Site icon हिट एंड हॉट न्यूज़

योग और प्राकृतिक चिकित्सा को लेकर सरकार का बड़ा जोर, स्वास्थ्य के साथ रोकथाम और स्वस्थ जीवनशैली पर फोकस

AI Generated photo

नई दिल्ली, 11 अगस्त 2026: देश में स्वास्थ्य व्यवस्था को केवल बीमारी के इलाज तक सीमित रखने के बजाय रोकथाम, स्वस्थ जीवनशैली और समग्र स्वास्थ्य की दिशा में आगे बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। इसी कड़ी में केंद्रीय आयुष राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री प्रतापराव जाधव ने सोमवार को नई दिल्ली में आयुष मंत्रालय की संसदीय परामर्शदात्री समिति की पांचवीं बैठक की अध्यक्षता की। बैठक का मुख्य विषय “योग और प्राकृतिक चिकित्सा” रहा।

बैठक में योग और प्राकृतिक चिकित्सा की बदलती स्वास्थ्य जरूरतों के बीच उपयोगिता पर व्यापक चर्चा हुई। विशेष रूप से निवारक स्वास्थ्य देखभाल, स्वस्थ जीवनशैली, पुनर्वास, तनाव प्रबंधन, स्वस्थ वृद्धावस्था और समग्र कल्याण जैसे विषयों को प्रमुखता दी गई। सरकार का जोर इस बात पर है कि पारंपरिक स्वास्थ्य पद्धतियों को आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान, प्रमाण और गुणवत्ता मानकों के साथ आगे बढ़ाया जाए।

इलाज के साथ बीमारी की रोकथाम पर जोर

बैठक में मंत्री प्रतापराव जाधव ने इस बात पर जोर दिया कि स्वास्थ्य व्यवस्था का उद्देश्य केवल बीमारी होने के बाद उपचार करना नहीं होना चाहिए। आधुनिक जीवनशैली से जुड़े तनाव, शारीरिक निष्क्रियता और गैर-संचारी रोगों की बढ़ती चुनौती के बीच रोकथाम और स्वास्थ्य संवर्धन की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण हो रही है।

योग को शारीरिक गतिविधि के साथ-साथ मानसिक संतुलन और जीवनशैली सुधार के एक माध्यम के रूप में देखा जा रहा है। वहीं प्राकृतिक चिकित्सा में आहार, जीवनशैली और प्राकृतिक उपचार संबंधी दृष्टिकोणों पर ध्यान दिया जाता है। बैठक में इन क्षेत्रों को स्वास्थ्य व्यवस्था के व्यापक ढांचे में उचित तरीके से विकसित करने पर विचार किया गया।

मंत्री ने यह भी रेखांकित किया कि योग और प्राकृतिक चिकित्सा को आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था के विकल्प के रूप में नहीं, बल्कि उचित परिस्थितियों में उसके पूरक के तौर पर विकसित करने की आवश्यकता है। इसके लिए वैज्ञानिक प्रमाण, गुणवत्ता और प्रशिक्षित पेशेवरों की भूमिका महत्वपूर्ण मानी गई।

वैज्ञानिक अनुसंधान को मिलेगी प्राथमिकता

योग और प्राकृतिक चिकित्सा को व्यापक स्तर पर आगे बढ़ाने के साथ-साथ वैज्ञानिक अनुसंधान पर भी विशेष ध्यान देने की बात सामने आई। बैठक में यह विचार प्रमुख रहा कि भारत की पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों को आधुनिक शोध पद्धतियों के माध्यम से जांचना और उनके प्रभावों का व्यवस्थित मूल्यांकन करना आवश्यक है।

मंत्री प्रतापराव जाधव ने पारंपरिक ज्ञान, विज्ञान और गुणवत्ता के बीच संतुलन को महत्वपूर्ण बताया। सरकार का दृष्टिकोण है कि जिन स्वास्थ्य पद्धतियों को बड़े स्तर पर अपनाया जा रहा है, उनके लिए प्रशिक्षण, प्रमाणन, अनुसंधान और गुणवत्ता सुनिश्चित करने वाली संस्थागत व्यवस्था मजबूत होनी चाहिए।

आयुष मंत्रालय की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, मंत्रालय के दायरे में आयुर्वेद, योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध, सोवा-रिग्पा और होम्योपैथी जैसी प्रणालियां आती हैं।

