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UNCCD COP-17 में भारत की बड़ी पहल, भूमि बहाली और सूखा-रोधी क्षमता के लिए अंतरराष्ट्रीय हरित वित्त बढ़ाने की अपील

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उलानबटार, मंगोलिया। भूमि क्षरण, सूखा और जलवायु परिवर्तन की बढ़ती चुनौतियों के बीच भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर विकासशील देशों के लिए वित्तीय सहयोग को मजबूत करने की जरूरत पर जोर दिया है। मंगोलिया की राजधानी उलानबटार में आयोजित UNCCD COP-17 के दौरान भारत ने भूमि बहाली और सूखा-रोधी क्षमता विकसित करने के लिए पर्याप्त, पूर्वानुमेय, विविध और टिकाऊ अंतरराष्ट्रीय वित्त उपलब्ध कराने की मांग उठाई। यह मुद्दा ऐसे समय में सामने आया है, जब दुनिया के कई हिस्से भूमि क्षरण, पानी की कमी और बदलते जलवायु पैटर्न से प्रभावित हो रहे हैं।

भारत की ओर से केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने भूमि संरक्षण और पर्यावरणीय प्राथमिकताओं के लिए वित्तीय संसाधनों की उपलब्धता को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने भारत के ब्लेंडेड ग्रीन फाइनेंस फ्रेमवर्क का उल्लेख करते हुए बताया कि किस तरह सार्वजनिक और निजी वित्तीय संसाधनों के बेहतर समन्वय से भूमि बहाली समेत कई पर्यावरणीय क्षेत्रों में निवेश को बढ़ावा दिया जा सकता है।

भूमि क्षरण से निपटना वैश्विक चुनौती

भूमि केवल कृषि उत्पादन का आधार नहीं है, बल्कि यह खाद्य सुरक्षा, जैव विविधता, जल संरक्षण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से भी सीधे जुड़ी हुई है। जब जमीन की उत्पादकता कम होती है, तो इसका असर किसानों, स्थानीय समुदायों और पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। सूखे की स्थिति इस चुनौती को और गंभीर बना देती है।

इसी वजह से भूमि बहाली को अब केवल पर्यावरण संरक्षण का विषय नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे विकास, खाद्य सुरक्षा और जलवायु अनुकूलन से जोड़कर देखा जा रहा है। भारत का मानना है कि इस दिशा में बड़े पैमाने पर काम करने के लिए वित्तीय संसाधनों की स्थायी व्यवस्था आवश्यक है।

विकासशील देशों के सामने अक्सर एक बड़ी चुनौती यह होती है कि उनके पास पर्यावरणीय परियोजनाओं को लागू करने की जरूरत तो होती है, लेकिन पर्याप्त वित्तीय संसाधन उपलब्ध नहीं होते। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सहयोग की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

भारत ने ब्लेंडेड ग्रीन फाइनेंस पर दिया जोर

केंद्रीय पर्यावरण मंत्री ने भारत के ब्लेंडेड ग्रीन फाइनेंस फ्रेमवर्क को एक महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में सामने रखा। इस व्यवस्था का उद्देश्य अलग-अलग वित्तीय स्रोतों को एक साथ लाकर पर्यावरण और जलवायु से जुड़े क्षेत्रों में निवेश को सक्षम बनाना है।

ब्लेंडेड फाइनेंस का व्यापक उद्देश्य यह है कि सार्वजनिक क्षेत्र की वित्तीय भागीदारी के साथ निजी पूंजी को भी ऐसे क्षेत्रों में आकर्षित किया जाए, जहां पर्यावरणीय और सामाजिक लाभ लंबे समय में सामने आते हैं। इससे भूमि बहाली जैसी परियोजनाओं को आवश्यक वित्त उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है।

भारत द्वारा प्रस्तुत दृष्टिकोण में जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन, टिकाऊ भूमि उपयोग, वानिकी, कृषि, वनीकरण और जैव विविधता संरक्षण जैसे क्षेत्रों को विशेष महत्व दिया गया है।

कृषि और वानिकी के लिए भी महत्वपूर्ण

भूमि बहाली का सीधा संबंध कृषि क्षेत्र से है। जमीन की गुणवत्ता बेहतर होने से कृषि उत्पादकता, मिट्टी की नमी बनाए रखने की क्षमता और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में मदद मिल सकती है। वहीं, टिकाऊ कृषि पद्धतियां भूमि पर दबाव कम करने में योगदान दे सकती हैं।

इसी तरह वानिकी और वनीकरण भी भूमि संरक्षण की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। पेड़-पौधे मिट्टी के कटाव को कम करने, पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने और जैव विविधता को संरक्षण देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर इस बात को रेखांकित किया कि वित्तीय व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए, जो केवल तत्काल परियोजनाओं को सहायता देने तक सीमित न रहे, बल्कि लंबे समय तक चलने वाले पर्यावरणीय कार्यक्रमों के लिए भी स्थायी आधार तैयार करे।

सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड को बताया उपयोगी माध्यम

भारत ने सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड को भी भूमि बहाली और पर्यावरणीय प्राथमिकताओं के लिए पूंजी जुटाने के संभावित प्रभावी माध्यम के रूप में रेखांकित किया। ग्रीन बॉन्ड के माध्यम से जुटाई गई पूंजी को निर्धारित हरित और पर्यावरणीय परियोजनाओं में लगाया जा सकता है।

