिस्सा मान चुका है। ऐसे में किसी नागरिक के चेहरे, पहचान और गतिविधियों से जुड़ी डिजिटल जानकारी के बड़े पैमाने पर संग्रह को लेकर कानूनी सीमाओं का प्रश्न उठना स्वाभाविक है।

फेस रिकग्निशन तकनीक सामान्य कैमरे से अलग तरीके से काम कर सकती है। किसी व्यक्ति की तस्वीर को उपलब्ध डिजिटल डेटाबेस से मिलाकर उसकी पहचान का अनुमान लगाया जा सकता है। यही वजह है कि इसके इस्तेमाल को लेकर पारदर्शिता, उद्देश्य, डेटा सुरक्षा और निगरानी की अवधि जैसे सवाल महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

याचिकाकर्ता का कहना है कि शांतिपूर्ण सभा में शामिल लोगों की व्यापक बायोमेट्रिक पहचान के लिए स्पष्ट वैधानिक आधार होना चाहिए। याचिका में यह भी तर्क दिया गया है कि केवल पुलिस के आंतरिक आदेशों के आधार पर बड़े पैमाने पर ऐसी निगरानी की अनुमति नहीं दी जा सकती।

क्रिमिनल प्रोसीजर आइडेंटिफिकेशन एक्ट का संदर्भ

याचिका में Criminal Procedure (Identification) Act, 2022 का भी उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ता का दावा है कि यह कानून शांतिपूर्ण नागरिक सभाओं में शामिल लोगों की सामूहिक बायोमेट्रिक निगरानी के लिए पुलिस को असीमित अधिकार नहीं देता।

यही बिंदु आने वाली सुनवाई में महत्वपूर्ण हो सकता है कि किसी विशेष कानून के तहत पुलिस को किस सीमा तक पहचान संबंधी डेटा लेने और उसका इस्तेमाल करने की अनुमति है। अदालत यह भी देख सकती है कि किसी आपराधिक जांच और शांतिपूर्ण सार्वजनिक सभा की निगरानी के बीच कानूनी अंतर क्या होना चाहिए।

प्रदर्शन की स्वतंत्रता बनाम सुरक्षा

भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में विरोध प्रदर्शन नागरिकों के विचार व्यक्त करने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। दूसरी ओर, पुलिस और प्रशासन की जिम्मेदारी सार्वजनिक व्यवस्था तथा सुरक्षा बनाए रखना भी है। आधुनिक तकनीक इस काम में पुलिस की क्षमता बढ़ा सकती है, लेकिन उसके इस्तेमाल की सीमाएं तय करना भी उतना ही आवश्यक है।

फेस रिकग्निशन तकनीक का इस्तेमाल यदि किसी विशिष्ट अपराध की जांच के लिए सीमित और कानून के अनुरूप किया जाए तो उसका उद्देश्य अलग हो सकता है। लेकिन यदि किसी पूरे प्रदर्शन में मौजूद लोगों की पहचान का व्यापक रिकॉर्ड तैयार किया जाए, तो निजता और नागरिक स्वतंत्रता से जुड़े सवाल अधिक गंभीर हो जाते हैं।

यही संतुलन इस मामले को महत्वपूर्ण बनाता है। अदालत के सामने संभवतः यह प्रश्न होगा कि सुरक्षा व्यवस्था के लिए तकनीक के इस्तेमाल और नागरिकों के मौलिक अधिकारों के बीच उचित संतुलन कैसे बनाया जाए।

निजी कंपनियों के पास डेटा पहुंचने का आरोप

याचिका में एक अन्य गंभीर मुद्दा डेटा के कथित निजी संस्थाओं के पास होस्ट किए जाने का है। यदि सरकारी निगरानी से प्राप्त बायोमेट्रिक या चेहरे से संबंधित जानकारी किसी निजी संस्था के डिजिटल सिस्टम पर रखी जाती है, तो डेटा की सुरक्षा, नियंत्रण और इस्तेमाल की जवाबदेही का सवाल उठता है।

याचिकाकर्ता ने इसे Digital Personal Data Protection Act, 2023 के संदर्भ में भी चुनौती दी है। हालांकि, इस कानून के तहत इस तरह के मामले में कौन-कौन से प्रावधान लागू होंगे, यह आगे की न्यायिक सुनवाई में स्पष्ट हो सकता है।

पत्रकारों और आम नागरिकों पर भी असर

मामले का दायरा केवल प्रदर्शनकारियों तक सीमित नहीं है। याचिका में पत्रकारों और अन्य नागरिकों की तस्वीरें भी निगरानी तंत्र के दायरे में आने का दावा किया गया है। यदि सार्वजनिक स्थानों पर मौजूद प्रत्येक व्यक्ति का डेटा बिना स्पष्ट उद्देश्य के संग्रहित किया जाता है, तो इससे पत्रकारिता, नागरिक भागीदारी और सार्वजनिक गतिविधियों पर भी असर पड़ने की आशंका जताई जा सकती है।

विशेषज्ञों के लिए यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल निगरानी तकनीकों का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है। आने वाले समय में अदालत का फैसला यह तय करने में प्रभाव डाल सकता है कि सार्वजनिक स्थानों पर ऐसी तकनीकों के इस्तेमाल के लिए किस तरह की कानूनी और प्रशासनिक सुरक्षा व्यवस्था आवश्यक होगी।

आगे क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट द्वारा मामले पर विचार करने की सहमति के बाद अब इस विवाद में केंद्र सरकार, दिल्ली पुलिस और संबंधित अन्य पक्षों का पक्ष सामने आ सकता है। अदालत यह जांच सकती है कि कथित निगरानी के लिए कौन-सा कानूनी आधार मौजूद था, डेटा किस उद्देश्य से एकत्र किया गया, उसे कितने समय तक रखा गया और उसका इस्तेमाल किस तरह किया गया।

फिलहाल यह मामला तकनीक और कानून के बीच बदलते रिश्ते का महत्वपूर्ण उदाहरण बनकर सामने आया है। सवाल केवल इतना नहीं है कि पुलिस को आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करना चाहिए या नहीं, बल्कि यह भी है कि किस उद्देश्य से, किस कानूनी आधार पर, कितनी सीमा तक और किस जवाबदेही के साथ इसका इस्तेमाल किया जाए।

सुप्रीम कोर्ट की आगामी सुनवाई से भारत में फेस रिकग्निशन, बायोमेट्रिक निगरानी, निजता और शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार को लेकर महत्वपूर्ण कानूनी दिशा सामने आने की उम्मीद है। अदालत का अंतिम रुख यह स्पष्ट करने में मदद कर सकता है कि डिजिटल युग में नागरिकों की सुरक्षा और उनकी संवैधानिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे कायम किया जाए।

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