योग शिक्षा और प्रमाणन का विस्तार

बैठक में योग शिक्षा और प्रशिक्षण के क्षेत्र में संस्थागत ढांचे को मजबूत करने की आवश्यकता पर भी चर्चा हुई। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, देश में 100 से अधिक विश्वविद्यालय योग से संबंधित पाठ्यक्रम संचालित कर रहे हैं। इसके अलावा हजारों योग केंद्र और मान्यता प्राप्त संस्थान इस क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं।

योग के क्षेत्र में मोरारजी देसाई राष्ट्रीय योग संस्थान और योग प्रमाणन बोर्ड जैसी संस्थाएं शिक्षा, प्रशिक्षण और प्रमाणन व्यवस्था को मजबूत करने में भूमिका निभाती हैं। सरकार की कोशिश है कि योग से जुड़े प्रशिक्षण में गुणवत्ता और मानकीकरण बढ़े, ताकि प्रशिक्षित लोगों की सेवाएं अधिक व्यवस्थित तरीके से जनता तक पहुंच सकें।

आयुष मंत्रालय की 2026 की योग सामग्री में गैर-संचारी रोगों और अलग-अलग आयु एवं लक्षित समूहों के लिए योग प्रोटोकॉल का भी उल्लेख है। इनमें मधुमेह, उच्च रक्तचाप, ब्रोन्कियल अस्थमा, वरिष्ठ नागरिक, किशोर और मानसिक स्वास्थ्य जैसे क्षेत्र शामिल हैं।

प्राकृतिक चिकित्सा के लिए नियामक व्यवस्था पर चर्चा

बैठक का एक महत्वपूर्ण पहलू प्राकृतिक चिकित्सा शिक्षा और पेशेवर मानकों से जुड़ा रहा। संसदीय समिति के सदस्यों और विशेषज्ञों ने योग तथा प्राकृतिक चिकित्सा शिक्षा के लिए अधिक एकीकृत नियामक व्यवस्था की आवश्यकता पर सहमति व्यक्त की।

प्राकृतिक चिकित्सा के क्षेत्र में पंजीकरण और गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए संस्थागत व्यवस्था को मजबूत करना सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है। बैठक में शिक्षा, प्रशिक्षण, प्रमाणन और पेशेवर पंजीकरण के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत पर जोर दिया गया।

इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि इस क्षेत्र में काम करने वाले पेशेवरों के लिए उचित शैक्षणिक और प्रशिक्षण मानक निर्धारित हों तथा आम लोगों तक पहुंचने वाली सेवाओं में गुणवत्ता बनी रहे।

स्वस्थ वृद्धावस्था भी महत्वपूर्ण एजेंडा

भारत में बुजुर्ग आबादी बढ़ने के साथ स्वस्थ वृद्धावस्था का विषय भी स्वास्थ्य नीति के लिए महत्वपूर्ण होता जा रहा है। बैठक में इस पहलू पर भी चर्चा हुई।

उम्र बढ़ने के साथ व्यक्ति की शारीरिक सक्रियता, गतिशीलता, मानसिक स्वास्थ्य और स्वतंत्र जीवन जीने की क्षमता को बनाए रखना महत्वपूर्ण हो जाता है। योग और जीवनशैली आधारित गतिविधियों को इस दिशा में सहायक माना जा सकता है। हालांकि किसी भी स्वास्थ्य समस्या के उपचार के लिए विशेषज्ञ चिकित्सा सलाह की अपनी अलग भूमिका बनी रहती है।

बैठक में योग और प्राकृतिक चिकित्सा को स्वस्थ वृद्धावस्था, पुनर्वास और जीवन की गुणवत्ता से जुड़े व्यापक प्रयासों के साथ जोड़ने की संभावनाओं पर विचार किया गया।

गांवों और समुदायों तक पहुंच बढ़ाने की योजना

योग और प्राकृतिक चिकित्सा को केवल संस्थानों और शहरों तक सीमित रखने के बजाय समुदाय स्तर तक पहुंचाने पर भी जोर दिया गया। इसके लिए जागरूकता, प्रशिक्षण और स्थानीय स्तर पर स्वास्थ्य एवं कल्याण सेवाओं को मजबूत करने की आवश्यकता बताई गई।

