जुलाई 15, 2026

दिल्ली हाईकोर्ट में म्यांमार शरणार्थी की याचिका: क्या बिना पासपोर्ट के मिल सकेगा दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रवेश?

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नई दिल्ली | 14 जुलाई 2026

भारत में शरणार्थियों की शिक्षा और उनके बुनियादी अधिकारों से जुड़े एक अहम मामले पर दिल्ली हाईकोर्ट ने सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार, गृह मंत्रालय (MHA) और विदेश मंत्रालय (MEA) से जवाब मांगा है। मामला म्यांमार से आए एक शरणार्थी छात्र की याचिका से संबंधित है, जिसने दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) की उस प्रवेश शर्त को चुनौती दी है, जिसके तहत विदेशी छात्रों के लिए वैध पासपोर्ट प्रस्तुत करना अनिवार्य है।

शरणार्थी छात्र ने क्यों खटखटाया अदालत का दरवाजा?

याचिकाकर्ता हेनरी ह्तू आंग लिन अपने परिवार के साथ वर्ष 2022 में म्यांमार में जारी राजनीतिक संकट और हिंसक परिस्थितियों से बचकर भारत आए थे। वर्तमान में उनका परिवार संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (UNHCR) के संरक्षण में रह रहा है।

भारत में अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद हेनरी ने दिल्ली विश्वविद्यालय में स्नातक पाठ्यक्रम में प्रवेश के लिए आवेदन किया। हालांकि, विश्वविद्यालय ने उनका आवेदन इसलिए स्वीकार नहीं किया क्योंकि वे वैध पासपोर्ट प्रस्तुत नहीं कर सके।

हाईकोर्ट ने उठाए महत्वपूर्ण सवाल

मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जसमींत सिंह ने विश्वविद्यालय से सवाल किया कि जब कोई व्यक्ति शरणार्थी है और अपने देश से विस्थापित होकर आया है, तो उससे पासपोर्ट की अपेक्षा किस आधार पर की जा सकती है।

अदालत ने केंद्र सरकार, गृह मंत्रालय और विदेश मंत्रालय को नोटिस जारी करते हुए यह स्पष्ट करने को कहा है कि यदि कोई व्यक्ति UNHCR द्वारा मान्यता प्राप्त शरणार्थी है, तो क्या उसे पासपोर्ट के अभाव में भी उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रवेश दिया जा सकता है।

याचिका में क्या मांग की गई है?

याचिकाकर्ता ने अदालत से अनुरोध किया है कि—

  • शरणार्थियों के लिए पासपोर्ट संबंधी अनिवार्यता में छूट या विशेष प्रावधान किया जाए।
  • दिल्ली विश्वविद्यालय को निर्देश दिया जाए कि वह ऐसे छात्रों के आवेदन केवल पासपोर्ट न होने के आधार पर अस्वीकार न करे।
  • UNHCR से मान्यता प्राप्त शरणार्थियों के लिए वैकल्पिक पहचान दस्तावेजों को भी मान्य माना जाए।

केवल प्रवेश का नहीं, अधिकारों का भी मामला

यह विवाद केवल एक छात्र के विश्वविद्यालय में दाखिले तक सीमित नहीं है। यह प्रश्न भी उठाता है कि भारत में रह रहे शरणार्थियों को शिक्षा जैसे मूलभूत अवसर किस सीमा तक उपलब्ध कराए जाने चाहिए।

यदि अदालत शरणार्थियों के पक्ष में कोई महत्वपूर्ण निर्देश देती है, तो भविष्य में ऐसे अनेक विद्यार्थियों को राहत मिल सकती है जो संघर्षग्रस्त देशों से भारत आए हैं और जिनके पास अपने मूल देश के वैध दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं।

शिक्षा और मानवीय दृष्टिकोण के बीच संतुलन

विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी व्यक्ति के लिए शिक्षा सामाजिक और आर्थिक विकास का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है। वहीं दूसरी ओर, विश्वविद्यालयों और सरकारी संस्थानों के लिए पहचान तथा सुरक्षा संबंधी नियमों का पालन भी आवश्यक माना जाता है।

ऐसे में अदालत के सामने चुनौती यह होगी कि वह राष्ट्रीय सुरक्षा, प्रशासनिक नियमों और मानवीय मूल्यों के बीच संतुलित समाधान प्रस्तुत करे।

अगली सुनवाई कब?

दिल्ली हाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 20 जुलाई 2026 निर्धारित की है। इस दौरान केंद्र सरकार, गृह मंत्रालय और विदेश मंत्रालय अपना आधिकारिक पक्ष अदालत के सामने रखेंगे। इसके बाद यह स्पष्ट हो सकेगा कि शरणार्थी छात्रों के लिए पासपोर्ट संबंधी नियमों में किसी प्रकार की राहत संभव है या नहीं।

निष्कर्ष

दिल्ली हाईकोर्ट में चल रहा यह मामला भारत की शिक्षा व्यवस्था, शरणार्थी नीति और मानवाधिकारों से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नों को सामने लाता है। आने वाला फैसला केवल एक छात्र के भविष्य को ही नहीं, बल्कि भारत में रह रहे अन्य शरणार्थियों की उच्च शिक्षा तक पहुंच को भी प्रभावित कर सकता है। इसलिए इस मामले पर कानूनी विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और मानवाधिकार संगठनों की विशेष नजर बनी हुई है।

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