शंगरी-ला डायलॉग 2026 में एशिया की सुरक्षा पर गहरी बहस, अमेरिका-चीन के बीच बढ़ी रणनीतिक प्रतिस्पर्धा

सिंगापुर | 31 मई, 2026
एशिया-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा और भू-राजनीतिक चुनौतियों पर केंद्रित विश्व के सबसे प्रतिष्ठित मंचों में से एक शंगरी-ला डायलॉग 2026 इस बार वैश्विक शक्ति संतुलन की नई तस्वीर पेश करता दिखाई दिया। सिंगापुर में आयोजित इस बहुपक्षीय सुरक्षा सम्मेलन में अमेरिका, चीन, भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया तथा कई अन्य देशों के शीर्ष रक्षा और सुरक्षा अधिकारियों ने भाग लिया।
सम्मेलन के दौरान हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा, ताइवान जलडमरूमध्य की स्थिति, दक्षिण चीन सागर में बढ़ती गतिविधियां, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सैन्य तकनीक और समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा जैसे मुद्दे चर्चा के केंद्र में रहे।
हिंद-प्रशांत क्षेत्र पर अमेरिका का विशेष जोर
अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल ने अपने संबोधन में कहा कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र आने वाले दशकों में वैश्विक आर्थिक और सामरिक गतिविधियों का केंद्र रहेगा। अमेरिका ने इस क्षेत्र में अपने सहयोगियों के साथ साझेदारी को और मजबूत बनाने की प्रतिबद्धता दोहराई।
वॉशिंगटन का मानना है कि क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने के लिए लोकतांत्रिक देशों के बीच रक्षा सहयोग, तकनीकी साझेदारी और समुद्री सुरक्षा तंत्र को मजबूत करना आवश्यक है। इसी क्रम में भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ बढ़ते सहयोग को भी महत्वपूर्ण बताया गया।
भारत की भूमिका पर विशेष ध्यान
सम्मेलन में कई वक्ताओं ने भारत को हिंद-प्रशांत क्षेत्र की उभरती हुई प्रमुख शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया। भारत की बढ़ती आर्थिक क्षमता, सामरिक स्थिति और समुद्री सुरक्षा में उसकी सक्रिय भागीदारी को क्षेत्रीय स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण माना गया।
विश्लेषकों का कहना है कि वैश्विक शक्ति संतुलन में हो रहे बदलावों के बीच भारत अब केवल क्षेत्रीय खिलाड़ी नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक समीकरणों का महत्वपूर्ण हिस्सा बनता जा रहा है।
जापान ने जताई सुरक्षा चिंताएँ
जापान ने पूर्वी एशिया की बदलती सुरक्षा स्थिति को लेकर चिंता व्यक्त की। टोक्यो का मानना है कि क्षेत्र में बढ़ते सैन्यीकरण और समुद्री विवादों के कारण भविष्य में सुरक्षा चुनौतियां और जटिल हो सकती हैं।
जापानी प्रतिनिधियों ने अपनी रक्षा क्षमताओं के आधुनिकीकरण और क्षेत्रीय साझेदारियों को मजबूत करने की आवश्यकता पर बल दिया। इसके साथ ही उन्होंने नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बनाए रखने की वकालत की।
चीन ने बाहरी हस्तक्षेप पर उठाए सवाल
दूसरी ओर चीन ने सम्मेलन में अपने दृष्टिकोण को मजबूती से रखा। चीनी प्रतिनिधियों ने कहा कि एशिया की सुरक्षा चुनौतियों का समाधान क्षेत्रीय देशों के बीच संवाद और सहयोग से निकाला जाना चाहिए।
बीजिंग ने आरोप लगाया कि कुछ बाहरी शक्तियां सैन्य गठबंधनों और सुरक्षा व्यवस्थाओं के माध्यम से क्षेत्र में तनाव बढ़ा रही हैं। चीन ने यह भी कहा कि विकास और आर्थिक सहयोग को प्राथमिकता देना क्षेत्रीय शांति के लिए अधिक उपयोगी होगा।
ताइवान और दक्षिण चीन सागर बने चर्चा का केंद्र
सम्मेलन के दौरान ताइवान जलडमरूमध्य और दक्षिण चीन सागर से जुड़े मुद्दों पर सबसे अधिक बहस देखने को मिली। कई देशों ने समुद्री मार्गों की स्वतंत्रता, अंतरराष्ट्रीय कानूनों के सम्मान और क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया।
विशेषज्ञों का मानना है कि इन क्षेत्रों में किसी भी प्रकार का तनाव वैश्विक व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकता है।
युद्ध में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग पर नई चर्चा
इस वर्ष के सम्मेलन की एक महत्वपूर्ण विशेषता युद्ध और सुरक्षा मामलों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के उपयोग पर हुई चर्चा रही। कई देशों ने सुझाव दिया कि एआई आधारित सैन्य प्रणालियों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्पष्ट नियम और नैतिक मानक विकसित किए जाने चाहिए।
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य के युद्धों में स्वायत्त हथियार प्रणालियों और एआई तकनीकों की भूमिका तेजी से बढ़ सकती है, जिसके कारण वैश्विक स्तर पर नई नीतियों की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
वैश्विक तनाव के बीच बढ़ा सम्मेलन का महत्व
शंगरी-ला डायलॉग ऐसे समय आयोजित हुआ है जब दुनिया पहले से ही कई भू-राजनीतिक संकटों का सामना कर रही है। यूरोप, मध्य पूर्व और एशिया में बढ़ते तनावों के बीच यह सम्मेलन प्रमुख शक्तियों के लिए अपने दृष्टिकोण प्रस्तुत करने और संभावित सहयोग के रास्ते तलाशने का महत्वपूर्ण मंच बन गया।
विश्लेषकों का मानना है कि सम्मेलन से यह स्पष्ट संकेत मिला है कि आने वाले वर्षों में हिंद-प्रशांत क्षेत्र वैश्विक राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र बना रहेगा। साथ ही अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा अंतरराष्ट्रीय संबंधों की दिशा तय करने में प्रमुख भूमिका निभा सकती है।
आगे क्या?
हालांकि सम्मेलन में विभिन्न देशों ने संवाद और सहयोग की आवश्यकता पर जोर दिया, लेकिन कई मुद्दों पर मतभेद स्पष्ट रूप से सामने आए। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आने वाले महीनों में प्रमुख शक्तियां प्रतिस्पर्धा और सहयोग के बीच संतुलन कैसे स्थापित करती हैं।
सिंगापुर से निकलने वाला सबसे बड़ा संदेश यही है कि एशिया अब केवल आर्थिक विकास का केंद्र नहीं रहा, बल्कि वैश्विक सुरक्षा, कूटनीति और रणनीतिक शक्ति संतुलन का सबसे महत्वपूर्ण मंच बन चुका है।