भारत के दृष्टिकोण में सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड का इस्तेमाल भूमि बहाली, सूखा-रोधी क्षमता, टिकाऊ वानिकी और अन्य पर्यावरणीय एवं जलवायु प्राथमिकताओं के लिए संसाधन जुटाने में किया जा सकता है।

यह पहल वित्तीय बाजारों और पर्यावरण संरक्षण के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी बनाने की दिशा में देखी जा सकती है। यदि हरित परियोजनाओं के लिए पर्याप्त निवेश उपलब्ध होता है, तो सरकारों और संस्थाओं को बड़े स्तर पर पर्यावरणीय कार्यक्रम लागू करने में मदद मिल सकती है।

सूखा-रोधी क्षमता पर विशेष ध्यान

सूखा आज दुनिया के कई क्षेत्रों के लिए गंभीर चुनौती बन चुका है। जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा के पैटर्न में बदलाव, लंबे समय तक कम बारिश और जल संसाधनों पर बढ़ता दबाव कई समुदायों की आजीविका को प्रभावित कर सकता है।

ऐसे में केवल राहत और आपातकालीन उपाय पर्याप्त नहीं माने जा सकते। देशों को ऐसी दीर्घकालिक रणनीतियों की जरूरत है, जो सूखे के प्रभावों से निपटने की क्षमता विकसित करें। भारत ने इसी संदर्भ में दुष्काल या सूखा-रोधी क्षमता के लिए अंतरराष्ट्रीय वित्तीय समर्थन की आवश्यकता पर जोर दिया।

इसके तहत जल संरक्षण, टिकाऊ कृषि, भूमि प्रबंधन, वनीकरण और स्थानीय स्तर पर प्राकृतिक संसाधनों की बेहतर देखभाल जैसे प्रयासों को बढ़ावा दिया जा सकता है।

जैव विविधता संरक्षण भी एजेंडे का हिस्सा

भूमि बहाली केवल मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने तक सीमित नहीं है। इसका संबंध पूरे पारिस्थितिकी तंत्र से है। खराब होती भूमि का असर वनस्पतियों, वन्यजीवों और स्थानीय जैव विविधता पर भी पड़ सकता है।

इसलिए भारत ने अपने हरित वित्तीय ढांचे के संदर्भ में बायोडायवर्सिटी कंजर्वेशन यानी जैव विविधता संरक्षण को भी महत्वपूर्ण क्षेत्र बताया।

यदि भूमि बहाली की परियोजनाओं को जैव विविधता संरक्षण के साथ जोड़ा जाए, तो पर्यावरणीय लाभ व्यापक हो सकते हैं। इससे प्राकृतिक आवासों को संरक्षण देने और पारिस्थितिक तंत्र की मजबूती बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

विकासशील देशों के लिए भारत का संदेश

UNCCD COP-17 में भारत की अपील का एक महत्वपूर्ण पहलू विकासशील देशों की वित्तीय जरूरतों से जुड़ा है। भूमि क्षरण और सूखे की समस्या कई गरीब और विकासशील देशों को अधिक प्रभावित करती है, जबकि उनके पास बड़े पैमाने पर पर्यावरणीय निवेश करने के सीमित साधन होते हैं।

ऐसे में भारत ने अंतरराष्ट्रीय वित्त व्यवस्था को अधिक विविध, पर्याप्त, भरोसेमंद और टिकाऊ बनाने पर जोर दिया। इसका उद्देश्य यह है कि पर्यावरणीय चुनौतियों से जूझ रहे देशों को केवल घोषणाओं के स्तर पर नहीं, बल्कि वास्तविक वित्तीय संसाधनों के माध्यम से सहायता मिल सके।

भारत की यह पहल वैश्विक दक्षिण की चिंताओं को अंतरराष्ट्रीय पर्यावरणीय बहस में अधिक मजबूती से रखने की दिशा में भी महत्वपूर्ण मानी जा सकती है।

आगे की राह

भूमि क्षरण और सूखा ऐसी चुनौतियां हैं, जिनका समाधान किसी एक देश के प्रयासों से संभव नहीं है। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग, वैज्ञानिक तकनीक, स्थानीय भागीदारी और पर्याप्त वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता होगी।

भारत द्वारा ब्लेंडेड ग्रीन फाइनेंस और सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड जैसे वित्तीय माध्यमों पर दिया गया जोर इस दिशा में एक व्यावहारिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। आने वाले समय में यदि इन माध्यमों के जरिए अधिक पूंजी पर्यावरणीय परियोजनाओं तक पहुंचती है, तो भूमि बहाली और जलवायु अनुकूलन के प्रयासों को नई गति मिल सकती है।

UNCCD COP-17 में भारत का संदेश स्पष्ट है कि भूमि संरक्षण को केवल पर्यावरणीय जिम्मेदारी के रूप में नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण आजीविका, जलवायु अनुकूलन और सतत विकास के साझा लक्ष्य के रूप में देखा जाना चाहिए। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था को मजबूत करना जरूरी है, ताकि दुनिया के प्रभावित क्षेत्रों में भूमि को पुनर्जीवित करने और भविष्य के सूखे से मुकाबला करने की क्षमता विकसित की जा सके।

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