दिल्ली हाईकोर्ट में UPSC स्क्राइब व्यवस्था पर उठे सवाल, दिव्यांग अभ्यर्थियों के अधिकार और परीक्षा की निष्पक्षता पर होगी सुनवाई

नई दिल्ली: संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की परीक्षाओं में दिव्यांग अभ्यर्थियों को उपलब्ध कराई जाने वाली स्क्राइब (लेखन सहायक) सुविधा को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट में दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई शुरू हो गई है। अदालत ने मामले को गंभीर मानते हुए UPSC समेत संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। यह मामला परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता और दिव्यांग उम्मीदवारों के अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करने से जुड़ा माना जा रहा है।
क्या है पूरा मामला?
यह जनहित याचिका दीपस्तंभ फाउंडेशन की ओर से दायर की गई है। याचिका में मांग की गई है कि ऐसे लोगों को स्क्राइब बनने की अनुमति न दी जाए, जो पहले UPSC परीक्षा में शामिल हो चुके हों या सिविल सेवा परीक्षा की कोचिंग से जुड़े रहे हों। याचिकाकर्ता का कहना है कि ऐसे व्यक्तियों की भूमिका परीक्षा की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर सकती है।
याचिकाकर्ता की प्रमुख दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता राहुल बजाज ने अदालत के समक्ष कहा कि दिव्यांग अभ्यर्थियों को स्क्राइब उपलब्ध कराना उनका कानूनी और संवैधानिक अधिकार है। हालांकि वर्तमान व्यवस्था में स्क्राइब के चयन को लेकर कुछ ऐसी कमियां हैं, जिनसे हितों के टकराव (Conflict of Interest) की आशंका पैदा हो सकती है।
याचिका में यह भी सुझाव दिया गया है कि स्क्राइब बनने वाले व्यक्ति से शपथपत्र लिया जाए, जिसमें वह यह घोषित करे कि उसने कभी UPSC की परीक्षा नहीं दी है और न ही किसी सिविल सेवा कोचिंग संस्थान में शिक्षक या प्रशिक्षक के रूप में कार्य किया है।
हाईकोर्ट की टिप्पणी
मुख्य न्यायाधीश देवेन्द्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की खंडपीठ ने मामले पर प्रारंभिक सुनवाई करते हुए UPSC को नोटिस जारी किया है। अदालत ने संकेत दिया कि यह मुद्दा केवल परीक्षा प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि दिव्यांग अभ्यर्थियों के अधिकारों और चयन प्रक्रिया की विश्वसनीयता से भी जुड़ा हुआ है।
वर्तमान में स्क्राइब से जुड़े नियम
UPSC दिव्यांग उम्मीदवारों को निर्धारित शर्तों के तहत स्क्राइब की सुविधा प्रदान करता है। मौजूदा नियमों के अनुसार, स्क्राइब कम से कम मैट्रिक उत्तीर्ण होना चाहिए और उसकी शैक्षिक योग्यता संबंधित परीक्षा की न्यूनतम पात्रता से अधिक नहीं होनी चाहिए।
हालांकि वर्तमान नियमों में यह स्पष्ट प्रावधान नहीं है कि स्क्राइब पहले UPSC परीक्षा का अभ्यर्थी रहा हो या नहीं, अथवा वह सिविल सेवा कोचिंग संस्थान से जुड़ा रहा हो या नहीं। इसी बिंदु को लेकर जनहित याचिका में आपत्ति जताई गई है।
मामले का व्यापक महत्व
यह विवाद दो महत्वपूर्ण पहलुओं को सामने लाता है। पहला, दिव्यांग उम्मीदवारों को बिना किसी बाधा के समान अवसर उपलब्ध कराना और दूसरा, प्रतियोगी परीक्षाओं की निष्पक्षता तथा पारदर्शिता को बनाए रखना। यदि अदालत याचिकाकर्ता के सुझावों को उचित मानती है, तो भविष्य में UPSC को स्क्राइब चयन संबंधी नियमों में संशोधन करना पड़ सकता है।
निष्कर्ष
दिल्ली हाईकोर्ट में लंबित यह मामला केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया का विवाद नहीं है, बल्कि यह समान अवसर, पारदर्शी परीक्षा प्रणाली और दिव्यांग अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कानूनी बहस बन चुका है। अब सभी की नजर UPSC के जवाब और अदालत के अंतिम निर्णय पर रहेगी, क्योंकि इसका प्रभाव भविष्य की सिविल सेवा परीक्षाओं की व्यवस्था पर पड़ सकता है।