यदि समुदाय स्तर पर लोगों को नियमित शारीरिक गतिविधि, संतुलित जीवनशैली और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता के बारे में जानकारी मिले, तो यह निवारक स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने में मदद कर सकता है।

सरकार की प्राथमिकताओं में योग और प्राकृतिक चिकित्सा सेवाओं की पहुंच बढ़ाने के साथ-साथ उनके लिए शिक्षा और बुनियादी ढांचे को मजबूत करना भी शामिल है।

वेलनेस टूरिज्म और वैश्विक स्तर पर भारत की भूमिका

बैठक में योग और प्राकृतिक चिकित्सा को वेलनेस टूरिज्म तथा मेडिकल वैल्यू ट्रैवल से जोड़ने की संभावनाओं पर भी चर्चा हुई। भारत लंबे समय से योग की वैश्विक पहचान के लिए जाना जाता है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर योग दिवस के माध्यम से इसकी पहुंच और बढ़ी है।

अब चुनौती यह है कि भारत की पारंपरिक स्वास्थ्य पद्धतियों को वैश्विक मंच पर केवल परंपरा के आधार पर नहीं, बल्कि वैज्ञानिक प्रमाण, प्रशिक्षण और गुणवत्ता मानकों के साथ प्रस्तुत किया जाए।

इससे योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा के क्षेत्र में रोजगार, प्रशिक्षण, शोध और पर्यटन से जुड़े नए अवसर विकसित होने की संभावना भी बनती है।

अगले चरण के लिए सात प्राथमिक क्षेत्र

बैठक में आने वाले समय के लिए सात प्रमुख प्राथमिक क्षेत्रों को रेखांकित किया गया। इनमें योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा की शिक्षा और संस्थागत ढांचे को मजबूत करना, वैज्ञानिक अनुसंधान को बढ़ावा देना, प्रमाणन और मान्यता व्यवस्था बेहतर करना तथा प्राकृतिक चिकित्सा में पंजीकरण और गुणवत्ता सुनिश्चित करना शामिल है।

इसके अलावा समुदाय स्तर पर निवारक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाने, वेलनेस टूरिज्म को प्रोत्साहित करने और वैज्ञानिक प्रमाणों के साथ भारतीय योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा को वैश्विक स्तर पर पहुंचाने पर भी जोर दिया गया।

समग्र स्वास्थ्य की दिशा में अहम कदम

आयुष मंत्रालय की संसदीय परामर्शदात्री समिति की पांचवीं बैठक से यह संकेत मिलता है कि सरकार योग और प्राकृतिक चिकित्सा को केवल पारंपरिक अभ्यास के रूप में नहीं, बल्कि व्यापक स्वास्थ्य और कल्याण नीति के एक हिस्से के रूप में विकसित करने की दिशा में काम कर रही है।

हालांकि इस प्रक्रिया की सफलता के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान, प्रशिक्षित मानव संसाधन, स्पष्ट नियमन, गुणवत्ता नियंत्रण और आम जनता तक सही जानकारी पहुंचाना बेहद जरूरी होगा। योग और प्राकृतिक चिकित्सा से जुड़े दावों को भी वैज्ञानिक प्रमाणों और उचित स्वास्थ्य मानकों के आधार पर परखा जाना महत्वपूर्ण है।

कुल मिलाकर, बैठक में “इलाज के बाद स्वास्थ्य” की बजाय “स्वास्थ्य की रोकथाम और संरक्षण” को अधिक महत्व देने की दिशा सामने आई। प्रतापराव जाधव की अध्यक्षता में हुई इस चर्चा ने योग और प्राकृतिक चिकित्सा के लिए शिक्षा, अनुसंधान, प्रमाणन, नियमन और सामुदायिक पहुंच को भविष्य की प्राथमिकताओं से जोड़ा है।

निष्कर्ष: भारत में बदलती जीवनशैली और स्वास्थ्य चुनौतियों के बीच निवारक स्वास्थ्य देखभाल की भूमिका लगातार बढ़ रही है। योग और प्राकृतिक चिकित्सा को वैज्ञानिक प्रमाण, गुणवत्ता और आधुनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के साथ उचित रूप से जोड़कर आगे बढ़ाया जाए तो ये स्वस्थ जीवनशैली, पुनर्वास और समग्र कल्याण के प्रयासों में उपयोगी भूमिका निभा सकते हैं।

Exit mobile version